धि,
व
(51 +| (> 0 क + ची व ५. १५.०१ । 1 डां० महेन्द्रकमार जेन, न्यायाचायं कै च शिनि !::24::1 | | ॥ ५॥ > ` ,|( (1 ® 1 (21.129. (11111 9 6 1.1." {. 111१... 1141191. ^, 1 {0 1, 9 - 1." 0+ 1111141. 11101111 117. =
जायायं ठरिभवर चरि विरिति) बडद्थल्त्रीच्चय
पत्परादक-अक्रवाद | 0 गदिन कार जोत. तयान
भारतीय ालपोल पकव्छाशिनं
षड्दर्शनसम्च्वय
आचार्य हरिभद्र सूरि कृत "षड्दर्शनसमुच्चय' छह प्रायीन भारतीय दर्शनों (वौद्ध, नैयायिक, सांख्य, जैन, वैशेषिक तथा जैमिनीय) का प्रामाणिक विवरणं देनेवाला प्राचीनतम उपलब्ध संग्रह हे। इसमें प्रत्येक दर्शन कं मूल सिद्धान्तां को सुव्यवस्थित एवं सन्तुलित खूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थ कीः यह भी विशेषता है कि इसमें छह दर्शनों के अन्तर्गत वैदिक ओर अवैदिक दोनों दर्शनों को समाहित किया गया है।
षड्दर्शन शीर्षक के अन्तर्गत अन्य ग्रन्थों में जहां अन्यान्य दर्शनों को इसलिए ग्रहण किया गया कि उनका खण्डन किया जा सके, वहीं इसके सर्वथा विपरीत प्रस्तुत ग्रन्थ मेँ आचार्य हरिभद्र ने सभी दर्शनों का ठीक वैसा टी परिचय दिया है जैसा कि उन-उन दर्शनों कं मूल ग्रन्थों में उपलब्ध होता है। प्रस्तुत संस्करण षड्दर्शनसमुच्चय' आचार्य गणरत्न सूरि की तकरहस्य दीपिका, सोमतिलक सूरि कृत लघुवृत्ति, अन्ञातकर्तृक अवचूर्णि, डो. महेन्द्रकुमार जैन न्यायाचार्य कत हिन्दी अनुवाद तथा विवेचन एवं सहस्राधिक तुलनात्मक रिप्पणों के साथ प्रकाशित है। प्रस्तावना में पं. दलसुख मालवणिया ने ग्रन्थ ओर ग्रन्थकार तथा टीकाकारो के विषय मेँ समुचित प्रकाश डाला हे। ग्रन्थ के जन्त में दिए गए चार परिशिष्टो से ग्रन्थ की उपयोगिता ओर भी बट् गई हे।
भारतीय दर्शनों के तुलनात्मक अध्येता कै लिए अनिवार्य एवं संग्रहणीय कृति, नये रूपाकार मेँ ।
+ "क "म
ऋ कन "५ ११ " "व
--= ~ ~ ~ --- नि त
] ॥ |
4 ननी ए
आचार्य हरिभद्र सूरि विरचित
षड्दशनसमच्चय
, | 1 1 ॥| । ॥ ॥ 1 ६ ¦ 1 । ¢
|
ज्ञानपीठ मूतिदिवी जैन ग्रन्थमाला : संस्कृत ग्रन्थांक-36
आचार्य हरिभद्र सूरि विरचित
षड्दर्शनसम्च्चय
श्री गुणरत्नसूरिकरत तकरहस्यदीपिका, सोमतिलकमसूरिकृत लघुवृत्ति तथा अज्ञातकर्तृक -अवचूर्णिं सहित
सम्पादक डो. महेन्द्रकुमार जैन, न्यायाचार्य
प्रस्तावना-लेखक प. दलसुख मालवणिया
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
चौथा संस्करण : 1997 © मूल्य : 182.00 रुपये
स्व० पुण्यश्लोका माता मूर्तिदेवी की पवित्र स्मृति में
स्व० साहू शान्तिप्रसाद जैन दारा संस्थापित एवं उनकी धर्मपत्नी; स्व० श्रीमती रमा जेन दारा संपोषित
भारतीय ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला
इस ग्रन्थमाला के अन्तर्गत प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, हिन्दी, कन्नड, तमिल आदि प्राचीन भाषाओं मे उपलब्ध आगमिक, दार्शनिक, पौराणिक, साहित्यिक, एतिहासिक आदि विविध-विषयक जेन-साहित्य का अनुसन्धानपूर्णं सम्पादन तथा उनका मूल ओर यथासम्भव अनुवाद आदि के साथ प्रकाशन हो रहा हे । जैन-भण्डारो की सूचिर्यो, शिलालेख-संग्रह, कला एवं स्थापत्य, विशिष्ट विद्वानों के अध्ययन-ग्रन्थ ओर लोकहितकारी जैन-साहित्य ग्रन्थ भी इसी ग्रन्थमाला में प्रकाशित हो रहे हे ।
ग्रन्थमाला ` सम्पादक : (प्रथम संस्करण)
ईो० हीरालाल जेन एवं डो. आ. ने. उपाध्ये
प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ १८, इस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नयी दिल्ली-९१०००३
मुद्रक : विकास ओफिसेर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-११००३२
स्थापना : फाल्गुन कृष्णा ९, वीर नि. २४७० ° विक्रम सं. २००० ® १८ फरवरी, १९४४ | © सर्वाधिकार सुरक्षित
[पवा 0गदधतल्ण श्ण (स्ाकीषावात : ऽका (जा क्ा्र> वि०. 36
5441-0 ^ 1२54 ^ 54111164 ४4
21 6 (^ 1२ ^ ^ एसाएत् ^^ ऽसया
[६] (11€ (गालवा ग< व्ावा033$व-ताापत्ते ग (पाकाथतावे अप्रा वा7त् 1.वहा1प्णू ग इ०ाावप्रा८2 इतत शात् शा 4रव्लताोा]
८474८ ¢) 07. वालाताव प्रावा [2111, विवव वा
(0111 17८ 1117०40८701. म
71. [0 वावेडपाते) कवभवरकााफ
^ २^711^ [^ एश (^ाातष्ि
एठपा तात्० : 1997 1 2116८ : 1२5. 152.00
।१११(,१६०. 88 ¢, च ॥। (> १,।#88;,। 7000२70६ ववि 4 चि प 1.4
7०10660 ०४
1.41 ऽव ओीगा11 27258 911 11 ला10% 2 1115 [अ जाला ऽ7111. 400110४1 2114 0110160 ©% 115 ए€16€५0ृला{ ५1६ 1416 91711. {२2112 4911
11 {1115 गा शा1218 (1८211 €व11€त् भा 2दगा116, [01111050एाल्य, | एपावा16, [लिव 1115101621 2110 गला 0111121 (९2415 2\/2112016 111. एवात, 32115111, ^ 080779115102, {11161
` [< 81111248, (21111 €९८., 91€ 0611 01011516 1 116 1€5[06[{ € 19110265 ५11 {ला 11211518110115 11 110 14102665. ^ 150 06118 [21101151160 216 212100८5 0 [ब171 11210215, 11151005, 51014165, 271 2110 21-८111ल्लपा८ ©% (ल्जाएलला( 5610195, 2110 2150 0पावा- 12111 [लावापा€.
0611-8] €ध11015 : (1751 ९4111011)
1. [17218] 1811 & [0. ^... 1024196
एप्01151€0 0% । 81212118 वातात 18, [15प्ाौला19् 4762, [.001 ९२०१५, च€५, [2€111-110003
एि11{€त 9 : “11८85 08, पच2५९€ा1 91120819, [0611-1 10032
70016 01 शी9[हिप्रा18 [1511119 9, «112 पि. ऽवा. 2470 ॐ ५ 1तावा102 89111. 2000 ®> 1811 €. 1944 | | ^^ |[ ?२1211ऽ २८५८५९५.
(^ 1. 21171041.
1060) प्तश्19तवा2 ( ९. 750 4. 1. ) 125 1 एनत् रलाष [धल 2107109 11168] १९६६118, "116 8७६ 7416€ ग 175 फल]७, 0४1 17 5 वाडात्६ अत् एच ता, ला008678 8171051 27 €$ ८०02616 9152 र प] €6#8, 10145 पौ 37 0प६७६वात10६ एलाऽ०ाभाध्फ उ {7त्187 [ल्पा ( प. [4 ल्०डा 60202044, = 17170. 3णा०॥17€८2 10162, ०. 169, (191८० 1926; 5 एष्टप्त 41.41.41 54 प्र ८प्त^ य : 5कवद 5 4 ८24/८ 7 2760 0दद, ६९.11.114, 1/1 0161६21 86165, ०. 68, 0ता'एण 1968 ). "1170पहोा 735 लगाप्एप105 एलका 2081701 ४० भणाा1, 5 €वणएापलय 70 ४11€ पथात् न 1€श्ा178 25 €अ€151४९€. प € 15 {116 751 8805 1६ (्णा7€0 ६९.६० ग € 41070278 80107 68110711681 ६८२६७. 8घ्८्०ाताङ, 1115 6गण९€फ् ध्मान 010 116 7४ %2414072४८&4 01 12171182 नल्व 31105 118६ 115 €ापता६ध०ा 25 0६ ८000066 ६0 16 [711४5 ० 115 7617165 101 21006. [1 17वाङ, € 51105 &7€8६ 10851ला ष 0र्टाः ए7210- 7181116 [1151010 त 56710015 21 11110500 8.5 15 ऽना {00 115 70012874 2014 216 ० @ऽ४0"2४ 21४25 04८6८4४ छ 0 पाङ, 1115 ए1212121038.5 570 10 16 ५५३५ 1181116 € स+€051श्९ 5611019.751140 271त् {€} 70170 {० एम पना ६116 €्051110ा1 ग = 8179. १०८६765 21त €र्ल 0 णाली 27त् ऽपा्रू्लल१ पला 8.5 77 ६0€ 6286 0 115 त15त्छ्पाऽ€5ऽ ०0 ४०९६३. एङ, 15 8.5 7681 8 7139ला 7771, 65561121 {1९ ६0 ॥1€ अप त ^ ल]दद्व१०, क्रतो ४25 €ग [01161119 €न्ध०प०१€त् आशा [31738 1670615 701 17 1501907 एणा 77 (01 श750ा) 1४7, शात् 1 06655 ए क<पि्&, ०प्ालः १०८1765 37 2 015702855107126 71180706. अश्र, € 18 वा 206६ 507 {लाला अत् 2 पदप गलााहंठपञ वल्ब्नोलः, 1.9६, 16 15 7०५६ (€ [गफल्ल 7 [काढ वोध्लाछ्णाल 0 हां -2 (्0्पफएलातापाी ग अर 7097627085 10 115 6४2225292- 5८211८८८24/८.
1९61110 पऽ 7110507ल€ा§ 171 11018, इलाल श] 9 €8.117&, 5६०16 0ध्ाला = ऽ$ऽधला१ॐ {781 धल 0 71076 फए111. 2. एा€फ 10 ल्ल चला) 1170871 10 पता 2777 चला ग &€६४ध1& 8. (0278६1४6 € € ४८ 17 {€ एणऽपा६ < (10. तशा1012ता2 15 € 015 2 7101817}6 63८60, = तऽ वदऽ ०१५८०८ब४८ 13 {€ लक्ता क्का) ल्फ<पताणक इण बपप्ीलाप८ वलोऽ ग0ण+ अग [न8785, प्रशा, 9 पतत्112, पपिथ ४ 1८2, ऽद पा 2, 4972, #21665118., 211 [21711717 15 धापा 2६०) ताऽ 070 {€ 0716003; 2.79 1 15 7€वाङ़ तणारलौलाअर्ल 25 वा 0णुला 21] छहर ग ता वलाहू०- 1057५१८० अल्ला 1101). ५ [76 1068 ° श्शात्राह ल्नाएएलातापा05 171 प्75 शाला 185 115 $21४९८; 27 7६. 1241.4 ऽएष 2141.4 एप 4 185 5700 17 1175 ताण्ता [0 प्ठतप्लगा 0 7087 ऽप्ल्। ग ऽ 126 एला ऽप7ऽ6€वृ लाधर कातल.
पिव्10118व्4/5 60 कद 211 2500602 ६०६ > फा (ग7ाला1207 17 ऊण212६- 7128501, वात् 1115 (कापाला 9, 1 45 25%4द7 78 @, ३5 व णा1€ लन १९६. 50106 01 ११€ ०९12115 पणता € 6६ 70 [75 वज्द०ं प्रणय 13९८ = उगलौकगह = काशाद्ललतऽ८ अकण प्ल, परि 70 णाञा€त् 7 4. 70. 1843 ० 1418. {116 1166655 १९७६०15 >0प 70 ॐत 115 शगा]ए७ 76 हाश्ला 7 +€ प्राणता 1ण४्०तपलान) 0 ४, 1141. ५4 वा 4. 2661065 @प7272.1112.75 100८ - 20454476 28, 116 7.42611८00४ ० = 50ा112.1112.18 271त 211 4४८7 ० 37 अ0ाङ्ा10प§ पधा 27€ लुप्तल्त् 70 ४06 ए€ऽला६ €त10.
116 वकद 245८०८02 272 747 4+द ववद 18 ए€ (वपा +€ कलाप्रंग) ० 01671181 ऽलो ऽ 51166 10118, 0668 पऽ€ [त 211011201815 {1621156 15 2 &००५ 17227102}
1727 11105000 20 (प272 12.25 (गपलापथ्ङ, 2 प्लत दश्०्०ा ग ध16 516. ए. प. 1710०66 64225१45 १0८८८ द्#/क = 211त 115 पध ङ (दपप्डञण))3हुव 7 013 4 (०6042000 1020445 ४ 17९ 10 € 25220104 ० ४८ 7740 = 2222005000४८ब 5#5८0005, @9¶लण8 1859. लो फ. 1, एएा.ा.8 €0116८॥€त 5016 = ऋगि70 ध्०ाा 3 70प (91002678. 270 ल०पध्०९त् 115 अपतद ग ताल धट्प @त 115 07010678 (ˆ {02742 14.112 50८12 5701164 24404, ४०1. 7, ए. 47-73, »०1. 1], 70. 159-177, ५०1. >. ए. 1-32, ००1. शा. 77. 225-36, ए 10ला2€, 1887, 1895-96-99 ). 1.. 85. ए168€१६६१ 27) {81787 वृषव15ा2् ग 2 एमन गा आ 70 #6€ ०००१९ [कपाः] ग € 4572८ लल ग [धन४, $०1. >+, ए. 243-71, 7 7€126€ 1904; 27 19 16 €01{€त 1116 ग क] @णाा8 225 (गफलाषडाफु प एाणाक€०8 1701062, (\9लप५४९. 1905. 1.9, 17. ए. 5. 14 ए्या घ्र 1125 #72115121€त् च715 ६९६५ 77६0 2718150 ध 10६65 ०7त एपा711511€6 ्र7तलाः +€ ५४16 4 (0127400 म 57 271050८5, (1 9६०ा€ एण०11811118 पछपऽ6€,
(¶€ा1211 19547. । {€ 12.€ 1271676त ८६. 714 घट हए ^ ह 8 071€ 2 †17€ € &1॥€त ऽलागभऽ
प्र110 &2५€ ण 71006] 6010075 2 7130 [2702 फणााऽ 0) पिद 92, पला 25, ४0/01 ८0/24" 14, ५०15. 1 €& 1, र, ०15. 1 € 11, 5वद#70000400/4 ००15. 1 & वा, 101८1) 97€ ए01306त 7 ध15 <671€5, प्र € 2150 €त1४€त € 42014 2174-7 47*द04200 7 {€ 9607 [. §लश168, उनापणवफ़ 1939, {€ 7४/20/2100 4 4८401 / 0 {0 (€ त ए्11ः267 7102 7. [. (@0178111212, 10111702. 1941 2110 116 22200020/0 22104142 2/24 1004 {07 {116 कषिाा112 2 8862378 7655, 2301008. 1941. 11656 €त0110715 500 115 ०९९ 170€519174108& ग त10८ण] ६€{5; 271 16 72 €४०1४८, "7तला {116 17570720 2 £. 5एष्प्त^1.41.4]7, 2 (ल्लणावृप् ग
, शिंश 07097916 10165 11८] 0076 11171655 10 115 ५146 7680176 ° {16 [ता नि ४३४२
[लभा 25 9. 1016. (प 1687170& 2001 115 58 6711156, ए. 27. £. ^ ए ७4 टार, { 7-5-1960 ) ‡ (116 प६8्ध्
6 प 12, आ70६€ 10 1076 800 1771 {175 ( 1115 1€्ल 0 2 1. 14 प्रमा ^ एए. 15 2. 162४ 1055 {07 -1210010६$. < 25 9 &००१ 361 21112.2170& 16877111.
न] @दणला2] हताप्णा5 € फल प्रभू ४० 9017६ ४० 1811६ (75 ९41४० ०1 (€ ऽबद- (20६40005 20000604 ( 2.6607702716त 0 1116 ल्ग €ा६81165 (@11113172.728. 8.0 €0ा12111818 8 211 9707705 ^ $त्ता 7 ) णि {11€ 126 116711€व २६. 116 प्रोत एर 21011 (1 115 प्रातं वभाञद््रंना. 1. 41.48 एष 11^1.,4 ए^प्रा ^ 7६0 प्तो€त 7. 1014 तिपा १२॥- एर 47२/5 702.{€ा121 97 116 71655 211 €्ट्ड्पाप् 16160 {02105 1८5 एप711८ब्ध०ाो 717 ॥1€ 65४ {071 = प्र€ 145 2150 €0711प4€त 2 18116 17700 पलपन 11 {11त1. 1४ 152
7) 21 ला ० 52.15728.11071 02६ 115 011 2{ 007 €0711107 {1;€1त, 16 1216 ६. (^ [1 ए 70२4
ए्ए04 र, 15 710 एल =एण11516€त 1 2 50114016 वपल 77 #6€ 56165 (0 {116 1711181
हा ० 0 पणौ 16 2 16६ [5 1870.
१५€ 7ल्ल्नात् 0णत हृष्ड्र्पतह 10 अपपाश्षा 32.11 लोलत् जठ, अद, रिकध्कृा, णा कला (ल्ल 170€ा€5॥ 11 1 271 {07 धल हिलाल ०णड 8701986 १० "116 एण116211011 ०1 ऽपल। ० ए. 0^1.+ शाप्त 41.496 ९ + {0 175 इलाला०णऽ रल) 211त् प्रह7पत&17६ 00०6€ 2101 ण {173 276 0८८ 0 आ 1,., (प ण 15 26810 5 €&ए102716€ 2.1त 2150 †0 17. (०. ¡^ प 110 16176 णऽ एपगाल्वप्ना उप ागा6 पव्या (प्ल प्क, €ल्लभाङग $ (्छपा्राणह 16 {01665 €&६५.
0 उप्र^प्का एर484704.11 87 115 ला 1€ 10688 01 {1115 (121111410218 115. € 216 €] ६0
010 भ्पा : - प. 1.. [970 ए<४., 10, 1970 --&, पि. 710०405०
प्रधान सम्पादकोय
यद्यपि हरिभद्र ( ७५० ई० अनुमानित ) ने अपने पीछे आत्मपरिचयात्मक विवरण अत्यल्प ही
छोडा ह, तथापि उनक संस्कृत भौर प्राकृतमें निबद्ध प्रायः अनेक विषयके आकर ग्रन्थोकी एक ऊम्बी श्रेणी भारतीय साहित्यमें उनका एक महान् व्यक्तित्व स्थापित करती है । ( ह° याकोवी : समाराइच्चकहा भ्रस्तावना, बिबलोधिका इण्डिका, नं ° १९७, ककत्ता १९२६, सुखकालजी संचवी : समदर्शी आचाय ह्रिभद्र, राजस्थान गोरियंटरू सीरिज, सं° ६८, जोधपुर १९६३ ) । यद्यपि उनका योगदान मुख्यतया जैनघर्भसे सम्बन्धित ह तथापि मध्ययनके कषेत्रम उनका अधिकार व्यापक था । वह् अर्घमागधी आगम ग्रन्थोके सर्वप्रथम संस्कृत टीकाकार हँ । दूसरे दिङ्नागके न्यायप्रवेश पर उनकी टीका इख बातका स्पष्ट प्रमाणहै कि उनकी विद्वत्ता केव धामिक दायरे तक ही सीमित नहीं थी । तीसरे वैदिक पुराण तथा दार्शनिकः सम्प्रदायो पर उनका महान् धिकार था, जंसा कि उनके धूर्तास्यान तथा शास्त्रवार्तासम्च्चयसे स्पष्ट है । चौये उनके करणोसे ज्ञात होता हं करि किस प्रकार वे जैन सिद्धान्तोकी व्याख्यामे यहां तक कि संवर्धन ओर आपृततिमें व्यापक विदत्ता तथा नवीन बुद्धिको ला रहे थे, जैसा कि उनके योगके विवेचनमें देखा जाता है । रपाचवें निर्चय ही उनका तरस्पर्शी मस्तिष्क अनेकान्तकी संचेतनासे श्ंङृत था, जिसने अनेक जैन सिद्धान्तोकी सुस्पष्ट व्याख्या कौ, पृथक्ताके लिए नहीं प्रत्युत तुलना तथा यदि आवश्यक हुआ तो अन्य सिद्धान्तोके विवेकसे खण्डन करनक किए । छठे वे एक कुशल कथाकार तथा प्रौढ़ घाभिक गुर है । अन्ततः भारतीय
खाहित्यमें वह अपने षडदर्शानसमुच्चयनें छह दशनोकं संक्षिप्त सारको प्रदान करने वाङे व्यक्तियोमे अग्रगामी व्यर्वित ह् ।
सामान्यतया भारतम घामिक दार्शनिकोने अपने दर्शनके अतिरिक्त अन्य सिद्धान्तोका अध्ययन सत्यकी खौजकं सन्दभमं तुलनात्मक अघ्ययनके छ्िए उन्हं समञ्षनेकी अपेक्षा उनकी आलोचना या खण्डनकं किए अधिक किया । सम्भवतया हरिभद्र एक गणनीय अपवाद है । उनका षडदर्शनसमच्चय छह दरनो- बौद्ध, नैयायिक, सास्य, जन, वेरोषिक तथा जैमिनीयका आधिकारिक विवरण देने वाला प्राचीनतम ज्ञात
संग्रह द । उनकी परिगणना रूदिवादियोसे भिन्न हं ओर यह वास्तवमे सम्पणं भारतीय धर्म-दशनोके विवेचनको दु्टिसे विस्तृत ह ।
दस प्रकारके सार संग्रह लिखनेके विचारका अपना महत्व है ओर पण्डित दलसुख माङ्वणियाने अपनी हिन्दी प्रस्तावनामं इसका विवरण दिया हौ कि इस प्रकारके अन्य कितने ग्रन्थ नखे गये ।
हरिभद्रके षड्द्शंनसमुच्चयको गुणरतनसूरि एक सुयोग्य टीकाकार प्राप्त हुए भौर उनकी टीका तर्करहस्यदीपिका पयपसत विस्तृत ह । उनकी व्याख्यामें हमं प्राप्य कतिपय विवरणोकी अपनी विद्ोषताएं है । वे सन् १३४२ से १४१८ के बीचमें हुए । उनके तथा उनकी कतियोके विषयमें आवश्यक विवरण पण्डित मालवणियाकौ हिन्दी प्रस्तावनामे दिये गये हैँ । गुणरत्नसूरि कत तर्करहस्यदीपिकाके अतिरिक्त सोमतिलक कृत वुवृत्ति तथा भज्ञात ठेखककी अवचूर्णीं भी प्रस्तुत संस्करणमें शामिल की गयी है ।
षडदर्शनसमुच्चय ओर तकरहस्यदौ पिकाने बहुत पहले प्राच्य विद्यावि्दोका ध्यान आकर्षित किया है, क्योकि हरिभद्रको कति भारतीय दर्शनोंका एक अच्छा गुटका है ओर गुणरलत्नको टीका उसकी एफ सुललित व्याख्या ह । एफ हालने षड्दर्शंनसमुच्चय तथा चारित्र्सिहगणि कृत इसकी वृत्तिका उल्लेख “ए
षड्दरांनसमुच्चय
कन्दरीग्य्शन टुवडंस् एन इण्डेक्स टु दि बिबिलियोग्राफी आफ द इंडियन फिलासफीकल सिस्टमस्, कलकत्ता १८५९ मेँ किया ह । उसके बाद एफ० एक° पुजेने हरिभद्रकं विषयमे कुछ सचना संगृहीत कीं तथा मूक ओर टीकाका अध्ययन जारी रखा । जिभोरनार उखा सोसादइटिभा एशियाटिका इटालियन वालूम १, पृष्ठ ४७-७३, वालुम ८, पृष्ठ १५९-१७७, वालुम ९, पृष्ठ १-३२, वालम ११, पृष्ठ २२५-३६, पफ्लोरेन्ज १८८७. १८९५-९६-९९ ) । एक ० सुआरीने इसकं एक भागका इटालियन अनुवाद एशियाटिक सोसाइटी फ इटलीके उपयुक्त जरनेक भाग १७, पृष्ठ २४२-७१ फिरेन् १९०४ में प्रस्तुत किया तथा बादमें उन्होने गुणरत्नकृत टीकाके साथ मूका सम्पादन बिब्लोधिका इण्डिका, कलकत्ता १९०५ में किया ।
कू समय पूर्वं डों० कं ° एस ० मू्तिने इसका नोट्सके खाथ अँगरेजीमे अनुवाद किया है ओौर ए कम्पेण्डियम आफ सिक्छ॒फिलासफीज्'के नामसे टैगोर पल्किशिग हाउस, तेनारी १९५७ में प्रकारित कियादह्ं। |
स्वर्गीय पण्डित महेन्द्रकुमार उन कतिपय नैसर्गिक भ्रतिमाशारी विदानोमे-से एक थे, जिन्होने हमें जैन न्यायके अनेक ग्रन्थोके आदर्शं संस्करण दिये । जसे न्यायविनिश्चयविवरण भूाग १-२, राजवात्तिक भाग १-२ ओर सिद्धिविनिङ्चय भाग १-२ जो इस ग्रन्थमाला में प्रकारित हँ । उ्रन ने सिघी जन सीरिज, बम्बई १९३९ के लिए अकलंकग्रन्धत्रयम् तथा माणिकचन्द्र दि० जेन ग्रन्थमाला बम्बई १९४१ कं किए न्यायकुमुदचन्द्रका सम्पादन किया। ओर निर्णयसागर प्रेस, बम्बई १९४१ कं किए प्रमेयकमलमातंण्डका सम्पादन किया । ये संस्करण उनकी दुरुह ग्रन्थोकी तलस्पर्शी वित्ता को व्यक्त करते ह॑ ओर उन्होने पं० सुखलाल्जोकी प्र॑रणासे तुलनात्मक टिप्प्णोकी जो परम्परा उदुभावित की वह उनकं समस्त भारतीय ज्ञानके विशार अध्ययनकी साक्षी है । उनके दुःखद अजवसानके समाचार सुनकर प्रो° डं ६० फ़ाउवाक्नर, आसद्या, ने उनके विषयमे मुके लिखा था ( उनका पत्र ७-३-१९६० ) “पण्डित महेन्धकुमारजीका निघन जैन विद्याके लिए एक बहुत बद क्षति है । वे मास्चर्यकारी विद्रत्ताके धनी एक भच्छे पण्डित थे ।'
स्व० पं° महेन्द्रकुमार जी द्वारा सम्पादित तथा हिन्दी अनुवाद सहित षड्दर्शनसमुच्चयका गुणरत्ने तथा सोमतिकककी टीकां तथा अज्ञात कर्तृक जवचूणिके साथ यह् संस्करण भ्रकादित करते हए ग्रन्थमाला चम्पादकोको हारिक प्रसन्नता है । पण्डित दलसुख माङवणियाने पण्डित महैन्रकमारजी कौ सामभ्रीका प्रेसके किए पुनरवोकन किया तथा वर्तमान रूपभे इसके प्रकाशनकं किए महती सहायता को । उन्होने हिन्दीमे विद्रत्तापूर्णं प्रस्तावना भी छिखी है । यह सन्तोषका विषय हं किं हम दोनोके समान मित्र पण्डित महेन्रकुमार- जीका यह ग्रन्थ समुचित रूपमे उस ग्रन्थमाला प्रकारित हो रहा है जिसके प्रारम्भिक विकासकी शुष्आत स्द यं उन्हीके हाथों हुई थी ।
हमः श्रौमान् साह शान्तिप्रखादजी तथा उनकी विदुषौ पत्नी श्रीमती रमाजीके प्रति अपना आभार व्यक्त करते है जो इस ग्रन्थमालाकी प्रगतिमें गहरी रुचि लेते तथा एेसे प्रन्थोके प्रकारानके लिए उदारतापूर्वंक सहायता करते ह । हम पं० दलसुख मालवणियाके उदार सक्रिय सहयोगके किए
आाभारी ह । हम भी लक्ष्मीचन्द्रजी जनको सोत्खाह मार्गदर्शनके लिए धन्यवाद देते हँ तथा डां° गोकुलचन्द्र जन- को भो जिन्होने एक्से अधिक तरहसे इस प्रकाशनमें सहयोग किया, विदोष रूपसे अनुक्रमणिका आदि तयार
करनेमे ।
कोल्हापुर --हीराखाल जेन १० फरवरी १९७० --आ० ने० उपाध्ये
पस्तावना प्रथम संस्कऱसे )
पं० दलसुख माक्वणिया डायरेक्टर, ला० द० भारतीय संस्कृति विदयामन्द्रि, अहमदाबाद्
प्रास्ताविक
षड्दर्शन समुच्चय मूलः ओर गुणरल्नकृत टीकाका अनुवाद श्री पं० महेन्द्रकुमारजी ने ता० २५-६-४० चार बजे पूरा क्रिया था एेसौ सूचना उनको पांडुक्पिसे मिलती ह । ओर टिप्पण किखनेका कायं उन्होने ई० १९५९ मे अपनी. मृत्यु ( ई० १९५९ जून ) के कुछ मास पूर्वं किया एेसा डां गोकु लचन्द्रजीकी सूचनासे प्रतीत होता ह 1 टिप्पणीके छिखनेमें डं गोक्रचन्द्रजीने सहायता को थी एेसा भी उनसे मालूम हआ है । अनुवाद करके उन्होने छोड रखा था ओर प्रकादाकको तलाश थी यह तौ म जानता हं । किन्तु खेद इस बातका ह कि उनके जीवनकाले इस प्रन्थको वे मुद्रित रूपमे देख नहीं सके । ओर इस कार्यको मित्रकृत्यके रूपमे करनेमे दुःखमिश्चित सन्तोषका अनुभव मै कर रहा हं ।
उनकी जो सामग्री मुञ्ञे मिली उसे ठीक करके, यत्र-तत्र संशोधित करके मैने प्रेस-योग्य बना दी थी । कुछ पुष्ठोके प्रफ भी मैने देखे ओर पूरे ग्रन्थके प्रूफ मुद्रण-कार्य रीघ्र हो इस दृष्टिसे मेरे पास भेजे नहीं गये । आनन्द इस बातका ह किं मेरे परम मित्रका यह् कार्यं पूरा हो गया ।
यह भी आनन्दका विषय हँ कि इसका प्रकादान भारतीय ज्ञानपीर्से हो रहा है । ज्ञानपीठके आरम्भ कासे ही उनका सम्बन्ध ज्ञानपीठ्से एकया दूसरे रूपमे रहा ह । अककंकके करई ग्रन्थोका उद्धार प० महेन्द्रकूमारजीने किया ओर ज्ञानपीटने उनका प्रकारन किया--उससे दोनोंको प्रतिष्ठा बढ़ी । इतने उत्तम रूपसे भारतीय दर्शनोके ग्रन्थ प्रायः नहीं मुद्रित होते । तुखनात्मक टिप्पणी दे कर दनिग्रन्थोका संपादन पूज्य ` पं सुखखालजी ने शुरू किया था । उसी पद्धतिका अनुसरण करके पं० महेन्द्रकुमारजीने जिस उत्तम रीतिसे उन ग्रन्थोका सपादन किया ओौर ज्ञानपीठने उन्हुं सुन्दररूपसे छापा यह तो भारतीय दर्शन ग्रन्थके प्रकारानके इतिहासमे सुवणं पृष्ठ ह । उन प्रन्थोके जरिये भारतीय दर्शानोके तुरनात्मक अध्ययनको प्रगति मिरी है--यह् निःसंशय ह । पं० महेन्द्रकुमारजी जीवित होते तो प्रस्तुत षडदर्शनसमु च्चयकी प्रस्तावना कैसी छिखते यह् नहीं कहा जा सकता किन्तु यहाँ जो लिखा जा रहा है उससे तो बढकर होती-इसमें सन्देह नहीं हं ।
षडदर्दानसमुच्चय ओर उसकी' वृत्तिके -संशोधनमें उपयुक्त हस्तप्रतियोके विषयमे मेरे समक्ष पं° महेन्द्र - कुमारजीके द्वारा लिखित कोई सामग्री नहीं आयी अतएव यह कहना कठिन है कि उन्होने तत्-तत् सज्ञाओके दारा निदिष्ट कौन-सी प्रतियोका उपयोग किया है । किन्तु इतना तो निचित है कि उन्टोने अच्छी हस्त- प्रतियोका उपयोग प्रस्तुत ग्रन्थके संशोधने किया है ओर उसे शु द्ध करनेका पूरा प्रयत किया है ।
उनके द्वारा संपादित अन्य ग्रन्थोकी तरह इसमे भी उन्होने महत्त्वपूर्णं तुलनात्मक टिप्पण अन्य प्रन्थोसे उद्धृत क्ये हँ । संकेत सूचीके आधारपर-से एक ताछ्िका तैयार की गयी है जिससे वाचकंको पता लगेगा कि प्रस्तुत ॒ग्रन्थके संशोधनके किए उन्होने कितना परिश्रम किया है । उन्होने विविध श्रन्थोके कौनसे संस्करणोंका रिप्पणीमें उपयोग किया ह-यह भी पता र्गा कर निदिष्ट किया गया ह ।
१. "षडदर्शन समुच्चय ' गुज राती अनुवादक : श्रौ चन्द्रसिह सूरि, प्रकाशक-जैन तत्त्वादर्श सभा, अहमदा- बाद, ई० १८९२; अष्टकप्रकरणके साथ, प्रकाशक : क्षेमचन्द्रात्मजो नारायणः, सुरत, ई० १९१४; हरिभद्रसूरिग्रन्थमारामें प्र° जन धमंप्रसारक सभा, भावनगर, विक्रम सं० १९६४ ( ई० १९०७ ) ।
६ षडदरांनसमुच्चय
उन्होने इस ग्रन्थकी प्रस्तावना चिस थी कि नहीं यह पता नहीं क्गता । जो सामग्री मेरे समक्ष आयी उसमे तो उसकी कोई सुचना नहीं । अतएव र्भैनें प्रस्तावनाके रूपमे थोडा जख देना उचित | समस्ा हं । | ज्ञानपीठके संचालकोने मित्रकृत्य करनेका यह शुभ अवसर दिया एतदर्थं म ग्रन्थमालाके सम्पादकोका | गओौर ज्ञानपीटके संचाठरकोका माभारी हँ । |
ष्रडदशंन दर्शनोकी छह संख्या कव निर्चित हुई उसका इतिहासमें पक्का पता नहीं क्गता । विद्यास्थानो- |
की गिनतीके प्रसंगमें दर्शनो या तर्कोकी संख्याकी चर्चा होने क्गी थी इतनादही कहा जा सकता है ।
छान्दोग्य उपनिषद् ( ७-१-२ ) मे अध्ययनके अनेक विषयोंकी गिनतीमे वाकोवाक्यका उल्लेख मिलता हँ । |
उसका अर्थं है वाद-प्रतिवाद । परन्तु अर्थशास्त्रमे आन्वीक्षिको आदि चार ही विद्याओोका उल्लेख हं तथा
आन्वीक्षिकी विद्याम भी सांख्य, योग ओर लोकायतोका उल्केख है तथा आन्वीक्षिकौके विपयमें कहा हं--
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सववंधर्माणां शादवदान्वीक्षिको मता ॥
स्मृति्योमिं याज्ञवल्क्यस्मृति ( १-३ ) मे १४ विद्यास्थानोंको गिनाया ह, उनमें केवल न्याय ओर मीमांसाका उतल्टेख है । पुराणोमे भी जहां विद्याओंका उल्टेख है वहा भी प्रायः याज्ञवल्क्यस्मृतिका अनुसरण है । किन्तु न्यायभाष्यकार वात्स्यायनने तो न्यायशास्त्रको ही आन्वीक्षिकी विद्या माना ह । उनका कहना दहं कि “सेयमान्वीक्षिकी प्रमाणादिभिः पदार्थविभेज्यमाना-
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्व्र्माणां विदयोदेशे प्रकीतिता ॥'† --न्यायभाष्य १.१.१.
वात्स्यायन ने ठीक ही कहा ह क्योकि त्रयी हौ या वार्ताया दण्डनीति--इन सभी विद्याओके विषय- मे आन्वीक्षिकी ही निर्णायक है--एेसा कौटिल्यका मत ह-क्योकि आन्वीक्षिको हीके द्वारा अर्थात् हेतुप्रयोग- दवारा तीनों विच्यांका अन्तिम ध्येय सिद्ध होता है । सुखके अवसरपर या आपत्तिके अवसरमं बुद्धिको स्थिर रखनेवारी आन्वीक्षिकी ही है । प्रज्ञामें, वचनम ओर क्रियामें वैशारद्य आन्वीक्षिकीके कारण ही आता ह । अतएव आन्वीक्षिकी सर्वविद्याओंकी विद्या है । खब विद्यामोकि च्िषए प्रदीप हं ` सास्य होया योग या खोकायत ये सभी आन्वीक्षिकीका आश्रय केकर ही अपनी बातको सिद्ध करते थे अतएव कौटिल्यने भके उन तीनों- का नाम आन्वीक्षिकी गिनाया किन्तु उन तीनोका आधार आन्वीक्षिकी ज्यात् न्यायविद्या ही हं । वे प्रमाण, न्याय या तुर्कका आश्रय केकर ही अपनी बातको सिद्ध कर सकते हैँ ठेसा अभिमत न्यायभाष्यकारका है । इस | परसे हम कह सकते है किं-कौटिल्यके समय तक भले ही न्यायशास्तरको पृथक् दशंनके रूपमे स्थान मिला | | नहीं था किन्तु आन्वीक्षिकीके रूपमे उसकी सत्ता माननी चाहिए । न्यायशास्जमे जब वंशेषिक दर्शनको समान | तन्त्र माना जाने गा तब वहु सब विद्याओंका आधार रूप न रहकर एक स्वतन्त्र दशन बन गया । यही |
१. कौटिकीय अर्थशास्त्र--१-२ ( कांगले ) । २. हिस्टरी भंफ धर्मशास्त्र भा० ५, पृ० ८२०, ९२६, ११५२ । ३. सांख्यं योगौ लोकायतं चेत्यान्वीक्षिकी ।१०। धर्माधर्मौ त्रय्यामर्थानर्थौ वार्तायां नया-
° पनयौ दण्डनीत्यां बलाबलौ चैतासां हेतुभिरन्वीक्षमाणा लोकस्योपकरोति व्यसनेऽभ्युदये च बुद्धिमवस्थाप- यति प्रज्ञावाक्यक्रियावैशारदं च करोति ।११।--कौटिलीय अर्थदास्त्र १।२।
प्रस्तावना ७
कारण ह कि पुराणों ओर स्मृतियोमें न्याय ओर मीमांसाको पृथक् गिनाया गया । इस प्रकार पुराण कारें न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा ओर लोकायत-ये दरशन पृथक् सिद होतें हँ । स्मृति ओर पुराणोमे विद्या- स्थानोमें सांख्य-योग-लोकायतको स्थान मिलना सम्भव नहीं था क्योकि उनका आधार वेद नहीं था ! किन्तु महाभारत ओर गीतासे स्पष्ट है कि दर्शनोमे सांख्य-योगका स्थान पूरी तरहसे जम चुका था । ओर वें अवेदिक नहीं, किन्तु वैदिक दर्शनम शामिरू कर चिये गये थे.। इस प्रकार ईसाकौ प्रारम्भकी शताब्दियोमं न्याय- वैरोषिक, सांख्य-योग, मीमांसा--ये दर्शेन वैदिकोमें पुथक्-पुथक् रूपसे अपना स्थान जमा चुके थे । उनके विरोधमें जैन, बौद्ध ओर चार्वाक-ये तीन अवैदिक दर्शन भी ईसा पूर्ं.कासे वैदिक दार्शनिकोके किए समस्या रूप बने हृए थे । मीमांसामें कर्मं ओर ज्ञानके प्राधान्यको केकर दो मेदो गये थे । अतएव वैदिके षटततकं या षड्दर्नकी स्थापना हौ गयी थी जिसमें न्याय-वंशेषिक, सास्य-योग ओर पूवं भौर उत्तर मीमांसा--ये प्राधान्य रखते थे ।
प्रस्तुत ग्रन्थमे षड्दर्रानोका विवरण है किन्तु दर्शनोकी छह संख्या जौर उस छह संख्यामें भी किन- किन दर्शंनोंका समावेश ह--इस विषयमे एेकमत्य नहीं दीखता । वैदिक दर्शंनोके अनुयायी जब छह दशंनोकी चर्चा करते हैँ तब वे छह दर्शनोमें केवर वैदिक दर्शनोका ही समावेश करते है । किन्तु प्रस्तुत षडदर्शनसमुच्चयमें वैदिक-अवैदिक सब मिाकर छह संख्या हँ । यह भी ध्यान देनेकी बात ह कि दर्शानोको छह गिननेको प्रक्रिया भी ईसवी सनुके प्रारम्भकी कई दाताब्दियोके बाद ही शुरू हुई ह । वाचस्पति मिश्नने एक वेशेषिकदर्शनको
ˆ छोडकर न्याय, मीमांसा--पूवं ओर उत्तर, सांख्य ओर योग--इन पाँचोकी व्याख्या कौ । इससे यह तो
पता ुगता हँ कि उनके समय तक छहों वैदिक दरशन प्रतिष्ठित हो चुके थे । उन्होने वैरोषिक दर्हानपर पृथक् लिखना“इसक्िए जरूरी नहीं समश्ना कि उस दर्शनके तत्त्वों का विवेचन न्यायमें हो ही जाता ह । वाचस्पति एक अपवादरूप वेदिक ठेखक हैँ । इनके पह किसी एक वैदिक केखकने तत्तदर्शनोके ग्रन्थोका समर्थन तत्तदर्शनोकी मान्यताके अनुसार नहीं किया केवर वाचस्पतिने यह नया मार्गं अपनाया जौर जिस दर्शनपर
चिखने बैठे तो उसी दर्शनके होकर छिखा । आचार्य हरिभद्र ओर वाचस्पतिमें यह अन्तर है कि वाचस्पतिने टीकाकारके रूपमे या स्वतन्वरूपसे विरोधी दर्शनका निराकरण करके तत् तदुदर्शनोंका समर्थन किया है ।
जब कि हरिभद्रने मात्र परिचय दिया ह । यह भी अन्तर है कि वाचस्पतिने दर्शानोपर पुथक्-पथक् ग्रन्थ लिखे किन्तु ५. एक ही भरन्थमं छहों दर्शनोका परिचय दिया । यह भी ध्यान देनेकी बात ह कि वाचस्पतिके शं चार्वाक ददांनका समर्थन नहीं है ओर न अन्य अवैदिक जैन बौद्धका । जब करि हरिभद्रनें वेदिक- अवैदिक सभी द्शनोका अपने ग्रन्थमे समावेश परिचयके लिए कर जिया है । आचार्य हरिभद्रने कद्ध, नेयायिक,सांखय, जन, वैशेषिक ओर जैमिनीय इन छह दशनोका समावेश षड्दशंनसमुज्वयमें किया है । दा्शनिकोमे प्रथम तो यह प्रवृत्ति शुरू हुई कि अपने विरोधी मतोका निराकरण करना । किन्तु आगे चरूकर वेदिकोमे यह प्रवृत्ति भी देखी जाती ह कि सच्चे अर्थमे वेदके अनुयायी केवल वे स्वयं हँ ओौर उनका ही दशन वेदका अनुयायी ह, अन्य दर्शन वेदकी “दुहाई तो देते है किन्तु वस्तुतः वेद॒ ओर उसके मतसे उनका को सम्बन्ध नहीं । जब स्वयं वैदिक दर्शनोमें ही पारस्परिक एसा विवाद हो तब अवैदिक दशनोका तो ये वेदिक दर्शन तिरस्कार हौ करे यह स्वाभाविक है । इस भूमिका मे हम देखते है कि न्थायमंजरीकार जयन्त केवल वेदिक दरानोको ही तकम या न्यायमें समाविष्ट करते है भौर बौद्धादि अन्य दर्दनोंका बहिष्कार घोषित करते हँ । यह प्रवृत्ति उनसे पहलेके "कुमारिलमे भी त्यष्टरूपसे विद्यमान है । ओर शंकराचार्य भी उसका अनुकरण करते हँ । विशेषता यह् है कि वे सांस्य-योग-बौद्ध, वैरोषिक, जैन ओर न्यायदर्शनको
तथा शेव ओर वेष्णव दरानोको भी वेद विरोधी मानते है ।
१. न्यायमंजरी प्०४। २. तन्तरवातिकं १,२,४। हिस्टरी ओंए् धर्मशास्त्र भाग० ५, पृ० ९२६ मेँ उद्धरण हं । अन्य उद्धरण उसीमं १० १००९, २६२ मेंहै। ३. ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य २,१,१; २,१,३;२,१,११-१२, २,२,१-४४
वैदिक हो गये ।
८ षडदशनसमुच्चय
सांख्य-योग, न्याय-वैरोषिक ये दर्शन अपनी प्रारम्भिक अवस्थामे वैदिक थे नहीं किन्तु उनकी व्याख्या ओर व्यवस्था जैसे-जैसे होने गी वे अपनेको वैदिक दर्शनोमें शामिल करने लगे ओर अपने आगमरूपसे केदको स्थान देने रगे । एक ही वेद परस्पर विरोधी दर्शनका मूक कंसे हो सकता ह--इस विचारके विकासके साथ ही ये दर्शन एक-दसरेको अ्वैदिक घोषित करने गे थे । ओर केवल अपनेको ही वैदिक दरशन गिनने लगे थे । किन्तु वेदको नाना व्यास्याएं हई है ओर हो सकती ह--इस विचारके विकासके साथये ही दर्शन अन्य द्शनोको भी वैदिकं दर्शन मानने कगे थे-रेसा भी हम कह सकते हँ । इस विचारके मूलमें वौद्धोके अनेक दर्शनोकी उपस्थिति भी एक कारण हौ सकता है । क्योकि बौद्ध दर्शानोके विविध भेद हुए, उसके वाद ही परस्पर विरोधी होकर भी वे वैदिक दर्शन है एेसे विचारकी भूमिका वैदिकोमें हम देखते है । ओर वैदिक दर्शनोकी गिनती भी इस भूमिकाके बाद देखते हँ । वैदिक दनि छह द--इस बातका उल्लेख जयन्तमें हम पाते ह किन्तु उनके पूवं भी षट्तकं या षड्दर्शनकी प्रसिद्धि हो चुको थी ।. आगे चलकर वौद्धोके दशन मेदके विषयमे बौद्ध टीकाकारोने यह स्पष्टीकरण करना शुरू किया कि ये दर्शनभेद अधिकारीभेदसे हं । स्वयं जके उपदेराको कर जब ये विविध विरोधी व्याख्या होने लगीं तो रन होना स्वाभाविक हौ थाकति एक ही भगवान् बुद्ध परस्पर विरोधी बार्तोका उपदेश कंदे दे सकते ह ? इसके उत्तरम यह भी कहना रुरू हमः कि ये उपदेश अधिकारी भेदसे भिन्न थे अतएव इन उपदेशों वि रोध नहीं । अतएव बौद्धके दर्शनभेदोमे
भी परस्पर विरोध नहीं । किन्तु अधिकारभेदते ही उन दर्शनोकौ प्रवृत्ति हद ह॑ देसा समज्ञना चाहिए ।
दर्शनभमेदका यही स्पष्टीकरण परस्पर विरोधी वैदिक दर्दनिकि विषयमे भी होने कगा-यह हम सवंदर्शनसंग्रह् जैसे ग्रन्थोसे जान सकते हूं ।
षड्दरानसमुच्चयकी रचनाभुमिका
वेदसे छेकर उपनिषदों तक भारतीय चिन्तनधारा उन्मुक्त रूपसे बह रही थी । अनेक आश्रमो ओर परतिष्ठानोमे अनेक ऋषि-मुनि ओौर चिन्तक अपने-अपने विचार रिष्यों ओौर जिज्ञासुके समक्ष रख रहे थे । उन विचारोकी व्यवस्था थी नहीं । भगवान् बुद्ध ओौर भगवान् महावीरके बाद यह स्पष्ट हुजा कि वंदिक ओौर अवैदिक एसी दौ धारां मुख्य है । अवैदिकोमं भी गोशालक आदि कर्द विचारक थे उनमे-से बौद्ध, जैन ओर चावाकि आगे चलकर स्वतन््र दर्शनरूपसे स्थिर हृए । वैदिकं भी कई शाखाए स्पष्ट हुड । भौर साख्य-योग, न्याय-वैोषिक गौर मीमांसा ( कर्ममीमांसा, ज्ञानमीमांसा अथवा पूवं मीमसिा जीर उत्तरमीमांसा ) आदि दर्शन स्थिर हुए । इनमे-से सांख्य-योग ओर न्याय-~वंरोषिक प्रारम्भमं अर्वेदिक दर्शन थे किन्तु बादमें वस्तुतः देखा जाय तो विविध दर्दन एक ही. तत्त्वको अनेक रूपसे निरूपित करते थे । अतएव जैसा भी तत्त्व हो किन्तु उसके निरूपणके ये अनेक "दुष्टविन्दु थे--यह स्यषट हं । किन्तु ये दार्शनिक अपने ही मतको दुढ़ करनेमे रगे हृए थे ओौर अन्य मतोके निराकरणमं तत्पर ये । अतः उन दाशंनिकोसे यह आशा नहीं कौ जा सकती थी किं वै अनेक दुष्टियोसे एक ही तत्त्वका निरूपण कर । नेयायिकादि सभी दर्शन वस्तु तत्त्वकी एक निरिचत प्ररूपणा केकर चले थे ओौर'उसी ओर उनका आग्रह होनेसे तत्-तत् दर्नकी
सृष्टि हो गयो थी ।. तत्-तत् दर्शनके उस परिष्कृत रूपसे बाहर जाना उनके लिए सम्भव नहीं था । लैन दार्शनिकोके विषये रेसी बात नहीं ह । वे तो दार्शनिक विवादके कषेत्रम नयायिकादि सभी दरनोके परिष्कारके बाद अर्थात् तीसरी शतीके बाद ये । अतएव वे अपना मागं निदिचत करनेमें स्वतन्त्र ये ओर उनके क्एि यह भी सुविधाथी कि जँनागम ग्रन्थोमे वस्तुविचार नयोके दारा अर्थात् अनेक दृष्टियोसे हुमा था । जैन आंगर्मोमिं मुख्यरूपसे द्रव्य, क्षेत्र, काल ओर भाव इन चार दृष्ियोसे तथा द्रव्याथिक मौर पर्यायार्थिक नयोके द्वारा विचारणा करनेकी पद्धति अपनायी गयी ह । इसके अलावा व्यवहार ओर निदवय इन दो नयोसे भी विचारणा देखी जाती है । इन आगम ग्रन्थोकी जब व्याख्या होने लगी तब
~ त =
नस ~= =
स=
व= =-= = =-=
=
=
१ नन
व्रस्ताक्ना ९
सात नयोका सिद्धान्त विकसित हआ । यही समय है जवसे लेकर जंनदार्शनिकं भारतीय दरसन कषेत्रम जो वाद-विवाद चर रहा था उसमें क्रमसे शामिल होते गये । परिणाम स्वरूपं विविध मतोके बीच अपने मत- का सामंजस्य कैसा है ओर कंसा होना चाहिए-इस विषयकी ओर उनकी दृष्टि गयी । यह तो स्पष्ट हौ गया कि वे जब द्रव्यार्थिक दुश्टिसे वस्तुविचार करते हँ तब वस्तु को नित्य माननेवाे दाशंनिकोसे उनका एेकमत्य होता है ओर जब पर्यायदुष्टिसे विचार करते हँ तब वस्तुको अनित्य माननेवाले बौद्धसे ठेकमत्य होता है । अतएव इस बातको लेकर वे दशंनोके अन्य विचारोसे भी परिचित होनंको आवश्यकताको महसूस करने कगे ओर अन्य दर्शनोसे . जैन दर्शंनका किन-किन बातोमे मत॑क्य ओर विभेद हँ-- इसकी तलारामे प्रवृत्त हुए । उस प्रवृत्तिके फलस्वरूप जन आचार्योमिं अपने नयसिद्धान्तका पुनरवेक्षण करना जरूरी हो गया । तथा अन्य मतोका सही-सही ज्ञान भी आवश्यक हो गया । इस अनिवायं आवश्यकता की पूति नयसिद्धान्तकी समयानुकूरू व्याख्या करके की गयी ओर अन्य दरशनोके विषयमे सही ज्ञान देनेवाये प्रकरण लिखकर ओर अन्य दर्शनोका नयसिद्धान्तसे सम्बन्ध जोड़कर भी कौ गयी । इसी प्रवृत्तिके फल आचाय हरिभद्रके षडदररानसमच्चय भौर शास्त्रवार्तासमच्चयमे हम विभिन्न रूपसे देखते हँ । इन दोनों ग्रन्थोकी अपनी-अपनी क्या विशेषता हं यह् हम आगे करेगे । किन्तु उसकी पृवभूमिका किस प्रकार बनी यह प्रथम बताना जरूरी है । अतएव इसीकौ चर्चा यहा को जाती हुं ।
नयोके विषयमे सर्वप्रथम आचायं उमास्वातिने प्रर्न उठायाहै कि एक ही वस्तुका विविध रूपसे निरूपण करनेवाले ये नय क्या तन्त्रान्तरीय मत् ह या अपने हौ मतमें प्रश्नकर्ताओने अपनी-अपनी समञ्चके अनुसार कुछ मतभेद खड कयि है ? उत्तरदियादहैकिन तोये नय तन्तरान्तरीय मत हँ ओर न ये अपने ही मतके लोगोने मतभेद खड़े किये हँ । किन्तु एक ही वस्तुके जाननेके नाना तरीके हँ । पुनः प्ररन किया कितो फिर एक ही वस्तुक विषयमे नाना प्रकारका निरूपण करनेवाले नयोमे परस्पर विरोध क्यो नहीं ? उत्तरमे स्पष्ट किया है किं एक ही वस्तुको अनेक दृष्टियोसे देखा जा सकता ह अतएव इनमें विरोधको अव- काश नहींहै। जैसे एक ही वस्तु नना प्रकारके ज्ञानोसे अनेकल्प देखी जा सक्तीरहवेसे ही नाना नयोसे उसे अनेक प्रकारसे जाना जा सकता ह-उसमें कोई विरोध नहीं ।
स्पष्ट है कि विविध नयोके वारा किया गया दर्शन एक ही मतके अनुयायी द्रारा--अर्थात् जंनधमके अनुयायी द्वारा नाना प्रकारके अध्यवसाय = निणय हँ । उनका सम्बन्ध परवादीके मतोते नहीं ह-एेसा स्पष्ट अभिप्राय आचार्य उमास्वतिका ह । किन्तु चिन्तनशील व्यक्तिको आचार्यं उमास्वातिके इस उत्तरसे सन्तोष हो नहीं सकता । क्योकि दार्शनिक वाद-विवादके क्षेत्रमे परस्पर एेसे कई विरोधी मत चह देखता हँ ओर उनका साम्य जैनेके द्वारा विविध रूपसे किये गये निर्णयोके साथ भी वंह देखता है, तब नका जनेतर मतोसे सामंजस्य या संयोजन बिटानेका प्रयत्न वह न करे यह हो नहीं सकता । इसी प्रक्रियामें -से प्रथम तो सर्वदर्शनोका अभ्यास बढ़ानेकी ओर जैनाचार्यं प्रवृत्त हुए । ओर उसके फलस्वरूप नय ओर जंनेतर विविध मतोका किस प्रकारका सम्बन्ध हो सकता ह इस विचारणाकी प्रक्रिया शुरू हुईं ।
इस विचारणामें अग्रसर आचार्य सिद्धसेन दिवाकर हुए एेसा जान पड़ता ह । विक्रम चौथी-्पाचवीं रतीमे होनेवाठे भाचार्य सिद्धसेनने ३२ दवात्रिरिकाएं छिखी हैँ उनमे-से ८वीमें जल्पकथा, ७वीमे वाद, <वीमें वेदवादः, १ रवीमें न्यायदर्शन, १ ३वीमे साख्यदर्रन, १४वीमें वैशेषिकदर्शन, १५बवीमें बौद्धदरशनि, १ ०वीमें .. योगविद्या, १ ६वीमें नियतिवाद आदि जैनेतरदर्शानोकी चर्चा की.है। ओौर, सन्मतितर्कमे नय ओर नयाभास- सुनय-दुनयका भी स्पष्टीकरण करके नयोमें नयी विचारणाका सूत्रपात कर दिया ह । ` र्व्याथिक ओर पर्या यार्थिकं ये दोनों नय अपने दृ्टिबिन्दुसे विचार करे यह ठीक है किन्तु अपनी मर्यादासे बाहर जाकर एेसा ` आग्रह रखे कि वस्तुका यही एक रूप ह तो प्रत्येक भिथ्यादृष्टि होगे ( १,१३ ), किन्तु यदि दोनों नय अपने विषयका विभाग करके चलतो दोनों एकान्त मिलकर अनेकान्त बन जाता है ( १;१४ ) । प्रत्येक नय
1॥
१. तत्तवार्थभाष्य- १,३५ । र
१० षड्दरंनंसमुच्चय
दुर्नय बन-जाता है यदि अपनी दृष्टिका ही भामग्रह हो { १,१५ ) । सभी नय मिथ्यादृष्टि होते हैँ यदि वे स्वपक्षके साथ ही प्रतिबद्ध है किन्तु यदि वे परस्परकी अपेक्ना रखते हैँ तो सम्यक् हौ जाते हँ ( १,२१ ), दोनों नय माने जाये तब ही संसार-मोक्षकी व्यवस्था बन सकतो है अन्यथा नहीं ( १,१७-२० ) । आचाय सिद्धेन अपने इस मतकी पुष्ठिके किए सुन्दर उदाहरण दिया ह । उसका निर्देश भी जरूरी ह । उन्होने कहा है कि कितने ही मूल्यवान् वैद्यं आदि मणि हों किन्तु जबतक वे पुथक्-पुथक् हँ (रलावकि "के नामसे वंचित ही रहेंगे । उसी प्रकार अपने-अपने मतोके विषये ये नय कितने ही सुनिरिचत हों किन्तु जबतक् वे अन्य-अन्य पक्षोसे निरपेक्ष है वे “सम्यग्दर्शन नामसे वंचित ही ररहुगे । जिस प्रकार वे ही मणि जब अपने- अपने योग्य स्थानमें एक डोरेमे बंध जाते हैँ तब अपने-अपने नामोंको छोडकर एक ^रत्नावलि' नामको धारण करते है, उसी प्रकार ये सभो नयवाद भी सब मिलकर अपने-अपने वक्तव्यके अनुरूप वस्तुदशंनमे योग्य स्थान प्राप्त करके सम्यग्द्दनि' नामको प्राप्त कर छेते हैँ ओर अपनी विशेष संज्ञाका परित्याग करते ह| ( १,२२-२५ ) । यही अनेकान्तवाद है ।
स्पष्ट है कि सन्मतिकार सिद्धसेनके मतसे न्योका सुनय ओौर दुर्नय एेसा विभाग जरूरी हँ । तात्पयं इतना ही है कि अन्य दर्शंनोके जो मत है यदि वै अनेकान्तवादके एकं अंश रूपपे हँ तब तो सुनय है, मन्यथा दुर्नय । यसे नयवादके साथ अन्थ दार्शनिक मतके संयोजनकी प्रक्रिया शुरू हुई है । स्वयं सिद्धसेन- ने इस प्रक्रियाका सूत्रपात भौ इन शब्दो कर दिया है--जितने वचनमगं है. उतने ही नयवाद हँ । भौर जितने नयवाद है उतने ही परसमय = परमत है । कपिरदर्शन दरव्याथिक नयका वक्तव्य हं, ओर शुद्धोदनतनयका वाद परिशुद्ध पर्यायाथिकं नयका वक्तव्य है । तथा उलूक ( वैशेषिक ) मतम दोनों नय स्वीकृत है फिर भी ये सभी 'मिथ्यात्व' है क्योकि अपने-अपने विषयको प्राधान्य देते हँ ओौर परस्पर निरपेक्ष है । सारांश कि यदि वे अन्य मतसापिक्ष ह्य तब ही सम्यग्दर्शन" सज्ञाके योग्य ह, अन्यथा नहीं (. ३,४७-४९) । |
सिद्धसेनकी स सुश्वनाको लेकर तत्कालीन सभी मर्तोका संग्रह विक्रम पाचनी गतीके पूरवाधमे आचार्य मल्लवादीने अपने नयचक्रम कर दिया है । भल्लवादीका यह ग्रन्थ अपने कालकी अद्वितीय कृति कटी जां सकती है । वर्तमानम अनुपलब्ध ग्रन्थ गौर मतौका परिचय केवल इस नयचक्रसे इसक्एि मिलता है कि आचाय मल्खवादीने अपने कालतक विकसित एक भी प्रधान मतको छोड़ा नहीं । अतएव अपने-अपने मतको भ्रदशित करनेवारे तत्-तत् दर्दने ग्रन्थोंकी अपेक्षा सर्वसंप्राहक यह ग्रन्थ षड्वर्रानसमुच्चय जसे ग्रन्थोकी पूबभूमिका रूप बन जाता ह । नयचक्रकी रचनाकी जो विशेषता है वह उसके नामसे ही सूचित हो जाती ह । नर्योका अर्थात् तत्कालीन नाना वार्दोका यह चक्र दहै.। चक्रक कल्पनाके पीछे आचार्यका आय यह है कि कोई भी मतः मपने-आपमे पूर्णं नहीं है । जिस प्रकारः उस मतकी स्थापना दलीलोसे हौ सक्ती है उसी प्रकार उसका उत्थापन भी विर्द्ध मतकी दलीरते हो सकता ह । स्थापना-उत्थापनाका यह् चक्र चलता रहता है । अतएव अनेकान्तवादमे ये भत यदि अपना उचित स्थान प्राप्त करं तब ही उनका गौचित्य है, अन्यथा नहीं । इसी आश्चयको सिद्ध करनेके किए आचार्ये क्रमशः एक-एक मत लेकर उसकी स्थापना की है भौर अन्य मतसे उसका निराकरण करके अन्यमतकी स्थापना की गयी हं । तब तीसरा मत उसकी भी उत्थापना करके अपनी स्थापना करता है--दइस प्रकार अन्तिम मत जब अपनी स्थापना करता है तब प्रथम मत उसका निराकरण करके अपनी स्थापना करता है--इस प्रकार चक्रका एकं परिवतं पूरा हु किन्तु चक्रका चलना यहीं समा नहीं होता, पूर्वोक्त प्रक्रियाका पुनराव्तंन होता ह । अपने कालके जिन मतोका संग्रह नयचक्रे है वे ये हँ--अज्ञानवाद, पुरुषाद्रेत, नियतिवाद, कारूवाद, स्व्रमाववाद, भाववोद, प्रकृति-गुरुषवाद, ईदवरवाद, कर्मवाद, द्रव्य-क्रियावाद, षड्पदार्थवाव, स्याद्वाद, शब्दा- दैत, ज्ानवाद, सामान्यबाद, अपोहुबाद, अवक्तव्यवाद, रूपादिसमुदायवाद, क्षणिकवाद, शून्यवाद--इन मुख्य
१. इसके विदोष परिचयके किए देखो, आगमयुगका जैनदर्शन ( आगरा ) पु० २९६ ।
प्रस्तावना ११
वादोके अलावा गौण भी अनेकवादोकी चर्चा देखी जा सकती है जैसे कि प्रत्यक्षलक्षग, सत्का्यं-असत्कार्य त्राद आदि ।
नयचक्रके नयविषयक मतका सारांश यह ह किं अंशसे किया हभ दर्शन नय है अतएव वही एकमात्र दर्शन नहीं हो सकता । उसका विरोधी दर्रन भी है गौर उसको भी वस्तुदर्शनमे स्थानं मिलना चाहिए । उन्होने उस समय प्रचलित विविध मतोको अर्थात् विविध जैनेतर मतोको ही नय माना ओौर उन्हीके समृहको जेनदर्रान या अनेकान्तवाद माना । ये ही जैनेतर मत पृथक्-पृथक् नयाभास हँ ओर अनेकान्तवादके चक्रमे यथास्थान सन्निहित होकर नय हूँ ।
स्पष्ट ह किं आचायं उमास्वातिकी नयकी समञ्च ओर आचार्य मल्लवादीकी नयकी समञ्चमें अन्तर है । उमास्वाति नयोको परमतोसे पथक् ही रखना चाहते हँ वहीं मल्लवादी परवादो-परमतोंको ही नयचक्रम स्थान देकर अनेकान्तवादकौी स्थापनाका प्रयत्न करते हँ । नयचक्रका यह् प्रयत्न उन्हीं तक सीमित रहा । केवर नयाभासोके व्णनमें परमतोको स्थान दिकानेमे वे निमित्त अवद्य हुए । अकलंकसे केकर अन्य सभी जेनाचा्यनिं नयाभासके दुष्टान्तरूपसे विविध ॒ दशंनोको स्थान दिया ह किन्तु नयोके वर्णनमें केवल जैनदृष्टिही
रखी है 1 उसे किसी अन्यदीय मतके साथ जोडा नहीं ह ।
यहाँ यह भी प्रासंगिक कह देना चाहिए कि विशेषावर्यकके कर्ता आचार्य जिनभद्र नयचक्रके इस मतसे सहमत हँ कि विविध नयोंका समूह ही जैनदर्शन है ( गा० ७२ )। किन्तु उन्होने भी नयवर्णनके प्रसंगमे नयरूपसे अन्यदीय मतका निरूपण नहीं किया किन्तु जंनसम्मत नयोंका निरूपण किया । इस अर्थमें वे उमास्वातिकां अनुसरण करतें हँ, नयचक्रका नहीं । सारांश किं इतना तो सिद्ध हगा कि सर्वनयोका समूह ही जैनदर्शन या सम्यग्दरंन हो सकता हँ । यही मत सि द्धसेनने भी स्पष्ट रूपसे स्वीकृत किया था ।
षडदशंनसमुच्चय ओर शास्त्रवार्तासमुच्चय
आचार्यं हरिभद्रने ये दो ग्रन्थ जिखि । उन दोनोमे उनकी रचनाकी दुष्ट भिन्न-भिन्न रही ह । षड्- दर्शनसमुच्चयमे तो छहों दशंनोका सामान्य परिचय करा देना ही उद्दिष्ट है । इसके विपरीत शास्त्रवार्ता- समुच्चयमे जेनदष्टिसे विविध द्शंनोका निराकरण करके जैनदर्रंन ओर अन्य दर्शनोमें भेद मिटाना हो तो तद्दर्शनमे किस प्रकारका संशोधन होना जरूरी है यह निर्दिष्ट किया है । अर्थात् जैनदर्शनके साथ अन्य-अन्य दर्शंनोका समन्वय उन दरनोमें कुछ संशोधन किया जाय तो हो सकता है--इस ओर इशारा आचार्यं हरिभद्रने किया है । नयचक्रकी पद्धति ओर शास्च्रवार्ताको पद्धतिमें यहभेदहै कि नयचक्रमे प्रथम एक दशंनको स्थापना होनेके बाद उसके विरोधमे अन्य दशन खडा होता है ओर उसके भी विरोधे क्रमशः अन्य दशंन-इस प्रकार तत्कारुके विविध दशनोका बलाबल देखकर मल्लवादीने एक दशेनके विरोधमें अन्य दर्शन खडा किया है ओर दर्शनचक्रकी रचनाकीरहै। कोई दर्शन सर्वथा प्रब नहीं ओर कोई दर्शन सर्वथा निर्बल नहीं । यह चित्र नयचक्रम है । तब शास्त्रवार्तासिमुच्चयमें अन्य सभी शंन निर्बल ही हैँ ओौर केवर जैनदर्शन ही सयुक्तिक है--यही स्थापना है । दोनों प्रन्थोमे समग्रभावसे भारतीय दर्दानोका संग्रह है । नयचक्रमें गौीण-मुख्य सभी सिद्धान्तोका ओर शास्ववातमिं मुख्य-मुख्य दरांनोका जर उनमें भी उनके मुख्य सिद्धान्तोका ही संग्रह है ।
जिस रूपमे आचाय हरिभ्रने दर्शनोकी छह् संख्या मान्य रखी है वह उनकी ही सञ्च है । सामान्य रूपसे छह दर्शनोमे छह वैदिक दर्शन ही गिने जाते है किन्तु आचार्य हरिभद्रको छह दर्शमोमे जैनदर्शन ओौर बोद्ध दर्शन भौ शामिरु करना था अतएव उन्होने १ सांख्य, २ योग, ३ नैयायिक, ४ वैरोषिक, ५ पूर्व मीमांसा ओर ६ उत्तरमीमांसा इनं छह वैदिकदर्शनोके स्थानमें छह संख्याकी पूति इस प्रकार की--१ बौद्ध, २ नैयायिक, २ सांख्य, ४ जैन, ५ वैदोषिकं ओर ६ जैमिनीय। ओरयेदही दर्शम हैँ ओर इन्दीमे सब
१२ षड्दरांनसमुच्चय
दर्शनोका संग्रह भो हो जाता है--एेसा स्पष्टीकरण किया है (का० १-२) मौर इन छह दशंनोको आस्तिक- वादकी संज्ञादी है ( का० ७७) ।
यह भी निदिष्ट है कि कुचके मतसे नैयायिकसे वैदोषिकोके मतको भिन्न माना नहीं जाता अतएव उनके मतानुसार पाच आस्तिक दर्शन हए ( का० ७८ ) ओौर छह संख्याकौ पूति वे लोकायत दर्शंनको `जोड- कर करते है अतएव हम यर्हां लोकायत दर्शनका भी निरूपण करेगे ( का० ७९ ) । सारांश यह् हुभा कि आचाय हरिभद्रने छह आस्तिकदर्शन ओौर एक - नास्तिकदर्शन--रोकायत द्शंनका प्रस्तुत षड्दर्शनसमुच्चयमें निरूपण किया है । इससे स्पष्ट है कि हरिमद्रने वेदान्तदर्शन या उत्तरमीमांसाको इसमें स्थान दिया नहीं । इसका कारण यह् हो सकता है कि उस कालमें अन्य दर्श॒नोके समान वेदान्तने पृथक् दर्शनके रूपम स्थान पाया नहीं था । वेदान्तदर्शनका दर्शाने स्थान भाचायं शंकरके भाष्य ओर उसकी टीका भामतीके बाद जिस प्रकारसे प्रतिष्ठित हआ सम्भवतः उसके पूर्वं उतनी प्रतिष्ठा उसकी नभीहो। यहभी कारणहो सकता है कि गुजरात राजस्थानमे उस काल तक वेदान्तकी उतनी प्रतिष्ठान भी हो ।
शास््रवातसिमुच्वयकी रचना त॒त्त्वसंग्रहको समक्ष रखकर हई है । दोनोमें अपनी-अपनी दुष्टिसे ज्ञान- दश्नोका निराकरण मुख्य ह । शास्व्रवार्तीसिमु च्वयमे जिन दर्शनोंका निराकरण है उनका दर्शनविभाग क्रमसे नहीं किन्तु विषय-विभागको केकर ह । प्रसिद्ध दर्रनोमे चावकिके भौतिकवादका सर्वप्रथम निरा- करण करिया गया है तदनन्तर स्वभाववाद आदिका जिनकी किं नयचक्रम प्रारस्भमें स्थापना ओर निरा- करण है । तदनन्तर ईश्वरवाद जो न्याय-वरोषिक संमत रहै, प्रकृति-पुरुषवाद ( सांख्यसंमत ), क्षणिकवाद ( बौद्ध ), विज्ञानाद्रैत ( योगाचार बौद्ध ), पृनः क्षणिकवाद ( बौद्ध ), ओौर शून्यवाद ( बौद्ध ) का निरा- करण करिया गया ह । तदनन्तर नित्यानित्यवाद ( जैन ) की स्थापना करके अद्रेतवाद ( वेदान्त ) का निरा- करण किया है । तदनन्तर जैनोके मुक्तिवादकी स्थापना मौर सर्व॑ज्ञताप्रतिषेधवाद ( मीमांसक ) ओर शब्दार्थसम्बन्धप्रतिषेधवदका निराकरण है । इससे स्पष्ट हं कि षडदर्शनसमुच्चयमें जिस वेदान्तको स्थान नहीं मिला था उसे शास्त्रवार्तसिमुच्वयमं ( का० ५२३४-५५२ ) मिलाहै। इसका कारण सम्भवतः यह् है कि चार्य हरिभद्रने शान्तरक्षितका तत्त्व-संग्रह देखा भौर उसर्मे-से प्रस्तुत वादके विषयमे उन्होने जाना तब उक्ष विषयकी उनकी जिज्ञासा बलवती हृरई ओर अन्य सामग्रीको भी उपलब्ध किया । तत्त्व-संग्रहुको टीकामे उसे ओपनिषदिक अद्रैतावलम्नी कहा गया है ( का० ३२८ ) 1 यह भी ध्यान देनेकी बात ह कि तत्त्व-संग्रहमे भी आत्मपरीक्षा प्रकरणम अओौपनिषदात्मपरीक्षा--यहं एकं अवान्तर भरकरण है । वेदान्तके विषयमे उसमे कोई स्वतन्त्र ^“परीक्षा' नहीं हं । तत्त्व-संग्रहके पूर्वमे भौ समन्तभद्राचार्यकी आप्मीमांसामें अदैतवादका निराकरण था ही । वह॒ भी आचार्य हरिभद्रने षङ्दशंनकौ रचनाके पूवंनदेखा हो यह् सम्भव नहीं गता । अतएव षडदर्शंनमें वेदान्तको स्वतन्त्र दर्निका स्थान न देनेमें यही कारणो सक्ताह कि उस-दर्शनकी प्रमुख दर्श॑नके रूपमें प्रतिष्ठा जम पायी न थी ।
वशंनसग्राहुक अन्य ग्रन्थ ।
| प्रस्तुत षड्दर्शनसमुच्चयका अनुसरण करके अन्य जैनाचार्योनि दर्शनसंग्राहक ग्रन्थ लिखि । ओौरः उनमें भी उन्होने आचार्य हरिभद्र जैसा ही दर्शंनोका परिचय मात्र देनेका उरेश्य रखा हं ।
आचार्य हरिभद्रके बाद किसी जैन मुनिन ' 'सर्वसिद्धान्तभ्रवेशकः' ग्रन्थ लिखा था। उसकी ताल- पत्रमे वि० १२०१ ने लिली गयी प्रति उपलब्ध है--इससे पता चरता है कि वह् राजशेखरसे भी पूर्वकी रचना है । मुनिश्नी जंबूविजयजीने इस पुस्तिकाका सम्पादन किया है ओर जैन साहित्य विकास मण्डल, बम्बरईये वह ई० १९६४ मे प्रकार्चित है । इसमें क्रमशः नैयायिक, वंशेषिक, जंन, सास्य, बौद्ध, मीमांसा ओर ोकायत दरशंनोका परिवय है 1 आचार्म हरिभद्रका षड्दर्शन पयोमें ह तब यह गयम ह । वही दरशंन इसमे भी है जो आचार्य हरिभद्रके षडदर्श॑नमें हँ । इस ग्रन्थमें दर्रनोके प्रमाण ओौर प्रमेयका परिचय कराना लेखकको अभिप्रेत ह् ।
ए)
=-= ~
क र स्ध
=
स =
= स= ----- ल = ==
प्रस्तावनीं १३
वायडगच्छके जी वदेवसुरिके शिष्य चायं जिनदत्तसूरि ( वि° १२६५ ) ने "विवेक विकास"१की रचना की है ( प्रकाशक,. सरस्वती ग्रन्थमाला कार्याय, जागरा, वि० १९७६ ) उसके अष्टम उल्लासमे "षड्दरनविचार' ,नामका प्रकरण ह-उसमे जेन, मीमांखक, बौद्ध, सांख्य, रोव ( नैयायिक भौर वैरोषिक ) भौर नास्तिक--इन छहों दर्शनोका संक्षेपमें परिचय दिया गया है । प्रस्तुत ग्रन्थमे हौवमें न्याय-वैयेषिकका समावेदा ह॑- यह ध्यान देने योग्य ह 1 यह भी आचाय हरिसद्रके समान केवर परिचयात्मक प्रकरण ह । अन्तम जो उपदेश दिया ह वह् ध्यान देने योग्य है-
सन्तु शास्त्राणि सर्वाणि सरहस्यानि दूरतः । एकमप्यक्षरं सम्यक् शिक्षितं निष्फल नहि । ८.३११ यह प्रकरण ६६ रोक प्रमाण हुं ।
आचायं शंकरकृत माना जानेवाला ` "सर्वसिद्धान्तसंग्रह' अथवा 'सर्वदर्शनसिद्धान्तसंग्रह' मद्रास सरकारके प्रेससे ई० १९०९ में श्री रगाचायं दारा सम्पादित होकर प्रकाशित हुआ है । श्री पं° सुखलालजी- को यह् श्रसिद्ध अदत वेदान्तके आद्यशक राचार्यकी कृति होनेमे सन्देह है ( समदर्शी आचार्यं हरिभद्र, पु०४२)। किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह् कृति सर्वदर्शनसंग्रह ( माधवाचार्य ) से प्राचीन है । इस भ्रन्थकारके मतसे भी वैदिक ओर अवेदिक एसा दर्शन विभाग है । वैदिकोमे इनके मतसे जन, बौद्ध ओौर बृहस्पतिके मतोका समावेश नहीं है । इस ग्रन्थे भी माधवाचार्यके सर्वदर्शनसंग्रहकी तरह पूर्व-पूवं दशनका उत्तर -उत्तर दर्शनके द्वारा निराकरण है। दर्शनोका इस प्रकार निराकरण करके अन्तमं अद्वैत वेदान्तकी प्रतिष्ठा की गयी ह । दरदनोंका क्रम इस ग्रन्थमें इस प्रकार है-
१. खोकायतिकपश्च, २. आर्हतपक्ष, ३. माध्यमिक, ४. योगाचार, ५. सौत्रान्तिक, ६. वैभाषिक, ७. वैशेषिक, ८. नैयायिक, <. प्रभाकर, १० भदटुाचार्य ( कुमारांश = कुमारि ), ११. सांख्य, १२. पतञ्जक्ि, १३. वेदव्यास, १४. वेदान्त । इन दर्शनोमे-से. वेदग्यासके दर्शनके नामसे जो पक्ष उपस्थित किया गया हं वह् महाभारतका दर्शन हँ । जेनदशनको आर्हृतपक्षमे उपस्थित किया गया ह किन्तु लेखकने भ्रमपूर्णं बातोका उल्लेख किया है । पता नहीं उनके समक्त जँनदर्नका कौन-सा म्रन्थ था । केखक जैनोके मात्र दिगम्बर सम्प्रदायसे परिचित ह । बौद्धोके चार पक्षोको अधिकारी भेदसे स्वीकृत किया है । इतना ही नहीं किन्तु बृहस्पति, आर्हत ओौर बौद्धोके मतोको भी अधिकारीके भेदसे भिन्न माने है । अन्य वैदिक मतोके विषयमे भी इनका कहना हँ कि ये सभी वेदान्त शास्त्रके अर्थका प्रतिपादन करनेके लिए ही तत्पर है- वेदान्तशास्वसिद्धान्तः संक्षेपांदथ कथ्यंते । तदर्थप्रवणाः प्रायः सिद्धान्ताः परवादिनाम् ।॥ १२.१ वेदबाह्य दज्ंनोको केखकं नास्तिककी उपाधि देता है--
“नास्तिकान् वेदबाह्यांस्तान् बौद्धलखोकायतार्हृतान् ॥ ५.१
सायण माधवाचायं ( ई० १३००) ने "सर्वदर्शनसंग्रह नामक म्रन्थकी रचना की उसकी पद्धति नयचक्रसे मिक्तीहै। भेद यहु हु किं उन्होने क्रमशः नयचक्रकी तरह, पूर्वपूर्वं दशंनका उत्तर+उत्तर दर्शनसे खण्डन करा कर भी अन्तमे अहंतवेदान्तकी प्रतिष्ठाकी हु 1 उस अन्तिम दशनका खण्डन किसी दर्शनसे नहीं कराया । जब कि नयचक्रगत. अन्तिमि मतका निराकरण सर्वप्रथम उपस्थित मतके द्वारा किया गया है ओर खण्डन-मण्डनका चक्र प्रव्तिति है। नयचक्र'के मतसे उपस्थित सभी मत सम्मिक्ितिहोंतो सम्यग्दर्शन या अनेकान्त होता ह । जब कि स्वंदर्रनसंग्रह'के मतसे अन्तिम अद्रतदर्ान ही सम्यक् है । सायण माधवाचार्यने क्रमराः जिन दरांनोका निराकरण किया है ओर अन्तमं अद्रेतवाद उपस्थित किया है-- वे ये हँ--१. चार्वाकद्शंन, २. बौदधदशन ( चारों भेद ), ३. दिगम्बर ( आर्हत दर्शन ), ४. रामानुज, ५. पूर्णप्रज्ञदर्शन, ६. नकूखीशपारुपतदर्शन, ७. माहेश्वर ( दौवदशंन ), ८. प्रत्यभिज्ञादर्शन, ९. रसेरवर-
१. इसी ग्रन्थमे-से सर्वदर्शनसंग्रहमें “बौद्धवर्शान'के रोक उद्धृत है--सर्वदर्शनसंग्रह प° ४६ ( पूना ) ।
१४ षड्द्र्रानसमुच्चय
दलन, १०. ओलूक्यदर्शन ( वैशेषिक ), ११. अक्षपाददर्शन ( नैयायिक ), १२. जेमिनिदरशन ( मीमांसा ), १३. पाणिनिदर्न, १४. सांख्यदर्रान, १५. पातंजलदर्शन, १६. शांकरदर्शंन ( वेदान्तशास्त्र ) ।
श्रस्थानभेद "के ऊेलकने जिस उदारताका परिचय दिया ह वह भी इस सवंदर्शनसंग्रहमें नहीं । वह त्तो ॑ द्रैतको ही अन्तिम सत्य मानता है । नयचक्रम सर्वदर्शनोके समृहको अनेकान्तवाद कहा हं ओर प्रत्येक दर्शानको एकान्त कहा है । उसके अनुसार अद्वैत मत मी एक एकान्त ही ठहरता ह अन्तिम सत्य नहीं । जब कि सर्वदर्शन संग्रहके मतसे अद्वैत ही अन्तिम सत्य है । बाकी सब भिध्या हं । वस्तुतः नथचक्र ओौर सवंदर्शनसंग्रह इन दोनोका एक ही ध्येय दै ओर वह यह कि अपने-अपने दरशनको सर्वोपरि सिद्ध करना ।
माधवसरस्वती ( ? ई० १३५० ) नै 'सर्व॑दर्शनकौमुदी' नामक ग्रन्थ लिखा है जो त्रिवेन्द्रम् संस्कृत ग्रन्थमालामें ई० १९३८ मे प्रकाशित ह । इस ग्रन्थकारने भी वंदिक-अवेदिक-इस प्रकारका दरनविभाग स्थिर किया है । वेदको प्रमाण माननेवालोको वह् शिष्ट मानता है ओर वेदके प्रमाणको स्वीकार नहीं करतेवाके बौद्धको अरिष्ट । माधव सरस्वतीने वदिक ओर अवंदिक एसे दो भेद दर्शनोके किये हैँ । वैदिक द्बनोमें इनके अनुसार तर्क, तन्त्र ओर सांख्य ये तीन दर्शन हँ । तकंके दो भेद ह--वंरोषिक ओौर नैयायिक । तन्त्र- का विभाजन इस प्रकार है--.
तन्त्र राब्दमीमांसा अर्थमीमांसा ( जल्याकरण ) । कर्मकाण्डविचार म ४ = उत्तरमीमांसा भाद प्रभाकर |
सांख्यदर्शनके दो भेदोका निर्देश है-पेदवरसांख्य = योगदर्शन ओर निरीरवरसांख्य = प्रकृतिपुरुषके भेदका || | प्रतिपादक । इस प्रकार वैदिक दर्दनोके छह भेद हँ--योग, सांख्य, पूवंमीमांसा, उत्तरमीमांसा, नैयायिक | | ओर वंलेषिक । ४ ।
अरवैदिकदर्शन कै तीन भेद है--बौद्ध, चार्वाक ओौर आर्हत । तथा बौद्धदशानके चार भेद ह--माध्य- 8 मिक, योगाचारं, सौत्रान्तिक, वै माषिकः । |
इस प्रन्थकी विदोषता यह है कि वह॒ इस क्रमसे दर्शनोंका निरूपण करता हं-- वंशेषिकदर्ानका सर्व- प्रथम निरूपण ह । किन्तु वैरिषकोके ही द्वारा विपर्ययके निरूपण प्रसंगमें ख्यातिवादकी च्चा की गयी है-- उसीर्मे सदसत्ख्यातिको माननेवारे जैनोका द्धन पर्वपक्षमे निरूपित है । भौर वंशोषिकों दारा विपरीतख्याति की स्थापनाके छिए उसका निराक्ररण किया गया है । अतएव जनदर्गनका निरूपण पृथक् करनेको आवद्य- कता लेखकने मानी नहीं हैः
वैरोषिकके अनन्तर नैयायिक दर्शनका निरूपण है ( पु० ६३ ) ओर क्रमशः मीमांसा, सांख्य ओर योगदर्शनका निरूपर्ण है ।
१. वेदप्रामाण्याभ्युपगन्ता रिष्टः । तदनभ्भुपगन्ता . बौदढोऽरिष्टः ।-पृ* ३ । २. सर्वंदर्शनकौमुदौ पु ४। ३. सर्वदर्शनकौमुदी प० ३४ ओौर पृ० १०८ । लेखकने जेनदर्शनका पूर्वपक्च जो उपस्थित किया हँ वह् अन्नान्त नहीं है ।
षस्तावना १५
राजदोखरका “षड्दरनससुच्चय' आचार्य हरिभद्रके षडदर्शनसमुच्चयकां अनुकरण होते हुए भमी सामग्रीकौ दष्टिसे विस्तृत है । इसमें तततत् दर्धानोके आचारो ओौर वेदाभूषाका भी निरूपण ह । इस म्रन्थमें दरनोका परिचय इस क्रमसे है-- |
१ जेन, २ सांख्य, ३ जैमिनीय, -४ योग, ५ वैदोषिक ओर £ सौगत । योगदर्शनका परिचय, अष्टांग- योग, जो कि सर्वदर्शन साधारण आचार है, उसका परित्रय देकर सम्पन्न किया है । तथा उक्त सभी दशंन जीवको मानते है जब कि नास्तिक उसे भी नहीं मानते यह कहकर वचार्वाकंकी दलीछोका सग्रह करके उस दर्शनका भी परिचय अन्तमं दे दिया है । ये राजशेखर वि० १४०५ मे विच्मान थे एसा उनके द्वारा
रचित प्रबन्ध कोशकी प्रशस्तिसे ज्ञात. होता है । यह षडदर्शनसमुचज्चय यशोविजय जैन अ्न्थमालामे वारा- णसीसे वीर सं० २४३८ मे प्रकाशित हे 1
आचार्य मेस्तुंगङृत (६० १४ वीका उत्तरार्धं) "षडदर्शननि्णय' नामक ग्रन्थक हस्तप्रति नं ° १६६६ बाम्बे ब्रांच, रोय एसिथाटिक सोसायटीमें विद्यमान है । उसकी फोटो कापी लछालभाई द० विद्यामन्दिर, अहमदाबादमें है । उसकी प्रतिक्पि डं° नगीनं शाहने की है । उसे पठनेसे ज्ञात होता ह कि उसमें आचार्यं मेर्तुगने क्रमशः बौद्ध, मीमांसा ( वेदान्तके साथ ), सास्य, नैयायिक, वैशेषिक ओौर जनदर्शन--इन छह दनो-सम्बन्धी मीमांसा की ह । इस प्रन्थमें तत्तत् दर्दन-सम्बन्धी खासकर देव, गुरु ओौर धर्मके स्वरूप- का निरूपण करके जैनमतानुसार उसकी समीक्षा की गयी है । ओर अन्तमं जैनसंमत देव-गुसु-धर्मका स्वरूप निरूपित करके वैसा ही स्वरूप महाभारत, पुराण, स्मृति आदिसे भी सर्माधित होता है एेसा दिखानेका प्रयत्न किया गया है । आ० मेर्तुंगकी यह रचना वि° १४४४ ओौर वि० १४४९ के बीच हुई हँ एेसा श्ची देसाई कृत “जेन साहित्यनो संसिपसत इतिहास” ( प०.४४२ ) से प्रतीत होता है ।
मधुसूदन सरस्वती ( ई० १५४०-१६४७ ) द्वारा रचित ॒स्थानभेद' भी सर्वदर्शनसंप्राहकं ग्रन्थ कहा जा सकता है। उसमे सभी प्रधान शास्त्रोका परिगणन किया है। तदनुसार वेदके उपांगोमें पुराण, न्याय, मीमांसा ओर धमंशास्त्रका संग्रह किया गया है । ओौर उनके मतानुसार वैरोषिक दर्शनका न्याये, वेदान्तका मीमांसामे तथा साख्य ओर पारतंजल, पाशुपत भौर वैष्णव आदिका धर्मशास्त्रे समावेश है। गौर इन सभीको उन्होने "आस्तिकः माना है ।२ |
मधुसूदन सरस्वतीने नास्तिकोकेः भी छह प्रस्थानोका उल्छेख. किया है--वे ये ह--माघ्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक ओर वंभाषिक-ये चार सौगत प्रस्थान तथा चार्वाक ओर दिगम्बर । मधुसूदनका कहना है कि शास्त्रोमे इन प्रस्थानोका समावेश उचित नहीं क्योकि वेदबाह्य होनेसे पुरुषार्थमं परम्परासे भी म्लेच्छ आदि प्रस्थानोकी तरह उनका फोई उपयोग नही है । सारांश यह है किं उनके मतमें न्याय, वैशेषिक, सांख्य, -योग, पूर्वं गौर उत्तर भमीमांसा--श्न छह प्रसिद्ध वैदिक दर्शनोके अलावा पाशुपत भौर
वैष्णव = पाचःरा्ोका भी वैदिक आस्तिक दर्शनोमे . समावेश ह । ओर . नास्तिक अवदिक द्शनोमे भी छह दर्शंन उनको अभिप्रेत है 1
॥ वैदिकदर्शनोके पारस्परिक विरोधका समाधान उन्होने यह केहकेर किया है कि ये सभी मुनि भान्त तो हो नहीं सकते क्योकि वे सर्वज्ञ ये । किन्तु बोह्य विषयमे लगे हए रोगोको परमपुरुषार्थ प्रविष्ट होना कठिन ५ होता है अतएव नास्तिकोका निराकरण करनेके किए इन भुनि्योने प्रकारभेदं किये है । लोगोने इन मृनियोका आरय समज्ञा नहीं ओर कल्पना करने कगे कि वेदसे विरोधी अर्थमें भी इन मुनिर्योका तात्पर्य है ओर उसीका अनुसरण करने लगे है" ।
१. प्रस्थानभेद ( पृस्तकाखय स० स० मंडल, बरोडा;.ई० १९३५ ) पु०१।२. बही पु १। ३. प० ५। ४. पु० ५। ५. प्रस्थानभेद पू० ५७ ।
१६ षडदशं नसमुच्चय |
षड्दरंनसमुच्चयको सोमतिकककृत 'वृत्तिके अन्तमे “कुषुषडदशंनसमुच्चय "के नामसे -अज्ञातकर्तृक
एक कृति मुद्रित हँ उसके प्रारम्भमे-- | जैनं नैयायिकं बौद्धं काणादं जैमनीयकम् । सांख्यं षडदर्शनीयं [च] नास्तिकीयं तु सप्तमम् ॥ |
॥
यह कारिका देकर क्रमशः उक्त दर्शानोका परिचय अतिसंक्षेपमें दिया गया हँ । अन्तमं अन्य दर्शंनोको दुर्नय- कोटिमें रखकर जंनदर्शनको श्रमाण” बताया गया है । इससे सिद्ध ह किः इसका कर्तां कोई जेन लेखक ह । |
0
आगचायं हरिभद्र । | | | आचाय हरिभद्र ( वि० ७५७-८२७ } के जीवन ओौर ङेखन के विषयमे पयसि लिखा गया हं । | अतएव यहां उस विषयमे पुनरावृत्ति अनावर्यक ह । यहां इतना ही कहना पर्याप होगा कि जिज्ञासु पूज्य | पं० श्री सुखलारुजी छिखित "समदर्शी आचार्य हरिभद्र' > देख लं । | आचार्यं हरिभद्रके ग्रन्थोकी सूचीको देखनेसे पता चरता ह कि उन्होने जैनागमकी अनेक टीकां | छ्िखीं, जैनागमोके विविध ,विषयोंको ऊेकर अनेक प्रकरण ग्रन्थ लिखे, कथाग्रन्थ छिखे, दशंन भौर योगके भी अनेक ग्रन्थ कखे, ज्यौतिष ओर स्तुतिग्रन्थ भी छकिखे । संस्कृत ओर प्राकृत दोनों भाषाओमे उन्होने ज्िखा (ह है । यह कहा जा सकता ह कि अपने कालमें. जैनवाङ्मयके विविधं क्षेत्रोमे उन्होने प्रदान ही नहीं किया | किन्तु तत्कारकी जो भारतीय ज॑नेतर विदासमृद्धि थी उसरमे-से ्रमरकी तरह मधु संचय करके जैनसाहित्यकी (, श्रीवृद्धि की । आचार ओौर दर्शनके जो मन्तव्य जैनधर्मके अनुकूल दिखाई पड़े उन्हें अपने ग्रन्थोमे निबद्ध ! कर दिया। ॥ । उनके दो रूप दिखाई पडते है--एक वह रूप जो धूर्तख्यान जसे ग्रन्थोके ठेखकके रूपमे तथा आगमोंकी टीकाके ठेखकके रूपमे हु । इसमे एक कटर साम्प्रदायिके ठेखकके रूपमे आचाय हरिभद्र उपस्थित होते हँ । उनका दूसरा रूप वह ह जो शास्त्रवारतसिमुच्चय आदि दार्शनिक ग्रन्थोमें ओौर उनके योगविषयक | अनेक ्रन्थोमें दिखाई पड़ता ह । इनमें वि रोधीके साथ समाधानकतकि रूपमे तथा विरोधीकी भी ग्राह्य बातोके स्वीकतकि रूपमे माचार्यं हरिभद्र उपस्थित होते ह । उनका यह दुसरा रूप सम्भवतः विद्यापरिपाकका फल है । अतएव वह उनके जीवनकालकी उत्तरावधिमें ही सम्भव ह । जेनधमंके बाह्य आचार-विचारके समथक- | के रूपमे उनका प्राथमिक रूप है जब किं तात्विकधर्मके समथंकरूपमे उनका परिनिष्पन्नरूप ह । अन्तमुख | किसी भी व्यक्तिके जीवनका एेसा होना स्वाभाविक ह । सम्भव हं कि उन्होने केवर योगके ग्रन्थ ही नहीं : लिखि, कुछ योगसाधना भी की होगी । -उसीका परिणाम है कि जीव्रनमें कटर धा्मिकताका स्थान उदारतानें | ।
ज्याहं।
जाचयिं गुणरत्नसुरि |
गणरत्न नामके अनेक आचार्यं हए दँ किन्तु प्रस्तुतमें षड्दर्शनसमुच्चयकी टीकाके कर्ता गुणरत्न वें । है जो आ० ग्देवसुन्वरसूरिके रिष्यरूपसे अपनेको प्रस्तुत ॒टीकाके अधिकारोके अन्तमं दी गयी प्रशस्तिं | प्रख्यात करते है--पु० ७५, १३९, १५९, ४०५, ४२९ ओर ४६२ । देवसुन्दरका जन्म वि९ १३९६, वि० १४०४ में दीक्षा ओर वि १५४२० में आचार्यपद दै-मुनिसुन्दरङ़ृत गुर्वावली इलो० ३०१ ।: | गुर्बाविीमें देवसुन्दरकी प्रशंसाके अनेक पद्य हैँ । इससे पता चरता हँ कि वे अपने कारके प्रभावक आचाय है । देवसुन्दर सूरिके कई रिष्य थे जो सूरिपदसे विभूषित भे. उनमें. गुणरत्न एक हँ ( --गुर्वावली इलोक | ३१८, ३२७, ३६४, ३७७, ३९१ इत्यादि ) । ॥ . |
१. मुक्ताबाई ज्ञानमन्दिर, उभोर्ई-द्रारा प्रकाशित । २. प्रकाशक, बम्बई विश्वविद्यार्य, १९६१ (गुजरातो) गौर 'समदर्शो आचर्य हरिभद्र, प्रकाशक; राजस्थान प्राच्यप्रतिष्ठान, जोधपुर, ई० १९६३ (हिन्दी) । ३. देवसुन्दर सूरिके लिए देखो, सोमसौभाग्य सगं ५, तथा मुनियुन्दरङृत गुर्वावटी ३००-३२५ ।
प्रस्तावना ९७
मुनिसुर्दर सूरिने वि० १४६६ मेः गुर्वावी -( यशोविजय जैन ग्रन्थमाला, वीर सं २४२७ ) को समाप्त किया है ( इरो० ४९३ }-अतएव गुणरत्नके वे समकालीन कहे जा सकते हैँ । क्योकि गुणरत्नका आचार्यपद महोत्सव वि ० १४४२ में हुआ ओौर वि० १४६६ मे ही उन्होने क्रियारत्नसमुच्चय किला हं । अत्. एव गुर्वावरीमें मुनिसुन्दरने गुणरत्नके विषयमे जो प्रशस्ति जिखी हं वह समक्राटीन होनेसे उसका महत्व है--गार्वावली दोक ३७७-३९० । मुनिसु्दरने गुणरतनकी प्रशंसामे जो कु छिखा ह उससे ज्ञात होता है कि वे वादविच्यामें कुश थे ओर वादमें उन्होंने अनेक प्रतिवादियोको जीत ख्या था उससे उनकी कीति कौली हई थी । अन्यके लिए कठिन अ्रन्थोमे भी उनकी बुद्धिका सहज प्रवेश था । उनका चरित्र निमल था । उनकी प्रतिज्ञा थी किं किसीके प्रति बाधक नहीं बनना या बैठते समय दीवाकुका सहारा ( अवष्टम्भ ) नहीं केना; किसीके प्रति रोष नहीं करना ओर विकथा नहीं करनी । सर्वविद्यामें कुश थे । उनसे थोडा भी पद़- कर शिष्य अन्योको वशमें छे सकते थे । व्याकरण, साहित्य, आगम, ज्योतिष ओर तकंमें तथा वादविद्यामें निपुण थे । स्वदर्शन हो भा परदर्रन उनकी प्रतिभा स्वंत्र व्याप्त थी । उनमें ज्ञानके किए उद्यम, नित्य अप्रमाद ओर स्मरणराक्ति अतुलनीय थे। उन्होने तत्तवा्थंका दर्शन करानेवाखी ज्ञाननेत्रके अंजनके लिए दाकाकारूप षडदर्शनसमुच्चयकी टीकाकी रचना की । व्याकरणसमुद्रका अवगाहन करके क्रियारत्समुच्चय- का विद्रज्जनोंको उपहार दिया । वे सरस्वतीके परमोपासक थे--इत्यादि । ^
मुनिसुन्दरकी गुर्वावरीमें यह प्रशंसा अकारण नहीं हं यह आ० गुणरत्नके ग्रन्थोके .अभ्यासी सहजं ही में स्वीकार करेगे । उनके व्याकरणके ज्ञानका प्रमाण क्रियारत्तसमुच्चय ग्रन्थ है, दाश्ंनिक विद्याके विषयमे प्रस्तुत षड्दर्शनसमुच्चयकी टीका मौजूद ह । अनेक. अव्चूणि उनके आगमज्ञानकी साक्षी देती ह । वादविद्यामें कुश थे इसका प्रमाण अंचकमतनिराकरण ओौर प्रस्तुत टीका देते हैँ । अतएव मुनि- सुन्दरने कोई गकत बात कही हो एेसा नहीं खुगता ।
आचार्य गुणरत्नका विहारकषेत्र गुजरात-राजस्थान रहा ह । राजस्थाने तो उन्होने जैनप्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा भी करवायी है एेसा "बीकानेर जैन केखसंग्रह"से पता चरता हँ । बीकानेरके चिन्तामणिजीके मन्दिरमें दो प्रतिमाओंपर लेख हैँ ( न° ६४५ तथा ६५१ ) जिनसे पता चरता है कि वि० १४६९ मे श्वी आदिनाथ- के बिम्बोकी प्रतिष्टा आ० गुणरत्नने को थी 1 उन दोनों बिम्बोको प्राग्वाट ज्ञातिके श्वेष्ठि ताल्हाके श्वेयार्थं उनके पुत्रादि परिवारने बनवाया था ।
समय
आचार्य गुणरत्नके जन्मके विषयमे गुर्वावलीमें उल्लेख नहीं है किन्तु उनके आचार्यपदका महोत्सव कूलमण्डनके सूरिपदके महोत्सवके प्रसंगमे रखलमसिहने किया एेसा स्पष्ट उल्लेख गुर्वावलीमें ( ३७४ ) है । ओर गुर्वावरीमे ही कुलमण्डनको वि० १४४२ मे सुरिपद मिला एसा उल्लेल है--( श्लोक ३६८ } । वि० १४४२ मेँ गुणरत्नके सूरिपदका महोत्सव हुभा एेसा उल्लेख पञ्चाशक वृत्तिकी वि° १४८५२ में ही की गयी प्रतिकिपिको प्रशस्तिमे हं-जैनपुस्तकप्ररस्ति, सिघी जैन श्रन्थमाला, ई० १९४३, पु० ४३ । इससे सिद्ध होता हं उनके सूरिपदका महोत्सव वि० १४४२ (ई० १३८५) मे हुआ । उक्त जँनपुस्तक प्रशस्ति संग्रहमें उद्धृत एक प्र शस्तिम ( पु ४० ) उनको देवसुन्दरसूरिके ज्ञानसागर आदि सूरिके साथ सूरिरूपमें बताया गया हं । यह् प्रशस्ति जैसा कि सम्पादक श्री आचायं जिनविजयजीने वि° १४३६. मे लिखित भानां है तदनुसार यह मानना होगा कि गुरुते उनको वि° १४३६ के पव सूरिपद दिया था किन्तु सूरिपदका महोत्सव कु ख्मण्डनके सूरिपदके महोत्सवके साथ वि० १४४२ में हुआ । अथवा एसा भी माना जाः सकता
१. गणरत्नके विषयमे इतः पर्वं जो छिखला गया है उसके किए देखो, जेनपरंपरानो इतिहास भाग ३ पु० ४३५; जेनसाहित्यनो संक्षिप्त इतिहास, पु० ४६२-४६२ ।
१८ षड्द्शंनसमुच्चय
हं कि जिस प्रतिसे यह प्रशस्ति मुद्रित ह वह प्रति वि० १४३६ में लिखी गयी प्रतिको आदर्शभूत मानकर प्रतिक्िपिरूप हुं ।
गुणरत्नको माचार्यपद वि० १४५४२ मेँ मिला इस तथ्यके आधारपर उनके जीवनका प्रारम्भिक समय गौर उनकी अन्तिम अवध्रिका विचार किया जाय तो उल्ठेखोके अनुसार वि० १४५७ में कल्पान्त- वाच्य, वि० १४५९ में कर्मग्रन्थ अवचूरि गौर वि० १४६६ में क्रियारत्नसमुच्चयकी रचना की ओौर १४६९ मे बिकानेरमे प्रतिष्ठा की । इससे माना जा सकता ह किं वे प्रायः वि० १४०० से १४७५ तक जीवित रहे होगे । अतएव उनका समय प्रायः ई० १३४३ से ई० १४१८ माना जा सकता हँ । यह समय इस आधार- पर स्थिर किया जा सकता ह किं उनको जब आचार्यपदं मिला तब वे ४२ वर्षकी उ्रके होगे। यदि इस भयुमें हानि-वृद्धि किसी प्रमाणसेकी जा सके तो उनका समय भी तदनुसार थोड़ा इधर-उधर हौ
सकता हं ।
आचायं गुणरत्नके ग्रन्थ
आ० गुणरत्नने ये ग्रन्थ किख ह-
( १ ) कल्पान्तर्वाच्य--आ० गुणरत्नने इसकी रचना सं° १४५७ मे की ह । अभीतक अमद्वित है । इसमे प्रारम्भमें पयुंषणपर्वकी महिमाका निरूपण हं । उसके बाद कल्पसुत्रके श्रवणकी महिमाका वर्णन है तथा कल्पश्रवणकी विधि तदनन्तर बतायी गयी हँ । इस प्रसंगमें कथां भी दी गयी हँ । तदनन्तर कल्पसूत्रके जिनचरित. मादि विषयोकौ चर्चाकी गयी हं ।
( २) क्रियारत्नसमुच्चय--इस ग्रन्थको आचार्यं हैमचन्द्रके शब्दानुशासनके आधारपर धातुओंका संकलन करके आचायं गुणरत्नने निर्मित क्रिया ह । प्रशस्तिमे निदिष्ट ह कि यह ग्रन्थ वि० १४६६ ( ई १४०९ ) मेँ समासत किया गया था । इसमें सभी कालके धातुके रूप किस प्रकार होते हँ यह प्रयोगोकि उदाहरणोके साथ दिखाया गया हैं । सर्वभ्रथम कारके विभागका स्पष्टीकरण करके म्वादिगणके क्रमसे गणोके धातुजोके शूपोको निदिष्ट किया गया ह । तदनन्तर सौत्रधातु ओर नामधातुके रूप दिये गये है । अन्तमं प्रशस्तिमें गुरुपवक्रमरमे सुधमसि रेकर अपने गुर भआचायं देवसुन्दरका कान्यमय परिचय दिया ह । यह् ग्रन्थ यशोविजय जैनग्रन्थमाला, काशीके दसवें पुष्पके रूपमेँ वीर सं° २४२३४ ( ई० १९०७) में मुद्रित हुआ ह ।
( ३ ) चतुःशरणादि प्रकीर्णकावचूरि--चतुःशरण, आतुरप्रत्याख्यान, संस्तारक ओर भक्त परिज्ञा--इन चार प्रकीर्णंकोकी अवचूरि जिसे विषमपदविवरण भी कहा गया ह, आचार्यं गणरत्नने छ्िखी है । प्रतोके विषयमे जिनरत्नकोषे निदश हं । किन्तु अभीतक यह् अमुद्रित ह ।
( ४) कमंग्रत्थ-अवचूरि--देवेन्दरसूरिकृत कर्मविपाक, कर्मस्तव, बन्धस्वामित्व, षडीति ओौर शतक-ये पाच भौर चन्द्रषिमहत्तरकृत सप्ततिका--इन छह कर्मग्रन्थोकी अवचूरि वि० १४५९ में आचार्यं गुणरत्नने छल्ली ह । प्रशस्तिके किए देखो, छा० द० विद्यामन्दिरगत पूण पुण्यविजयजीके संग्रहगत नं ° ४५२३ की प्रति । अन्य प्रतियोरमे भी यह रचनाकाल उपलन्ध होता ह । देखे जिनरत्नकोषगत उल्लेख । अभी यह अमुद्रित हं ।
( ५ ) क्षेत्रसमास-अवच्णि--आचार्य सोमतिरुकभुरिके पूर्वं भी क्षेत्रसमास नामक प्रकरण जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणादिनें छिखे थे । अतएव आचाय सोमतिरकके क्षेत्रसमासको आचार्य गणरत्नने नन्यत्र समाखकी संज्ञा दी हं भौर उसको संक्षि टीका अवचूरणिके नामसे लिली है । इसकी करई प्रति्यां मिलती है ( जिनरत्नकोष, पृष्ठ ९९ देखे ) किन्तु अभीतक यह् अप्रकारित है ।
ला० द° विद्यामन्दिरके प° मुनिराज श्री पुण्थविजयजीके सं्रहकी नं० ३६६८ की प्रतिके अनुसार इसका प्रारम्भ मौर प्रशस्तिकी कारिकाएं यहां दी-जाती है । प्रारम्भ है--
ब्रस्तावना १९.
““श्रीवीरजिनवरेनद्रं सर्वेकान्ततमोरविम् । नत्वा नभ्यच्रहरकषेत्रसमासो इयवष्ूण्यंते ।॥१।। एेदंयुगीनान् जनान् संक्षिक्षस्चीनपक््य मगवद्धिः । श्रीसोमतिरुकसू रीदवरैर्विदघेऽयमतिमहाथंः ।।२।। तत्रेदमादिसूत्रम्-- सि रिनिखयं ° स्पष्टम् ।।°›
अन्तमें प्रशस्ति है-
(“स्पूजद् गुणप्रकरवासितविष्टपानाम् , श्रीदेवसुन्दरमहन्तमसूरिराजाम् ।
शिष्योऽवचूणिं मकरोद्गुणरेत्नसूरिः संस्कारबोधविधये स्वपराथमेताम् ॥१।
श्रीबरद्धक्षेत्रसमाससस्के विरोक्य रघु्रहदड्त्ती । श्रीन्ञानसागरसूरिङ़्तावचूणिर्विरचितेयं ।।२।।
इति पूज्याराध्य मद्ारकराजश्रीसोमतिरुकसूरिविर चितस्य नग्यच्रहत्कषेत्रसमासस्यातिगम्मीरा्थस्य श्रीगुणरत्नसूरिकृतावचूर्णिः संपूर्णा ॥छ।। सं ° १७८० प्र आषाढवदि ३ अनन्तर ४ गुरौ सवंक्लङश्री सोमधरस्वामिने नमः ।॥ श्री ।।छ।
उक्तं प्रशस्तिकी द्वितीय कारिका का० द° संग्रहको अन्य प्रतियोमेसे कुमे उपख्न्ध होती है ओौर कुमे नहीं । जंसे कि पू° पुण्यविजयजीके सग्रहगत नं० ५६४२ ( सं०° १६१ २) ओर ८०८० में यह उप- रन्ध नहीं होती । किन्तु नं ° ४५९६४ ( सं० १५६५ ), ६८७२ ( सं ° १६४१ ), २२५४ ओर ५६८६ में वह उपलब्त्र होती है । जिनमें उपलन्ध होती हैँ उनमें पाठान्तर इस प्रकार है--सूरिकृतावचूणि च रचि - नं ° ४५६४, ६८७२, सूरिकृतावचूणि विरचितेयम्--५६८६, २२५४ । इसे स्पष्ट होता है कि गुणरत्नने आचार्यं ज्ञानसागरकी अवचूणि देखकर अपनी अवचूणिकी रचना की है । ऊपर दिया गया नं० ३६६८ का पाठ अशुद्ध हं । इस पाठकी शुद्धि ० वेरुणकरने जिनरत्नकोषमें “'ज्ञानसागरछृते' की है । किन्तु एेसा करना जरूरी नहीं हे । आचार्य देवसुन्दरसूरिके कई शिष्य आचार्यं थे उन्मे-से आचार्यं ज्ञानेसागर भी थे । उनका जन्म सं० १४०५, सं० १४१७ में दीक्षा, सं०° १४४१ में आचार्यपद ओर सं° १४६० में स्यर्गवास हुआ (गुर्वाविखी इलो० ३३५) ओर आच्पर्यं गुणरत्नको आचार्यपद सं ० १४४२ मे मिका है ।* स्वयं आचार्य गुणरत्नने क्रियारत्नसमुच्चयको प्रशस्तिमे आचायं ज्ञानसागरकी प्रगंसाभी की है। आचार्य ज्ञानसागर सम आचार्य थे ओर गुणरत्नसे ज्येष्ठ भे । गुणरत्नको स्वप्नमे आकर उन्होने शिष्टारिष्टका विवेक दिखाया था तथा स्वरराजके रूपम वे दिखे थे । -गुर्वावखी ३४० । एसी स्थितिमें आचाय ज्ञानसागरके जिए आचार्यं गणरत्न अवचूणिकी रचना करं यह् सम्भव नहीं । स्वयं ज्ञानसागरमूरिने भी अधचूणि छिखी है" ओर उत्तकी हस्तप्र तिर्या भी उपलब्ध होती हँ ( जिनरत्नकोरा देखे ) गुर्वावली ( उ्लोक ३६१ ) मेँ तो स्पष्टरूपसे लिखा है कि उनकी बनायी हुई अवनचूणियां दीपिकाकी तरह आज भी प्रकाशदेरहीदहं।
( ६ ) वासोतिकवितण्डाविडम्बनप्रकरण-अचलगच्छके कुछ मतोका निराकरण करनेके छिए आचायं गुणरत्नने यहं प्रकरण लिखा है । जेन मुनियोके आचारकी करई बाते एेसी हँ जिनका शास्त्राधार नहीं है तो क्या वे मानी जायं या नही--इस सामान्य प्रह्नका समाधान किया गया है कि जेनघर्मका जब रोप होनेका समय होगा तब केवल कुछ शस्व्रांश ही रह जायेगे । यदि उस समयक लोग यह् कहं कि उपंल्ढ्प दास्त्रमे जो लिखाहै उसेही हम मानेंगे तो क्या यह उचित है? इसी प्रकार हमारे समक्ष भी विशाल शास्त्ररारिमे-से कु ही शास्त्र रह गये हँ तो हम यह कैसे कह सकते हँ कि अमुक बात शास्वमें नहीं क्िखी है अतएव अमान्य हं । हमारे उपलब्ध शस्तरमे न भी लिखी हो किन्तु कुछ तो परम्परासे आचारमे चरी *आथी हँ ओर कुछका समर्थन टीका आदि ग्रन्थोसे होता भी है तो उन बातोको शास्त्रसम्मत क्योन मान ली जायें ?--दलीलके इस क्रमके आधारपर यहः प्रकरण लिखा गया है ओर इसे देखनेसे पता चलता
१. जैन परम्पराका इतिहास भाग ३, पुऽ ४३२-४३९ ! २. वही प ४३४ तथा ज्ञानसागशरकी प्ररंसाके लिए देखें सोमसौभाग्य सर्ग ५, इलो ° ७-८ । मुनिसुन्दरकृत गर्वावली इलोक ३२७ से \
२० षड्दशनसमुच्चय
है कि आचार्य गुणरत्न जंनभगम , ग्रन्थोसे ही नहीं किन्तु उनकी निर्युक्ति भाष्य आदि टीकाओंसे भी सुपरिचित थे ।
इसका दूसरा नाम अंचरूमतनिराकरण भी मिरता है--जिनरत्नकोष देखें ।
( ७ ) षड्दशंनसमुच्चयकी तकरहस्यदीपिका टीका--प्रस्तुत ग्रन्थमें मुद्रित यह् टीका इतः पूर्वं मुद्रित हो चुकी है ।* इसमे प° महेन्द्रकुमार न्यायाचार्यने उसका हिन्दी अनुवाद किया है ओर आचार्यं गुणरत्नने जिन आधार प्रन्थोसे प्रस्तुत टीका छिली ह इनका निदंश तत्-तत् स्थानोमें टिप्पणोमें कर दिया है. । यह् प्रस्तुत संस्करणकी तिदोषता हं । | आचाय हरिभद्रने ८७ कारिका षडदर्शनसमुच्चय ग्रन्थको समाप्त किया था। किन्तु उसके प्रकरणोका निर्देश नहीं कियाथा किन्तु आचार्यं गुणरत्नने विषयविभागकी दृष्टस इसे छह अधिकारोमें विभक्त कर दिया है । मौर विस्तृत टीका छिखी हं ।
जैनग्रन्थावलीमें गुणरल्नके नामसे १२५२ अन्थप्रमाण षड्द्ंनसमु च्वयकी एक टीकाका उल्टेख है । किन्तु वह॒ भरममूकुक हो एेसा लगता ह । का० द° विद्यामन्दिरके श्री शान्तिसागर संग्रहगत ( नं० १३४ ) एक हस्तभ्रतिमें जिसके अन्तमं म्रन्थाग्र १२५२ किलाह लेखकके रूपमे किसीका नाम लिखा नहीं है । उसका प्रारम्भ “सज्ज्ञानदर्पणतङे विभले"^से होता .है । ओौर जेखकने संक्षेपमें वृत्ति किखनेकी प्रतिज्ञा की है ।--““न्यासं' विहाय संकषेपरुचिसतत्वानुकम्पया.। टीका विधीयते स्पष्टा षड्दर्शनसमुच्चये ।*' यह टीका विद्यातिलक अपर नाम सोमतिकककी कृति है एेसी स्पष्टता अन्यत्र कौ गयी हं । अतएव उसे गुणरत्नकी कृति नहीं माना जा सकता । ओर न यही माना जा सकता कि गुणरत्नने कोई लघुटीका लिखी थी ।
प्रस्तुत गुणरत्नङृत टीकाका ग्रन्थाग्र जैनग्रन्थावरीमें ४२५२ दिया ह । किन्तु संवेगी उपाश्रयकी प्रति ( नं० ३३५९ ) में प्र०.४५०० है एेसा निदंश ह ।
आचायं हरिभद्रने षड्दर्शनोका मात्र परिचय दिया है। दर्शंनोकी गुणवत्ताकरे विषयमे अपना कोई अभिप्राय नहीं दिया । अन्तमें केवल यह कह दिया कि-
“अभिषेयतात्पर्या्थंः पर्याखोच्यः सुबुद्धिभिः" ` ॥८७॥
किन्तु गुणरत्नने तो आचाय हरिभद्रको भी जैनदर्शनकी श्रेष्ठता अभिमत थी एेसा तात्पर्यं निकाला हं, देखं-- प्रथम कारिकागत सदशन" शब्दको व्याख्या पु २ ओर पृ० ७, § १२।
षडवर्तानसमुच्चयको अन्य टीका
( १) सोमतिककसूरि विरचित वृत्ति-ई० १९०५ में गोस्वामि श्री दामोदरलार शस्त्री द्वारा सम्पादित होकर यह वृत्ति चौखम्बा संस्कृतग्रन्थमारारमे पभ्रकारित हई थी । किन्तु न मालूम क्यों उसे मणिभद्र कृत माना गया था। मुद्रित संस्करणमें “इति श्ीहरिभद्रमूरिकृतषड्दशंनसमुच्चये मणिभद्रकृता रधुवृत्ति समाप्ता -एेसा' उल्छेख हं । सम्पादकने एकं प्रति जयपुरसे ओर अन्य प्रति बनारससे प्राप्त की थी । किन्तु जिनरत्नकोष ओर जँनग्रन्थावी आदि सुचीपत्रौमें कहीं भी मणिभद्रकृत टीकाका उल्लेख नहीं है । यह भी देखा गया है कि ्रन्थाग्र १२५२ वारी यह वृत्ति जिसका प्रारम्भ ““सज्जञानदर्शनतले”से होता है उसकी करई भतिर्यां कतकि नामके उल्टेखसे शून्य है गौर करई प्रतिमे सोमतिरुकका कर्ता रूपसे उल्लेख भी मिता है । अतएव यही वृत्ति मणिभद्रईत नं होकर सोमतिरुक सूरिङ्ृत है मौर उसी नामके साथ मुक्ताबाई ज्ञान- मन्दिर, उंमो्ईसे वि० सं०. २००६ ( ई० १९४९ ) मे प्रकाशित भी ह । अन्तमे प्रशस्ति भी मुद्रित है ।
१. एशियाटिक सोसायटी, १९०५, सम्पादक, 1.४1&¡ ऽ811; जैनआत्मानन्दसभा, भावनगर, विक्रम सं° १९७४, सं० श्री दानविजयजी ।
प्रस्तावना २९
प्रस्तुत संस्करणमें भी परिशिष्टखूपसे वह रघुवृत्ति मुद्रित की गयी है । वहा भी चौखम्बा संस्करण- का अनुसरण करके मणिभद्रकृत उसे पं० महेन्द्रकुमारजीने माना ह । किन्तु उसमें संशोधन कर उसे सोमतिकक सूरिकृत समज्नना आवङयक हं ।
प्रशस्तिसे मालूम होता ह कि विद्यातिकक मुनिने अपनी स्मृतिके लिए यह् विवृतिं बनायी हँ । इन्हीं विद्यातिलकका दूसरा नाम °सोमतिरकसूरि था; यह भी प्रस्तके अन्तिम वाक्यसे पता कुगता है । यह भी प्रशस्तिसे प्रतीत होता है कि आदित्यवर्घनपुरमें उन्होने इसकी रचना चि० सं० १३९२ ( ई० १३३५ ) मे की ह । अतएव यह कति गुणरत्नसे प्राचीन ह । सोमतिरुकसूरिका जन्म वि ° १३५५, दीक्षा वि ० १३६९, आचार्यपद वि० १३७३ ओर मृत्यु वि० १४२४ में हँ ।--गुर्वावली २७३, २९१ ।
( २) वाचक उदयसागरकृत अवचूरि-ला० द० विद्यामन्दिरके नगरसेठके भण्डारगत् नं ° ८६९ कीदो पत्रको पंचपाटी प्रतिमे बीचमे मूर छ्िखकरर चारों ओर यह अवचूरि छ्िखी गयी ह--अन्तमें ठ्िखा है-
“इति षडदर्रनसमुच्चयस्य ससूत्रावचूरिः वा° उदयसागरेण स्वपठनार्थमटेखि महानादरेण'* ।
यह जसा नामंसे सूचित ह अतिसंस्िप्त टिप्पणखूप हे ।
प्रतिक प्राचीनता देखते हुए यह उदयसागर अंचलगच्छके उत्तराध्ययनसूत्रकी दीपिक्राके रचयिता उदयसागर' हों यह सम्भवित है ।
इसमें मंगलके बिना ही सीधा रिप्पण शुरू किया गया ह । .
( ३ ) ब्रह्मरान्तिदासकृत अवचूणि-का° द° विद्यामन्दिरगत श्र देवसुरिसंग्रहकी नं० ९३२४ ` को हस्तप्रतिमें यहु अवचूणि छिखी गयी है । प्रतिलिपि सं° १९६० में की गयी है । आठ पत्र.है । प्रारस्भमें मगल है-
श्रीमद्टी रजिनं नत्वा हरिभद्र गुरं तथा । किचिदर्थाप्यते युक्त्या ष डदर्शनसमुच्चयः ॥ यह कति वही हो सकती है जिसका निदेश जँनग्रन्थावलीमे पत्र ६ वाली कोडायभण्डारगत अवचूरि रूपसे किया गया ह ।--जंनग्रन्थावली प° ७९ ।
इसकी दूसरी प्रति उसी संग्रहमे नं० ९२१३ पंचपाठी सं० १८८५ मे किखी गयी है । चोर पत्र हँ । ओर प्रतिकिपि सूर्यपुरमे की गयी है 1 इसीकी एक अन्य प्रतिकिपि श्री पुण्यविजयजीके संग्रहगत ह । न° २८८ हं । उसके अन्त॑म “श्रह्यशांतिदासास्येन'' एसा उल्लेख ह । केवल ब्रह्य नामका या “शान्तिदास- का देसार्ईकृेत जेन° सा० सं° इ ० मेँ उल्लेल मरता है किन्तु श्रह्यान्तिदास'का उल्टेख . मरुता नहीं । जिनरतनकोषमे भी इस नामके कर्ताका षड्दर्शनका विवरण उपलब्ध है एेसा निर्देश है । ये कभी सं° १८८५ के पहले हुए होगे ।
( ४ ) वुद्धिविजयजृत विवरण-रा० द० विद्यामन्दिरके पू० मुनि श्री पुण्यविजयजीके संग्रहगत
न° ७५८२ की यह् प्रति हं । इसके चार पत्र हँ । सं० १७२० में छाभविजयके रिष्य वुद्धिविजयने यहं विवरण लिखा है।
१. सोमतिककसूरिके परिचयके किए देखे गुर्वावलो २७२-२९३ । जंनसाहित्यनो संक्षिप्त इतिहास, पु० ४३२ । सोमसतौभाग्य ३.५२-५४। जेनपरम्परामो इतिहास भा० ३, पृ० ४२६। २. देसाई, जनसाहित्यनो संक्षि इतिहास, प° ५१८ । अन्य उदयसागरके किए देखें बही, प० ६०२, ६६६, ६७५, ६७९ ।
भ्रीहरिमद्रसूरिविरचितः € | षड्दरशनसमुचयः [ श्ीगुणरतनसुरिकृततकरहस्यदी पिकया भीसोमतिरुकसुरिङतलधुवृत्त्या च समन्वितः ]
=: 8, ¬
जयति विजितरागः केवलालोकल्ाली सुरपतिकृतसेवः श्रीमहावीरदेवः ।
यदसमसमपाब्धेदचासगाम्भीयंभाजः सकल्नयसमूहा बिन्दुभावं भजन्ते ॥१। श्रीवोरः स जिनः भिये भवतु यत्स्याद्वाददावानके भस्मीभूतकुतकंकाष्ठनिकरे ` तण्यन्ति सर्वेऽप्यह । संश्ीतिव्यवहारलुन्न्पतिकरानिष्ठाविरोधप्रमाबाधासंभवसंकरप्रभृतयो दोषाः परे रोपिताः ॥1२॥। वाग्देवी संविदे नः स्ात्सदा या सवंदेहिनाम् । चिन्तितार्थान् पिपर्तोह कल्पवल्लीव सेविता ॥२३॥ नत्वा निजगुरून् भक्त्या षडदरंनसमुच्चये । टीकां संक्षेपतः कुवे स्वान्ोपक्रतिहेतवे 1\४॥ `
६ १. इह हि जगति गरीयधित्तवतां महतां षरोपकारसंपादनमेव सर्वोत्तना स्वाथंसंपत्ति- रिति मत्वा परोपकारेकप्रवृत्तिसारश्चतुदंशकतसंस्यल्ास्त्रविरचनाजनितजगन्जन्तूषकारः श्रीजिन-
रागादि जीतनेके कारण जो वीतराग है, जिनको केवलज्ानज्योति जगमगा रही है, जिनकी
इन्द्रादि देव सेवा करते हँ, तथा जिनके अनुपम अतिगम्भीर जिनशासनरूप समुद्रके समग्र नयसमूह
बिन्दुमात्र हँ अर्थात् जिस प्रकार समुद्र अनन्त जल-विन्दुओंको अपनेमे समा लेनेवाला आधार है उसी तरह जिनका अनेकान्तदासन-समद्र भी सभी दशंनोको नयरूपसे अपनेमे समन्वित कर लेने
वाला है--वे महावीर देव जयवन्त हैँ ।।१। जिनके समस्त कुतकंरूपी काष्ठरारिको भस्मसात् करने- वाख स्याद्वाद दावानलमं परवादियों-द्वारा दिये जानेवारे संशय, व्यवहारलोप, व्यतिकर, अनवस्था विरोध, प्रमाबाध, असम्भव, संकर आदि दोष तिनकेके समान देखते-ही-देखते जल जाते है, वे तीर्थकररश्ची वीरहमारा कल्याण करें ।॥२॥ जिसकी सम्यक् आराधना करनेसे जो कल्परताके समान समस्त प्राणियोके मनोरथ सदैव पूणं करती है वह् श्रृतदेवता सरस्वती हमारे सस्यग््ञानके
लिए हो ॥३॥ म॑ ( गुणरत्न ) अपने गुरुजनोको नमस्कार करके अपने तथा अन्यके उपकारके लिए
षड्दरांनसमुचत्रयकी संक्षेपसे टीका करता हूं ।\४॥
१ १. इस संसारम उदारतवेता महापूरुषोका परोपकार-सम्पादन ही सर्वोत्तम स्वेषथं-सम्पादन है यह मानकर जिन्होंने परोपकारको ही प्रवृत्तिमय जीवनका एक-मात्र सार माना है, जिनने चौदह सौ
१. तृण्यान्ति पऽ १,२,भ०१,२।२. स्तात् प० १,२,भ०१,२।
२ षड्दरांनसमुच्चये [का० १.8 र-
चासनप्रभावनाप्रभाताविर्भावनभास्करो याकिनीमहत्तरावचनानवबोधलन्धबोधिबन्धुरो भगवान् . श्रीहरिभद्रसुरिः षडदल्ंनीवाच्यस्वरूपं जिज्ञासूनां तत्तदीयग्नन्थविस्तरावधारणशाक्तिविकलानां सकलानां विनेयानामनुग्रहविधित्सथा स्वल्पग्रन्थं महारथं सदृभूतनामान्वयं षड्दशंनसमुच्चयं शास्त्र प्रारभमाणः चास्त्रारम्भे मङ्कलाभिधेषयोः साक्षादभिधानाय संबन्धप्रथोजनयोश्च संसुचनाय प्रथमं इलोकमेनमाह-
सद शनं जिनं नत्वा वीरं स्याद्राददेशकम् | सवंदशंनवाच्योऽथे;ः सकेपेण निगद्यते ॥१॥
६ २. सत् शश्वदृविद्यमानं छद्यस्थिकन्ञानापेक्षया. प्रशस्तं वा दर्शनम् उवलन्धिर्ञनिं केव- छाख्यं यस्य स सहशंनः ।! अथवा सत् प्रहस्तं दशनं केवलदशंनं तदव्यभिचारित्वात्केवललानं च यस्य स सदशेन: सवंज्ञः सवंदर्शी चेत्य्थंः, तम् । अनेन विेषणेन श्नीवधंमानस्थ भगवतो ज्ानाति- शयमाविरबीभवत् । अथवा सद् चतं सकरनरासुरामरेन्द्रादिभिरम्पचितं दरानं जेनदशेनं यस्य स
प णी वि 7 ता त 1 रिषं
दास्त्रोकी रचना करके जगत्के प्राणियोका महान् उपकार किया है, जो जिन-शासनकी प्रभावना- रूपी प्रभातको प्रकट करनेवाले तेजस्वी सूयं ह, याकिनी मह॒त्तराके वचनोको नहीं समञ्ञ सकनेके निमित्तसे जिन्हं सम्यक्त्वकी प्राप्ति हुई थी, एेसे श्री हरिभद्रसूरि, जिनमे षड़्दशंनके बड़े-बड़े ग्न्थोकि समज्नेकी तो शक्ति नहीं है पर षडदशंनके स्वरूपको समञ्चना अवद्य चाहते हँ, उन सभी जिज्ञासु विनेयोके अनुग्रहकी इच्छासे इस यथाथं नासवाले, बहुअथंगभित षडदशंनसमुच्चय नामके छोटे-से शास्त्रका प्रारम्भ करते हए उस दास्त्रके आरम्भमे मंगर ओर अभिधेयका साक्षात् शब्दो- द्वारा प्रतिपादन करनेके किए तथा सम्बन्ध ओर प्रयोजनकी परम्परासे सूचना देनेके किए प्रथम दलोक कहते ह-
सहशंन स्याद्वाद देशक श्री वीर जिनको नमस्कार करके समस्त दशंनोके प्रतिपाद्य अथेका संक्षेपसे कथन करता हूं ।१॥।
§ २. सहश्षंन-जिसका दशंन अर्थात् उपरुब्धि अर्थात् केवर नामक ज्ञान सत् अर्थात सदा विद्यमान या हम लोगोके ज्ञानकी अपेक्षा प्रशस्त है वह सहशंन है । अथवा जिसका दशंन अर्थात् केवर दर्शन भौर अवदय तत्पहचारि होनेसे केवलज्ञान भी सत् अर्थात् प्रशस्त है वह सदशंन सर्व॑ दर्शी सवंज्ञ । इस प्रकार सहन" पदका केवलनज्ञानी या सवंदर्शी ओर सवंज्ञ अथं करनेसे वधमान भगवान्के ज्ञानातिदायकां सूचन होता है 1 अथवा, जिसका दशंन अर्थात् जनदरशंन समस्त नरेन्द्र, असुरेन्द्र ओर देवेन्द्र आदिसे सत् अर्थात् पूजित है, वह् सदशन । इस तरह सदृगंन पदके इम अंसे
१. रेसी कथा प्रसिद्ध है कि--विप्र हरिभद्रकी यह प्रतिनज्ञाथी कि “मेँ जिसके वचनोका अर्थं नहीं समन्न सर्कँगा उसीका शिष्य हो जाङ्धगा' । एक दिन उपाश्रयमें याकिनी महत्तरा नामको साध्वी “"चउक्िदुगं हरि पगगं चष्धीण केसवो ची केसच चष्कीकेसवदु च्छी केसच च्छ्ी य ।।*- अर्थात् चक्रवर्ती ओौर' नारायर्णोकी उत्पत्तिका क्रम इस प्रकार है--दो चक्री, पाच नारायण, पाच चक्री, छटवां नारायण, आठ्वां चक्री, सातर्वां नासयण, नर्वां चक्री, आर्ठ्वा नारायण, दसर्वा ओर ग्यारह्वां चक्री, न्वा नारायण गौर बारहर्वां चक्री । यह गाथा पढ़ रही थी । इस चक्रारनहुर गाथाका अ थं जव हरिभद्रकी समक्षमें नहीं आया तब वे अपनी प्रतिज्ञानुमार याक्रिनी महत्तराके पास गये भौर उन्हे अपना गुरु मानकर उनसे इस गाथाका अर्थं पृछा । आर्या संध्रके नियमानुसार हरिभद्रको आचायं जिनभटके पासके गयी । विप्र
हुरिभद्र माचायं जिनभटके पास जनी दीक्षा लेकर हरिभद्रसूरि हृए ।
- का० १.8४] मङ्खलम्। ३
सहशंनस्तम् ! अनेन च तदीयदहंनस्य त्रिभुवनपुज्यतामभिदधानः श्रीवधंमानस्य त्रिभुवनविभोः सुतरां त्रिभुवनपुज्यतां वधनक्तीति पुजातिशयं प्राचीकटत् । ।
§ ३. तथा जयति रागद्वेषादिशात्रूनिति *जिनस्तम्, अनेनापायापगमातिह्यसुदबीभवत् ।
§ ४. तथा स्यात्-कथंचित् सवंदशेनसंमतसद्भ्तवस्त्वंशानां मिथः -सापेक्षतथा वदनं स्याद्वाद °, सदस्नित्यानित्थसामान्यविहेषाभिकाप्यानभिलाप्थोभयात्मानेकान्तः इत्यथः । ननु कथं सवंदशंनानां परस्परविरुद्धभाषिणामभीष्टा वस्त्वंशः के सद्भूताः संभवेयुः येषां मिथः सापेक्षतया स्याद्वादः सत्प्रवादः स्थादिति चेत् , उच्यते- यद्यपि द्ंनानि निजनिजमतभेदेन परस्परं विरोधं भजन्ते तथापि तेरुच्यमानाः सन्ति तेऽपि वस्त्वंशा ये मिथः सपेक्लाः सन्तः समोचीनतामञ्चन्ति । तथा हि-सौगतेरनित्यत्वम्, सांख्थेनित्यत्वम्, नेयायिकैवेशिषिकेरच परस्परविविक्ते ` नित्यानित्यत्वे सदसत्त्वे, सामान्यविशेषौ च, मीमांसकैः स्थाच्छब्दवज भिन्नाभिल्रे, नित्यानित्यत्वे, सदसदंशौ सामान्यवि्ञेषौ, शब्दस्य नित्यत्वं च, कैर्चित् काकस्वभावनियतिकमंपुरुषादीनिः जगत्कारणानि
जेनदशंनको जग-पूज्यताके द्वारा उसके प्ररूपक वधमान भगवान्को चरिभुवन पूज्यताका स्पष्ट सूचन किया गया है 1 इससे भगवान्का पूजातिराय प्रकट हो जाताहै।
8 ३. जिन-जो राग-देष आदि समस्त अन्तःरात्रुओंको जीत क्ता ह वह् "जिनः" है इस विदोषणसे वीर भगवानूका अपायापगम अपाय = दोषका, अपगम = निरसन नामक अतिहाय प्रकट ` होता है!
६ ४. स्याद्राददेशक-स्यात्- कथंचित् अर्थात् सभी दर्शनों-ढारा माने गये -वस्तुके सद्- भूत अशोका परस्पर सापेक्ष कथन करना स्याद्वाद है । अर्थात् सत्-असत् उभयरूप, नित्य-अनित्य उभयरूप, सामान्य-विरोष उभयरूप, वाच्य-अवाच्य उभयरूप अनेकान्त है । प्रह्न--जब सभी दशंन परस्पर विरुद्ध कथन करनेवाले हं तब उन परस्परविरोधी दशंनोके द्वारा कह गये वस्तुक सद्भूत अंश कौन-से है, जिनका परस्पर सापेक्ष रूपसे समन्वयात्मक कथन करनेवाला स्याद्वाद सत्प्रवाद अर्थात् सच्चा मत समज्ञा जाये ? उत्तर-यद्यपि सभी दशंन अपने आपसी मतभेदके कारण परस्पर विरोधी हो रहै ह पर एक बात तो सुनिरिचत है कि उन दकशंनोके द्वारा अपने-अपने दश्टिकोणोके अनुसार कहे जानेवारे वस्तुके एेसे भी अंश हँजो परस्पर सापेक्ष बनकर समीचीन बन जातें अर्थात् अविरोधी ओर सच्चे बन जाते हं ओर एसे समन्वित वस्त्वंशोका प्रतिपादक स्याद्वाद सद्राद हो जाता है 1 उदाहूरणाथं-बौद्ध वस्तुको अनित्य तथा सांख्य उसे नित्य मानते हं । नैयायिक ओर वेरोषिक नित्य-अनित्य, भाव-अभाव ओर सामान्य-विशेषको परस्पर भिन्न स्वीकार करतेहें।वे नित्यको नित्य ही तथा अनित्यको अनित्य ही मानते है। उनके मतम सामान्य ओर विशेष जुदे-जुदे ह । भावसे अभाव भी भिन्न है। मीमांसक वस्तुको भिन्नाभिन्नरूप नित्यानित्यरूप, सद्-असद्रूप ओर सामान्यविशेषरूप मानकर भी उसमें स्यात् शब्दका प्रयोग नहीं करते ओर शब्दको सवंथा
नित्य ही मानते हैँ । कार, स्वभाव, नियति, कमं या पुरुष आदिको जगतुका कारण माननेवाले
१. पालिभाषायां तु जिनातेधतिः जि नातीति जिनः इति सिद्ध्यति । २. तुलना--“"स्याद्वादः सर्वंधंकान्तत्या-
गात् किवृत्तचिद्धिधिः । सप्तभङ्कनयपेक्षो हियादेयविशेषकः ।।'" --अआक्तिमी० इरो० १०४ । (स च तिडन्तप्रतिरूपको निपातः, तस्थ अनेकान्तविधिविचारादिषु बहुष्वर्थेषु संभवत्सु इह विवक्षावशात् अने- कान्तार्थो गृह्यते ।'` -त० वा० प° ` ८१ । तण इको० प° १३६ । न्यायकुमु० ए ३ । रल कराव>
४।१६। हैन० चहण० पृण १॥ स्या० मन्का० ५। ३. 'सदसन्तित्यानित्यादिप्रतिक्षेषलश्नणोऽनेकान्तः'” -- जष्टशाः, जषटस० ए० २८६ । ४. -विविक्तनि-प० १,२, भ० १। ५. -दीति क०।
४ षड्दर्शनसमुच्चये [ का० १.३५ -
श्रंष्द-अरह्य-जलानाद्रेतवादिभिश्च शब्द-ब्रह्य-जानाद्रंतानि चेत्यादयो ये ये वस्त्वं्ञाः परेरङ्कीक्रियन्ते, ते सर्वेऽपि सापेक्लाः सन्तः परमार्थंसत्यतां प्रतिपद्यन्ते निरपेक्षास्त्वन्योन्येन निरस्यमाना ` नभोनकिनायन्त इत्यलं विस्तरेणं । स्याद्वादस्य देशकः सम्यग्वक्ता स्याद्राददेकस्तम् ! अनेन च वचनातिकश्यमचकथत् ।
` ३५. तदेवं चत्वारोऽतरातिज्ञथाः' ज्ास्त्रकृता सक्षादाचचक्षिरे । तेषां हेतु-हेवुमडूाव एवं
भिन्न-भिन्न वादी है । शब्दाद्वैतवादी जगत्को शब्दमय -मानता है तो त्रह्याद्रेतवादी उसे ब्रह्ममय एवं विज्ञानाद्वतवादी उसे क्षणिक ज्ञानक्षणरूप स्वीकार करते हैँ । इस तरह मिन्न-भिन्न वादियों-ढारा जिन-जिन वस्त्वं शोका निरूपण किया जाता है, वे ही वस्त्वंरा जब वस्तुस्थितिके आधारसे परस्पर सापेश्न रूपसे समन्वित हो जाते है, तो वै ही परमसत्यरूप होकर अपने प्रतिपादकं दर्शंनको सहशंन बना देते हैँ । पर यदि इन वस्त्वंशोक! परस्पर समन्वय न किया जाये ओर उन्हँं निरपेक्ष छोड दिया जाये तो ये वस्त्वंश परस्पर विरोधी होकर एकं दूसरेका प्रतिक्षेप करके आकाशके फरुकी तरह असद्रूप हो जाते हँ । तात्पर्याथं यह् है कि वस्तु परस्परसापेक्न गुण-पर्यायरूप वस्त्वंरोका एक आम्रेडित अखण्ड पिण्ड है ] यदि उसके प्रत्येक अं एक-दूसरेकी अपेक्षा रखना छोड़ दें तो वे सबके सब परस्परविरोधी होकर आकारके फूरको तरह असत् ही हो जार्येगे । जब कोई एक दर्शन ` अपने-दवारा कहे गये -वस्तुके . अंशको ही पूणं वस्तु माननेका आग्रह करता है तब वहु सहज ही दूसरे दशंनका--जो पहले दशंनकी तरह अपने द्वारा माने गये वस्त्वंशमें वस्तुकी पूणंताका अभिमान कर रहा है, विरोधी हो जाता है} पर यदि हर एक दशंन यह् समञ्लने लग जाये कि- भरे द्वारा कहा गया वस्तुका स्वरूप इस अपेक्षासे है, ओर दूसरे दशंनके हारा कहा जानेवाला वस्तुका स्वरूप-इस अपेक्षासे है" ओर इस तरह दूसरे दशंनोके सत्यांशका आदर करने लग जाये तो परस्पर सायेक्षताके कारण समन्वय हो जानेसे उनका वह् विरोध मेत्रीका रूप धारण कर ङेगा । वस्तुके अनेकान्त स्वरूप तक प्हंचनेका यही एकमात्र प्रशस्त मागं है । इस तरह अपने दारा माने गये एक-एक वस्त्वंशमें पुणंताके मिथ्या अभिमानके कारण सभी दशन एक दूसरेका खण्डन करते है ओर परस्परविरोधी भासित होते हँ । पर जब उनके द्वारा माने गये वस्त्वंशोकी वेस्तुमे यथार्थं , स्थिति होनेके कारण परस्पर सापेक्ष भावसे समन्वय किया जाता है तबवे ही परस्पर सापेक्ष वस्त्वंश समीचीन बन जाते हैँ ओर ठेसे परस्पर सापेक्न वस्त्वंशोके प्रतिपादक दरशन अनायास ही स्याद्रादके समर्थक हो जाते ह । अतः अनेक धर्मोका परस्पर सापेक्ष कथन करनेवाला स्याद्वाद ही सद्राद है स्याद्रादका देशक अर्थात् सम्यग्वक्ता स्याद्राददेशक दहै! इससे वचनांतिशयका कथन् हुञां | |
$ ५. इस तरह शास्तरकारने इरोकमे आये हुए "सदशन, जिन ओर स्याद्वाददेशकः इन विशेषणोंसे भगवानूके ज्ञानातिशय आदि चारों अतिशयोका साक्षात् प्रतिपादन किया है। इन
१. तुलना--"“मृकातिश्याश्चत्वारः । तद्यथा--अपायापगमातिश्यः, ज्ञानातिशयः, पूजातिश्यः, वागतिश- यच ।"' --अनेकान्तज ० स्व ° प° ४। “यथाक्रमं भगवतो मूलातिज्ञयाइचत्वारः स्मृतिमुकूरभूमिका- मानोयन्ते । तद्यथा-अपायापगमातिरयो““"एतेषां चातिशयानामित्यमुपन्यास्े तयोत्पत्तिरेव निमित्तम्; तथाहि-नाविजितरागद्रेषो विर्ववस्तुज्ञाता भवति । न चाविदववस्तुजञः शक्रपूज्यः संपद्यते । नच शक्रपूजाविरहे भगवांस्तथा गिरः प्रयुङ्क्त इति ।'” --स्ा० र० पर०४ | स्या० म०का० १। कार्लो>
इलो ° ९९७ ।
-का०१. ६4८] मङ्कलम् । | ,
भाव्यः- यत एव निभोषदोषशच्रुजेता तत एव सवंज्ञः । यत एव सवंज्ञस्तत एव सदुभुता्थंवादी । यत एव सदुभूताथंवादी, तत एव न्रिभुवनाभ्यच्यं इति ।
8 ६. एवमतिकायचवुष्टयीप्रवरं वीरं महावीर वतंमानतीर्थाधिपति भीवधंमानापरा- भिधानं नत्वा मनसा तदतिक्लयचिन्तनेन, वाचा तदुच्चारणेन, कायेन भूमौ शिरोकगनेन च भ्रणिघयेत्यथंः । |
§ ७. एतेनादिमं' मङ्कलमभिदधो \ मध्यमङ्धलं तु "जिनेन्द्र देवता तत्र॒ रागद्रेषविव- जितः' । ` [ षडद० इो० ४५ ] इत्यादिना जिनमतकीतेनेन कोतंयिष्यति । अन्त्यमङ्ककलं पुनः अभिधेयतात्पर्याथंः पर्याखोच्यः सुबुद्धिभिः [ षड़द० इलो० ८७ ]. इत्यत्र सुबुद्धिशल्दसंशब्दनेन वक्ष्यति ।
§ ८. तस्य त्रिविधस्थापिः फलमिदम्-
अतिङहायोका परस्पर-कायंकारणभाव इस प्रकार है--परतः भगवान् रागद्रेषादि समस्त अन्तःदात्रुओं-
को जोतकर जिन हुए ह अतएव वे ज्ञनावरण रूप शतरुका भी क्षय करनेक्रे कारण सर्वज्ञ है । यतः वे सवेज्ञ हँ अतएव वे यथार्थवादो हं । तत्पयं यह् है कि रागद्वेष ओर अज्ञानसे ही वचनोमे मिथ्यात्व अता है पर मिथ्यावा.दत्वके इन कारणोमे-से एक भी कारण वीर भगवानुके नहीं है इसलिए वे सद्भूतार्थवादी ह । यतः भगवान् सद्भूताथंवादी ह इसीलिए वे त्रिलोकपुज्यः हैँ ।
8 ६. इस तरह उक्त चारों अतिरायोसे समन्वित, वतमानं जिन-शासनके स्वामी, वधमान जिनका दूसरा नाम है एसे वी र.भगवानुको नमस्कार करके अर्थात्. मनमें उनके ज्ञनातिशय आदि- क चिन्तन कर वचनसे गुणगान कर तथा कायसे भूमिपर मस्तक कगाकर प्रणाम करके शास्व- कार षड्दङानका स्वरूप कहते हे ।
६ ७. इस तरह प्रथम इेलाकमं आदिमंगक किया गया है । मध्यमंगल तो जेनमतका निरूपण करते समय “जिनेन्द्र देवता तत्र रागद्रेषविवजितः'-अर्थात् जैनमतमें रागद्वेषादिसे
रहित जिनेन्द्र देवता हँ-इस इरोकांशके दवारा किया जायेगा । इसी तरह अन्तिममंगरू “अभि
धेयतात्पर्याथेः पर्यालोच्यः सुबुद्धि।भः'' अर्थात् नुद्धिशाखी पाठकोको इस ग्रन्थके अथं तथा तात्पर्य का विचार करना चाहिए-इस इखोकाधेमें सुबद्धि' शब्दका प्रयोग करके किया जायेगा ।
§ ८. इन तीनों मंगलोका फल इस प्रकार है--““शास्व्रके आदिमे, मध्यमे तथा अन्तमें
१. दिमंग-प० १, २, भ० १, २।२. “"तन्मङ्कलमादौ शास्त्रस्य क्रियते तथा मध्ये पर्यवसाने चेति ।
एकंककरणप्रयोजनमाह-- प्रथमं शास्त्रार्थाविधघ्नपारगमनाय निदिष्टमिति गाधाः । तस्यैव शास्त्रार्थस्य
थममङ्गककरणप्रसादादविध्नेन परं पारमुपागतस्य सतः स्थर्यार्थं मध्यमम्, निर्दिष्टमिति वर्तते । तथान्त्यमपि तस्यैव मध्यम ङ्गलकरणात्. तथाभूतस्य सतः अग्यवच्छित्तिनिमित्तम्, कस्येत्याह- शिष्य- प्रशिष्यादिवंशस्य । निदिष्टमिति वतते, नात्मा्थ॑मेव शास्त्रावगतिरिष्यते इति गधार्थः ।--विशेषा० को° गा १३-१४। प्रता° स्खय० पर १। भा° मङ्य० प०३.अ० । ब्हस्कल्प० मज्यण० प° ¶। तुलना--/"पढमे मंगलवयणे सिस्सा सत्थस्स पारगा होति । मञ्न्ञम्भे णिष्विग्धं विज्जा विज्जाफलं चरिमे ॥।'"--ति° प० १।२९ । ““मंगलं सुत्तस्स आदीए भज्ज्े अवसाणे च वत्तन्वं । उक्तं च-आदीव-
साणमन्कषं पण्णत्तं मगल जिणिदेहि । तो कयमंगलविणयो वि णमोपुत्तं पवक्खामि !""--धवखा पृ० ३९ १
उक्तं च--आदो मध्येऽवसाने च मद्धलं भाषितं बुधैः । तज्जिनेन््रगणस्तोत्रं तदविष्नप्रसिद्धये ॥ चचक ० ४१ । आक्तप० प° ३ । श्राकटायनभ्या०।
६ षड्दर्नसमुच्चये [ का० १.६९-
न्तं मंगरमाईण मज्फे पञ्जंतए य सत्थस्स। पदम सस्थस्साविम्धपारगमणाए निदिट्ट ।।१॥ -तस्सेवाबिग्धस्थं मन्मयं अंतिमं च तस्तेव । अन्बोच्छित्तिनिमित्तः सिप्सपसिस्साश्वसस्स ॥२॥' [ विकशेषा० गा० १३-१४ |
१ ९. वीरं नत्वा" इत्युक्तं तत्र क्त्वाग्रस्थयस्थोत्तरक्रिधासपेक्षत्वात् _ निगदते' इति क्रिया- पदमन्र संबन्धनीयम् । को निगद्यते । सर्व॑दर्शानव।च्यो ऽथः 1 सर्वाणि मूलभेद पेक्षधा समस्तानि यानि दशनानि बोद्धादीनि तैस्तषां वा वाच्ोऽभिघेयोऽर्थो देव-ततत्व-प्रमाणादिलक्षणः ` संक्षेपेण समासेन निगदयतेऽभिधीयते । मयेत्यनुक्तमप्यत्रार्थाद् गम्यते ।
§ १०. एतेन साक्नादभिधेयमभ्पधात्, संबन्धप्रथोजने तु *सामर्थ्यादवसेपे) सवंदक्ञानवक्तव्प- देव-तत्त्वादिज्ञानमुपेयम्, इदं शास्त्रं तस्योपायः, एवमुपायोपेयलक्षणः संबन्धः सूचितो द्रष्टव्यः । “प्रयोजनं तु देषा कर्तुः श्रोतुख । द्वयमपि द्वेधा ~ अनन्तरं प्पर च । कतुरनन्तरं प्रयोजनं सत्वा- नुग्रहः । धोतुरनन्तरं सवंद्षंनाभिभतदेव-तत्व-प्रमाणादिज्ञानम् । योरपि परपरं पुनर्हेयोपादेयदजशं- नानि ज्ञात्वा हेयान्धपहाय, उपादेयं चोपादाथ परंपरयानन्तचतुष्टयात्मिका सिद्धिरिति । मंग करना चाहिए । आदिमंगर निविष्नरूपपे शास्तके पारगमनके लिए, मध्यमंगर शास्त्रकी स्थिरतके लिए तथा अन्तिम मंग शिष्य प्ररिष्य-परिव।रमें शास्त्रको परम्परा स्थिर रखनेके किए किया जाता है ।१-२।॥'* .
§ ९. श्लोकम "वीरं नत्वा" यह् कहा है । व्याकरणशास्त्रके नियमके अनुसार जिस क्रियामें “क्त्वो ' प्रत्यय लगा रहता है वहु क्रिया आगे होनेवाखी किसी दूसरी क्रियाकी अपेक्षा रखती है । इसलिए यहाँ नत्वा क्रियाका निगद्यते" क्रियासे सम्बन्ध कर टलेना चाहिए 1 तब सीधा वाक्यार्थं ` इस प्रकार हो जाता है--'वीरको नमस्कार करके बौद्धदशंन आदि सभी मूरुदरांनोमें प्रतिपादित देव, तत्त्व ओर प्रमाण आदिका स्वरूप संक्षेपसे कहा जाता है । यद्यपि इलोकमें निगद्यते" क्रियाका 'मया' यहु कर्ता अनुक्त है, तो भी क्रियाकी सामथ्यंसे उसका अध्याहार कर ङेना चाहिए ।
६ १०. इस इोकमे आचायंने समस्त ददांनोके कथन करनेकी प्रतिज्ञा करके ग्रन्थका अभिधेय समस्त-दरंनके देवादि तत्त्व है, यह् स्वयं ही बता दिया है) सम्बन्ध ओर प्रयोजन सामथ्॑से ज्ञात हो जाते हँ । यहाँ सभी दशंनोमे प्रतिपादित देवता तथा तत्त्व आदिका यथाथं ज्ञान ही उपेय अर्थात् प्राप्तव्य है ओौर यह् ग्रन्थ उस ज्ञानका साधन होनेसे उपाय है । अतः उपायोपेय रूप सम्बन्व सुचित हो जाता है । प्रयोजन दो प्रकारका है--एक म्रन्थकारका तथा दूसरा श्रोताका । दोनों ही प्रयोजन साक्षात् ओर परम्पराकं मेदसे दो-दो प्रकारकं होते हैँ । इस प्रन्थमें ग्रन्यकरारकरा साक्षात्प्रयोजन है--तत्तवका परिज्ञान कराके प्राणियोका उपकार करना । सभो दशंनोमे प्रति-
पादित देव, तत्व तथा प्रमाण आदिके स्त्रह्पक्रा ययाथंपरिज्ञनि करना श्रोतकरा साक्षात् प्रयोजन है । दोनोंका परम्परा प्रयोजन है--रशंनोमें हेथोपादेयका विवेक प्राप्त करके दैयक्रा परित्याग तथा
१, अ-भ० १, २।२. तस्तसेवा उ विज्जटठ भ० २।३. सक्षेपेन-प० १,२; भ १। ४. -र्यवसे- १०१, २, भ० १,२॥। ५. तुर्ना--““जयोजनं द्वेधा कतुः श्रोतुश्च । पृनद्रित्रिधम्--मनन्तरं सान्तरं च ।'“--स्याण्र० परू” १०।
~ का० १. & १२] म्लम् । ७
६ १९. नन्वयं ज्ञास्त्रकारः सवंद्शांनसंबन्धीनि शास्त्राणि सम्यक्परिज्ञायेव परोपकाराय प्रस्तुतं शास्रं द्न्धवान्, तत्कथमनेनवेहेदं नाभिदधे-*अमुकममुकं दशनं हेयम्, अमुकं चोपादेयम्' इति चेत्, उच्यते-इहः सवंदशंनान्थभिधेयतया प्रक्रान्तानि, तानि माध्यस्थ्येनेवाभिदधानोऽजोचितीं नातिक्रामति ! “इदमिदं हेयम्, इदं चोपादेथम्' इति ब्रुवाणस्तु प्रत्युत सतां सवंदश्चंनानां चानादेय- वचनो वचनीयतामञ्चति ।
६ १२. नन्वेवं तदह्य॑स्याचायंस्य न परोपकारार्था प्रवृत्तिः । कुत एवं भाषसे । नन्वेष दश यामि- ये केचन मादृशाः श्रोतारः स्वयमल्पन्ुद्धित्वेन हेयोपादेयदश्ंनानां विभागं न जानीयुस्तेषां सवंदशंनसतत्त्वं' निशाम्य पत्युतेवं बुदधिभवेत्-'सञ्दशंनानि तावन्मिथो विरुद्धाभिधायीनि, तेषु च कतरत्परमाथंसदिति न परिच्छिखाते । तत्किमेतेदंशनेद्निः प्रयोजनम् ! यदेव हि स्वस्मै रोचते तदेवाचुषठेयम्' इति \ एवं विधाश्चाविभागज्ञा अस्मिन्काङे भूयांसोऽनुभूयन्ते \ तदेवं शास्त्रकारस्य सुरेरुपकाराय प्रवृत्तस्य प्रत्युत प्रभूतानामपकारायापि प्रवृत्तिः प्रबभूव, ततज्च राभमिच्छतो म॒लहानिरजनिष्टेति चेत् \ न, शास्त्रकारात्सर्वोपकारायेव प्रवृत्तात् कस्याप्यपकारासिद्धेः \ विशेषण- द्वारेण हियोपादेयविभागस्यापि कतिपयथसहूदयहदयसंवेद्यस्य संसुचनात्। तथाहि-सददानं जिनं नत्वा-
जा त मा ना ~ म का भ माः 9 = मामा आन, काक >
उपादेयका ग्रहण करके परम्परासे अनन्तज्ञानादि चतुष्टय रूप सिद्धिका प्राप्त करना ।
8 १९. शका-जब रास्त्रकारने सभी दरंनोके म्रन्थोका अच्छी तरह आलोडन करकेही परोपकारके किए इस चास्त्रको रचा है तब उन्होने ही अमुक-अमुक दरंन हेय है तथा अमुक- अमुक दरंन उपादेय है" यह स्पष्टरूपसे क्यो नहीं कह दिया ? समाघधान-इस ्रन्थमे सभी दरंनो- का समुच्चयरूपसे कथनं करना ग्रन्थकारको इष्ट है । अतः वह् पूणं मध्यस्थ भावसे उनका यथाथं निरूपण करे यही उचित है 1 इसके विपरीत यदि वह् अपनी इस मर्यादाका उल्छंघन कर ये दरंन हेय हँ ओर यह् उपादेय है इस प्रकार उनकी हेयोपादेयतामें अपना दषटिकोण प्रकट करतादहै तो
तटस्थ सज्जन तथा अन्यदशनावरुम्बी उसके वचनोमे आदर तो करगे ही नहीं प्रत्युत शास्वकार- की निन्दा ही होगी ।
§ १२. हका-यदि आचायं दरांनोकी हैयोपादेयताकां विवेक नहीं बताते हँ तब तो उनकी यह् शास्तरप्रवृत्ति परोपकारके लिए नहीं हुई । प्रहन-एेसा कहनेका कारण क्या है ? उत्तर-यह म बताता हूं । जो मुक्ल-जेसे मन्दबुद्धि श्रोता है वे बुद्धिको मन्दताके कारण स्वयं तो ये दशंन हेय हँ तथा ये उपादेय" इस प्रकार दशंनोमें हेयोपादेय विवेक कर ही नहीं सकते, अतएव वे समस्त दशंनोके स्वरूपको सुनकर स्वभावतः यही सो्चेगे कि जब सभी दशन परस्पर विरोधी कथन करनेवाले है, तथा इनमे कौन सत्य है ओर कौन असत्य' यह् जानना कठिन ह तब इन ददनों को--जिनका समञ्लना ही अत्यन्त कठिन है-जानकर ही हम क्या करेगे ? जो अच्छाख्गे सो करो । इस समय एसे दशंनोके विवेकको नहीं जाननेवाङे ही बहुत हैँ । इसलिए शास्व्रकार आचायं- की परोपकारके किए की गयी यह् प्रवृत्ति विवेकविमुख बहुत लोगोके अपकारके लिए ही सिद्ध हई 1 अतः ग्रन्थकारका काभके लिए किय। गया यह् व्यापार मूलका ही नाद करनेवाखा सिद्ध हुआ । समाधान--सबके उपकारके लिए ही प्रवृत्ति करनेतव्राले शास्त्रकारसे किसी भी व्यक्तिका अपकार हः हौ नहीं सकता 1 आचायंने स्वयं .सदहृशंन' आदि विरेषणो-दवारा ददंनोके हैयोपादेय विवेककी भी बड़ी कुशरतासे सूचना की है, जो कुछ सहूदय व्यक्ति ही समन्ञ सकते हैँ 1 वह इस
क माणा नज भा नाता ज
१. इह तु सवं--आ० । २, सत्त्वं क०, मु । मत्त्वं प० १,२।
८ षडदर्शनसमुच्चये [ का० १. § १२ - "“सद्धिद्यमाने सत्ये च प्रशस्ताचितसाधृषु"" [अनेकार्थं० १११०] इत्यनेकाथंनाममालावचनात्, सत्सत्यं न पुनरसत्यं दशनं मतं यस्थ तम् । जिनमिति विशेष्यम् । चतुविङतेरपि जिनानामेकतरं(मं) रागादिशात्रजयात्सान्वयनामानं जिनं वीतरागं नत्वा । एतेन पदद्वयेन चतु विङतेरपि जिनानामन्धोन्पं मतभेदो नास्तीति सूचितम् 1 तहि इवेताम्बरदिगम्बराणां कथं मिथो मतभेद इति चेत् , उच्यते- मृलतोऽमीषां मिथो न भेदः किन्तु पाश्चात्य एवेति । कोद्य जिनम् । अवीरम् । आः' स्वयंभूः, अः कष्णः, उरीरवरः । आ अ उ" इति स्वरत्रययोगे ओ इति सिद्धम्, तानीरथति तन्मतापासनेन भ्ररयतीत्यचि प्रत्येऽवीरम्, सृष्ट यादिकतु ब्रह्यङृष्णेश्वरदेवताभिमतमतानां निरासमित्थथंः । तथा स्याद्राददेशकम्। स्याद्रादं यन्ति छिन्ते “क्वचित् `” [हैम० ५।१।१७१] डः इति उप्रत्यये स्थाद्राददाः तत्तदसद्भूतविरोधादिद्ूषणोदुघोषणेः स्याद्रादस्थ छेदिनः* इत्यर्थः ! तेषाम् ई लक्ष्मीं महिमानं बा इयति तत्तदीयमतापासनेन तनूकरोति यत्तत्स्याद्राददेशाम् । के गे रं शदे ! कै कायतीति "क्वचित्"
0 1 7 17 [
प्रकार है--आचायंने सदशन जिनं नत्वा" कहा है । सत् शब्दका प्रयोग अनेकार्थ नाममाराके
वचनानूसार "विद्यमान, सत्य, प्रशस्त, पूजित तथा साधु" इन अ्थमिं होता है । अतः (सदशन पदका अथं होगा-सत् अर्थात् सत्य किन्तु असत्य नही, एेसा जिसका दशंन-मत है वह् । ` अर्थात् सत्य मतवाला' होता है । श्छोकमें जिन" पद विशेष्य है । इसका एक वचन रूपसे निर्देश किया गया है । इससे यह् सूचित होता है कि चौबीसों ही तीर्थंकर रागादि शत्रुओको जीतनेके कारण सांक नाभवाङे वीतराग जिन है, अतः इनमें-से जिस किसी भी एकं तीर्थकर जिनका ग्रहण कर लेना चाहिए \ “सहन ओर जिन' इन दो पदोसे यह भी सूचित होता दै कि चौ्रीसों ही तीर्थकर सदृशंन अर्थात् समीचीन मतके प्रकाशक थे, उनके शासनमें परस्पर कोई भी मतमेद या विरोध नहीं है । प्रहन-तब आज जो श्वेताम्बर ओर दिगम्बर रूपसे वोर शासनम परस्पर मतभेद दिखाई देता है वह क्यों है ? उत्तर- मल दुष्टिसे इनमें कोई मेद नहीं है । वह तो पीछेका है । इस तरह इन दो पदोसे जैन-दर्शनकी उपादेग्रता या सदशंनताका सूचन कर ही दिया है । वे जिन केसे है ? अवीर' हँ । "नत्वावीरम्' यहाँ नत्वा अवीरम्' एेसा पदच्छेद करना चाहिए । अवीरका अथं होता है--अवीर' का यहाँ आ + अ + उ + ईर इस प्रकार पदच्छेद किया गया है। आ = ब्रह्मा, अ = विष्णु, उ = ईखवर अर्थात् महादेव । आ, अ तथा उ .तीनौं स्वर मिरुकर सन्धिके नियमके अनु- सार “ओ' ब्रन जाते है । जो इस ओ" को अर्थात् ब्रह्मा विष्णु ओौर महेश्वरको ईरयति अर्थात् उनके मतका निराकरण कर प्रेरणा करता है--उन्हं खदेड देता ह वह (ओ + ईर् + अ)अवीर है । अर्थात् सृष्टिस्थिति-प्रख्यके कर्ता ब्रह्मा-विष्णु-महादेवको माननेवाले दशंनोका निरास करनेवाला अवीर है ।. 'स्याद्राददेशक' यहाँ स्याद्रादद + ई+श+क इस प्रकार पदच्छेद कियाहै। स्याद्रादको जो द्यन्ति अर्थात् छेदन करते है वे 'स्याद्वादद' अर्थात् संशयादि दूषणोका उद्भावन कर स्याद्रादके छेदन करनेवाले कहे जाते ह । यहँ दो-जवखण्डने धातुसे क्वचित्" इस सूत्रसे ड प्रत्यय करनेपर द' रूप निष्पन्नं होता है । इन स्याद्रादद अर्थात् स्याद्वादके विरोधियोको ई अर्थात् लक्ष्मी-- महिमाको जो "इयति" अर्थात् उनके मतका खण्डन करके कृश करता हं वह (स्याद्वादद +ई + श) स्याद्राददेश है । "कं गै र" घातुरणँ शब्दा्थ॑क है । के धातुसे क्वचित्ः' इसी सूत्रसे “ङ' प्रत्यय
[कि १ क य
१. आ स्व--जा०। भः कृष्णः आ स्वयंभूः उ-भ० २। “अकारो वासुदेवः स्यादाकारस्तु पिता-
महः ।"“““ उकारः शंकरः प्रोक्तः“ ---अनेकार्थध्वनि० इलो १, २। २. उरिति--आ० । मोरिति-क० । ३. “क्वचित्--उक्तादन्यत्रापि यथालक्ष्यं ड; रयात्" -हैम० कधघु° ५ १।१७१ । ४, -नः तेषाम्-भा० । |
का० १. ६.१२ 1 मङ्कलम् । | ९
[हिम० ५।१।१७१] इति डः, कं वचनम्, स्थाद्राददेशं कं वचनं यस्य तम् \ अनेन विहोषणेन प्रागुक्ता- नुक्तानामश्ञेषाणां बौ दादीनां संभवेतिह्यप्रमाणवादिचरकप्रमुखाणां च मतानासुच्छेदकारि वचनमित्यथंः ! “जिनं नत्वा मया सवंदशंनवाच्योऽर्थो निगद्यते" इत्युक्तं ग्रन्थकृता । अत्र च नमनक्रिया प्रक्काकुसंबन्धिनी, क्त्वाप्रत्ययस्य प्राक्कालवाचकत्वात्, निगदनक्रिया तु वतंमानजा । ते चैकेनैव ग्रन्थकृता क्रियमाणे नानुषवन्ने, अपरथा सकलन्यवहारोच्छेदप्रसंगात् । न चैवं भिल्र- कालयोः क्रिथयोरेककत् कता बौद्धमते संभवति, तेन क्षणिकवस्त्वभ्युपगमात् । ततः कथ्िद्बौद्ध- मतस्य प्रस्तुतग्रन्थस्यादावुक्तत्वेनोपादेयतां मन्येत, तच्चिवारणाय भागुक्तविज्ेषणसंगृहीतमपि बौद- मतनिरसनं पुनरिह सूचितं द्रष्टव्यम् ! एतेषां परदशंनानां निरसनप्रकारो ग्रन्थान्तरादवसेयः ! तदेवं जिनस्य विेषणद्रारेण सत्थदश्ंनतां सवंपरदहंनजेतवचनतां चाभिदधता अखिलान्यदश्ञंनानां हेयता जैनदशंनस्योपादेयता' च सूचिता मन्तव्या । ततो नास्माद् ग्रन्थकारात् सत्यासत्यदशंनविभा-
करनेपर क' शाब्द सिद्ध हौता है 1 जिसका क" अर्यात् वचन “स्याद्वाददेश' है अर्थात् स्याद्राद- विरोधियोका खण्डन करनेवाला है वह ॒स्याद्वाददेशक है । स्याद्वाददेशक विशेषणका भी अथं है जिसके वचन स्याद्रादमें विरोधादि असद्भूत दूष्णोंका आरोप करनेवाङे अन्य मतोका खण्डन करनेवाले हैँ वह् । इस तरह सस्याद्राददेराक' इस ॒विरोषणसे सूचित होता है कि भगवानुके वचन उक्त या अनुक्त सभी बौद्धादि दरंनोके तथा सम्भव ओर एेतिह्यको प्रमाण माननेवाले चरक आदिके मतोके उच्छेद करनेवले हैँ । अतः इनसे जैनदशंनके अतिरिक्त अन्यदर्शनोरमँ हेयताका भी सूचन हो ही जाताहै। ग्रन्थकारने आद्यरलोकमे “जिनं नत्वा सर्वदरांनवाच्योऽर्थो निगद्यते अर्थात् जिनदेवको नमस्कार कर सब दरानोके वाच्यार्थंका कथन करता हूं, यह् प्रतिज्ञा की हैँ । इसका तात्पयं है कि प्के नमस्कार करके इस समय ग्रन्थका कथन करता हू । क्तूवा प्रत्यय अतोतकारका वाचकं होता है अतः यहाँ नमनक्रिया प्राक्कालीन है तथा ग्रन्थनिगदनक्रिया वतंमानकार,न 1 ( जेन- मतमें आ्माको कथंचिल्ित्य स्वीकार किया है अतः) एक ही ग्रन्थकार प्राक्कालीन नमनक्रिया तथा उत्तरकालीन ग्रन्थनिगदनक्रियाका कर्ता हो सकता है, इसमे कोई विरोध नहीं है । सारांश दै किं यदि भिन्नकारीन दो क्रियाओंका कर्ता एक न हो अर्थात् पूवं ओर उत्तर पर्यायोमे एक आलत्मा- क[ अस्तित्व न माना जाय तो जगत्के समस्त व्यवहारोका उच्छेद हो जायगा क्योकि एक कर्ता जब भिन्लकालोन दो क्रियाओंको नहीं कर सकेगा ओर वह् अनेकं समय तक स्थिर ही नहीं रहेगा तब जगत्के देन-लेन, हिसिक-हिस्य, गुरु-शिष्य आदि सभी प्रतीतिसिद्ध व्यवहारोका लोपो जायेगा । अतः आत्मको कथंचिनित्य माननेपर ही उसमें भिन्नकालीन दो क्रियाओंका कैतुंत्व बन सकता है 1 किन्तु बौद्धोके मतमें भिन्नकारीन दो क्रियाओंका एक कर्ता नहीं बन सकता क्योकि उन्होने वस्तुको क्षणिक मानाहै। सारशहैकि शयो यत्रैव स तत्रैव यो यदेव तदेव सः-जो जहाँ भौर जब उत्पन्न हुआ है वह् वहीं ओर उसी क्षणमें ही रहता है कालान्तर तथा देशान्तरमें नहीं पहुंच सकता अतः एसे अनन्वित क्षणिकवादमें किसी भो पदार्थका भिन्नकाखीन दो क्रियाओके काल तक पहुंचना सम्भव ही नहीं है । यद्यपि स्याद्वाददेराक आदि विशेषणोसे बौद्धमतका निरास हो जाता था फिर भी नत्वा सवंदशांनवाच्योऽथंः निगद्यते" इस प्रतिज्ञावाक्यसे व्यक्त होनेवाले व्यंग्यार्थसे बौद्धमतका पुनः निराकरण इसलिए किया है कि कोई यह् न समञ्ञ ले कि इस ग्रन्थमे सर्वप्रथम बौद्धदशंनका ही निरूपण है अतः बौद्धददोंन ही उपादेय है । इन सभी परदशंनोका खण्डन अन्य जैनतकंग्रन्थोमें पर्याप्त विस्तारसे किया गया है अतः वह् उन्हीं ्रन्थोसे देख लेना चांहिए 1 1. इस तरह 'जिनदेव' के सहशंन स्याद्राददेशक आदि विशेषणो -द्रारा ग्रन्थकारने जेनदशंनकी `
१, -ता सू--जाऽ, कं०। ४;
१० षडदर्ांनसमुच्चये [ का० १. § १३-
गानभिज्ञानामष्यपकारः कश्चन "संभवतीति, तद्विभागस्यापि व्यञ्जितत्वात् ।
. १ १३. अत्रापरः कथिदाहु- ननु येषां सत्यासत्यमतविभागाविर्भावके ग्रन्थकारवचसि सभ्य गास्था न भवित्री तेषा का वातेति । उच्यते--पेषामास्था न भाविनी ते देधा--एके रागदेषाभावेन मध्यस्थचेतसः, अन्ये पुना रागद्धेषादिकाटुष्यकदुषितत्वाद् दुर्बोधचेतसः । ये दुबेधिचेतसः तेषां सवं- जञेनापि सत्यासत्थविभागप्रतीतिः कतु दुःशका कि पुनरयपरेणेति तानवगणय्य मध्यस्थचेतस उदिहय विहोषणावुत्या सत्यासत्यमतविभागज्ञानस्थोपायं प्राह- सहशंनमिति । वीरं कथंभुतम् । सदश्ेनम्- सन्तः साधवो मध्यस्थचेतस इति यावत् । तेषां दशनं ज्ञानम् अर्थत्सिव्यासत्यमतविभागज्ञानं यथा- वदाप्तत्वपरीक्षाक्षमत्वेन यस्माद्रीरात्स सदृकषंनस्तम् । एतेन श्नीवीरस्थ यथावदाप्तत्वादिस्वरूपमेवं परीक्षणीयम् इति सुचितम् । अथवा, सतां साधूनां दज्ञनं तत्तवा्थश्रद्धानलक्षणं यस्मात् स सदुश्ञंनः । मथवा, सन्तो विद्यमाना जीवाजीवाद वः पडार्थास्तेषां दशनं यथावदवलोकनं यस्माद्वीरात्स सहशंन- स्तम् । कुत एवंविधम् । यतः स्याद्राददेडाकं प्रागक्तस्याद्रादभाषकम् ।! एव विधमपि कुतः । इत्थाह--यतो जिनं राग-देषाद्विजयनह्ीलम् । जिनो हि वीतरागत्वादसत्थं न भाषते, तत्कारणा-
जात् जा ज काक कौ = 0 -भ- @ = ००
सत्यताका तथा समस्त परदरशंनोपर विजय प्राप्त करनेवारे वचनका अभिधान करके यह् सूचित किया है #ि अन्य समस्त दशंन हेय हैँ तथा जैनदशंन उपादेय है । इसलिए इस ग्रन्थकारसे उन अल्पवुद्धि श्रोताओके भी अपकारकी सम्भावना नहीं की जा सकती जो दशंनोको सत्यासत्यताका निर्णय करमैमे असमथं है |
६ १३. शंका--दरांनोमे सत्यासत्य विभाग करनेवाके इस ग्रन्थकारके वचनोमें जिन श्रोताओकी सम्यक् श्रद्धा न हो उनको सत्यासत्यका परिज्ञान कंसे होगा ?
समाधान-जो श्रद्धा नहीं करेगे एसे श्रोता दो प्रकारके हो सकते है--(१) रागदेषादिजन्य दुराग्रहसे रहित मध्यस्थ चित्तवृत्तिवारे, (र) रागद्वेषादिसे कलुषित होनेके कारण दुर्बोध चित्तवाले। इनमे जो दुर्बधि चित्तवाके हैँ उन्हे तो स्वयं सव॑ज्ञ भी सत्यासत्य विभाग नहीं करा सकता दूसरो- कीतो बात ही क्या? इसलिए एेसे श्रोताओकी उपेक्षा करके मध्यस्थ चित्तवृत्तिवाले जिज्ञासु श्रोताओंको कक्षयमें रखकर सदशंन' आदि विशेषणोंकी पुनः आवृत्ति करके सभी दशनोमें सत्या- सत्य विवेक करनेका उपाय बताते हँ । |
मूलमें वीरको सद॑न कहा गया है । । सदृशंन' का अथं है--जिस भगवान् वीरके प्रसादसे सत् अर्थात् मध्यस्थ चित्तवृत्तिवारे साधु पुरुषोको आप्तको यथावत् परीक्षा करनेकी दक्ति होनेके कारण दर्शंन-ज्ञान अर्थात् मतोमे सत्यासत्यका विवेकं ज्ञान उत्पन्न होता है, वह् सदृर्शंन वीर है । इस विशेषणसे यह सूचित होता है कि भगवान् वी रके आप्तत्व आदि स्वरूपकी ही यथावत् परीक्षा करनी चाहिए । अर्थात् चूंकि भगवानु वीर आप्तत्वको कठिन परीक्नाको सह् सकते है, वे उसमे खरे उतर सकते हैँ अतः इन वीरके प्रसादसे अन्य साधुपुरुषोको भी सत्यासत्य विवेक करनेकी सामथ्यं प्राप्त हो सक्ती है । इसीलिए टीकाकार यहाँ भगवान् वी रके आप्तत्वकी परीक्षाकी सूचना. दे रहे हैँ । अथवा जिस वीरके प्रसादसे सत् अर्थात् साधुजनोको दरांन अर्थात् तच्वार्थश्रद्धान शूप सम्यग्दशंनकी प्राप्ति होती है वह सदशन वीर है । अथवा जिस वीरके प्रसादसे सत् अर्थात् विद्यमान जीवाजीवादि पदार्थोका दशंन अर्थात् यथाथं अवलोकन होता है वह् सदशन वीरहै।
प्रष्न--वीर भगवानुकी सदृशंनता कैसे जानी जाती है ?
उछ्र--च् कि भगवान् वीर स्याद्वादके उपदेशक हँ इसलिए वे सहशंन हैँ । ओर वे यतः राष-दरेषादि शत्रुओके जीतनेके कारण जिन हैँ इसीलिए वे सत्य-स्याद्रादके उपदेशक हैँ । जिन
१. संभवी तद्वि-प० १,२,भ० १,२।
1
|६-.----.- ~ ----
- का० १. ६ १४ ] मङ्कलम् । ११
भावादिति भावः" । शेषश्लोकव्याख्यान प्राग्वत् । $ १४. एवं चात्रेवमुक्तं भवति- ये हि श्रीवीरस्प्र यथावदाप्तत्वादिपरीक्षां विधास्यन्ते स्याद्रादं च तत्प्रणीतं मध्यस्थतया सम्प्रगवरोक्य पश्चात् परमतान्यप्यालोकिष्षन्तेर ते सत्यासत्य- दक्ंनविभागमपि स्वयमेवावभोत्स्यन्ते, किमस्मद्चनस्यास्थाकरणाकरणेनेति \ एतेन म्रन्थङ़ता स्वस्य सवंथात्राथं माध्यस्थ्पमेव रातं द्रष्टव्यम् \! सत्यासत्यदशंनविभागयपरिज्ञानोपापश्च हितब्रुद्धचात्रा- भिहितोऽवगन्तव्यः; पुरातनेरपीत्थमेव सत्यासत्यदश्ंनविभागस्य करणात् । तदुक्तं पुज्यथी- हरिभद्रसुरिभिरेव लोकतत्वनिण्ये- [र ("बन्धनं नः स भगवान् रिपवोऽपि नान्ये, साक्षान्न भ्दृष्टवर एकतमोऽपि" चैषाम् । शरुत्वा वच॑ः सुचरितं च पृथग् विशेषं वीरं गुणातिशयलोकतया धरिताः स्मः ।।१॥1'' [ छोकतत्त्व ° १।३२ ] “पक्षपातो नमे वीरेन द्वेषः कपिलादिषु 1 | युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कायं: परिग्रहः ॥२॥\' [ लोकतत्त्व ° ११३८ |
वीतराग होनेके कारण असत्य नहीं बोर सकते, क्योंकि असत्थ बोलनेके कारण राग-दरेष-मोह् तथा अज्ञान होते हँ 1 ओर ये उनमें नहीं हैँ । शलोकके अन्य पदोकी व्याख्या परेको ही तरह यहाँ समज्ञ छेनी चाहिए ।
§ १४. इस व्याख्याका यह फलितां हु किं जो तटस्थ जिज्ञासु वीरभगवानके आप्तत्वकी यथावत् परीक्षा करके उनके द्वारा प्रणीत स्याद्वाद सिद्धान्तका मध्यस्थवृत्तिसे अच्छी तरह आखोडन करनेके बाद दुसरे दशंनोंका अध्ययन करेगे उन्हें दशंनोके सत्यासत्यविवेकका स्वथं ही अनुभव हो जयेगा, एेसे जिज्ञासु श्रोताओंको हमारे ( प्रन्थकारके ) वचनोपर श्द्धाया अश्रद्धा करनेकी आवस्यकता ही नहीं पडेगी 1 इस तरह ग्रन्थकारने अपने वचनोमें ही बलात् श्रद्धा करनेपर भार त देकर स्वंत्र अपनी परम मध्यस्थवृत्ति दिखायी है 1 यहा सत्यासत्य विभागज्ञानके उपायोको प्रदर्शन तो मात्र परहितवबृद्धिसने ही किया गया है, किसी दशंनपर बलात् सत्यत्व या असत्थत्वके आरोप करनेका ठेशमात्र भी अभिप्राय नहीं है) पुरातन आचार्योमिं भी इसी तटस्थवृत्तिसे दशनम सव्यासत्यविभाग करनेकी शैली रही है । पूज्य श्रीह॒रिभद्रसूरिने ही खोकतत्वनिणंय ग्रन्थमे कहा है कि--"न तो भगवान् हमारे बन्धुही है ओर न अन्य हरि-हरादिक शत्रुहीदह1 ओरन इन सबमे-से किसीको भी हमने प्रत्यक्ष ही देखा है । हाँ, इन सबके दारा उपदिष्ट शास्त्रोका श्रवण कर् तथा इनके चरित्रका अच्छी तरह विचार अवद्य किया है 1 ओौर इसी विचारके परिणाम स्वरूप हमारी गुणानुरागिणी बुद्धि, तथा गृणातिरायपर मोहित हृदय भगवान् महावौरको शरणमे पहुंच गया है ॥ १1 “हमारा वीरमें कोई पक्षपात-राग नहीं है ओरन कपिलादिकमं द्वेष ही । हमारी तो यह् स्पष्ट नीति है कि- जिसके वचन युक्तियुक्त हो, तकंशुदध हों उसीका स्वीक।र करना चाहिए ॥ २॥'
१. तुलना-““आगमो ह्याप्तवचनमापरं दोषक्षयाद्विदुः । क्षीणदोषोऽनृतं वावयं न ब्रयाद्धेत्वसंभवात् ।' ~~
साख्प्र० मठरण० प° ६६३ । ““सगाद्रा द्वेषाद्रा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतम् । यस्य तु नैते दोषास्तस्या- नृतकारणं नास्ति ।1 --यश०्ड ०० २७ । आप्तस्व° इरो° ३-४ । २. -रःकयिष्यन्ते गा०, क० । ३. अरयोऽपि'--खोकक्तस्अ० । ४. 'दृ्टतर एकतमोऽपि'- को ९३० । दुष्टतर प१० १,२,अभ०१; २1 ५. एकतरोपिः क, प० १, २,भ०१।
१२ षडदर्रनिसमुच्चये [ का० १, § १५ -
§ १५. प्रभृश्वीहेमपुरिभिरप्युक्तं वीरस्तुतौ- न्न श्रद्धर्यत त्वयि पक्षपातो न दवेषमात्रादरुचिः परेषु । यथावदाप्तत्वप रक्षया तु त्वामेव वीरप्रभुमाधिताः स्मः 1१11" | [अयीगग्य° इलो० २९ इति]
६ १६. नन्वत्र सवंदशनवाच्योऽर्थो वक्त प्रक्रान्तः, स च संख्यातिक्रान्तः, तत्कथं स्वल्पीय- सानेन प्रस्तुतज्ञास्त्रेण सोऽभिधातु शक्यः, जैनादन्यदशंनानां परसमयापरनामधेयानामसंख्यातत्वात् । तदुक्तं सम्मतिसुत्रे भौसिद्धसेनदिवाकरेण-
“जाव्रदया वयणपहा तावद्या चेव हु ति नयवाया । जावदया नयवाया तावइया चेव परसमया ॥१॥ | [ सन्मति ० २।४७ |]
8 १७. व्थाटया.--अनन्तधमत्मिकस्य वस्तुनो य एकदेशोऽन्यदेडानि रपेक्षस्तस्य यदवधारणं सोऽपरियुद्धो नथः । स एव च वचनमागं उच्यते । एवं चानन्तधर्मत्मिकस्य स्वंस्थ वस्तुन एकदेशा- नामितरांहनिरपेक्षाणां यावन्तोऽवधारणप्रकाराः संभवन्ति तावन्तो नया अपरिद्युद्धा भवन्ति । ते च वचनमार्गा इत्युच्यते । ततोऽयं गाथाथंः- सवंस्मिन् वस्तुनि यावन्तो यावत्संख्या वचनपथा वचनानामन्योन्येकदेहाताचकानां शब्दानां मार्गा अवधारणप्रकारा? हेतवो नया भवन्ति तावन्त एव भवन्ति नयवादाः, नयानां तत्तदेकदेशावधारणप्रकाराणां वादाः प्रतिपादकाः शनब्दप्रकाराः । यावन्तो नयवादा एकैकांडावधारणवाचकराब्दप्रकाराः तावन्त एव धरसमयाः परदशंनानि भवन्ति, स्वेच्छा-
§ १५. प्रमु श्रीदेमचन्द्राचायं भी वीरस्तुतिमें कहते हँ कि-“अहो वीर, मेने श्रद्धाके कारण तुम्हारे साथ पक्षपात नहीं किया है ओरन कपिलादिमें द्वेषके कारण अरुचिहीकीटहै। हमतो परीक्षाकी + चि ह । तुम्हारे अप्तत्वको यथावतु परीक्षाकरकेही हम तुम्हारी शरणको प्राप्त हृए्हं।
§ १६. शंका--इस ग्रन्थमें सर्वदं नोका वणंन करनेको प्रतिज्ञा को गयी है परन्तु सवंदशंन तो असंख्यात है अतः इस छोटे-से ग्रन्थके द्वारा ` केसे उनका वणंन कियाजा सकतारहै, क्योकि जैनदशंनसे भिन्न अन्य परसमय असंख्यात हँ ? इसी बातको सम्मतिसूत्रमे श्रीसिद्धसेन दिवाकरने भी बताया है--'जितने वचनमागं हैँ उतने ही नयवाद है, ओर जितने नयवाद हँ उतने ही परसमय है--परदर्शन हं 1"
. इ १७. व्याख्या-वस्तु अनन्तधमत्मिक है । उसके किसी भी एक धर्मका अन्यधर्मोकी अपेक्षा न-करके "यहु एेसा ही है' इस प्रकार अवधारण करनेवारे जितने भी नय हैँ वे सब अपरिशुद्ध नय है । ध दुर्नय है । इन्दं अपरिशुद्ध न्योको वचनमागं कहते हैँ । वस्तुमें जितने वचनमागं अर्थात् एक-एके धमेकि निरपेक्न भावसे अवधारण. करनेके प्रकार सम्भावित हैँ उतने ही नयवाद होते है । ओर जितने नयवाद अर्थात् ` एक-एक धर्मोको अवधारण करनेवाले वचनोके प्रकार हैँ उतने ही परसमय अर्थात् परंद्शंन हैँ । क्योकि अपनी इच्छासे कल्पित शाब्दिक विकल्पोसे ही परसमयोकी
१. “अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनः एकदेशस्य यदन्यनिरपेक्षस्य अवधारणम् अपरिशुद्धो नयः, तावन्मात्रार्थस्य वाचकानां शब्दानां यावन्तो. मार्गाः हितवो नयाः तावन्त एव भवन्ति, स्वेच्छा प्रकल्पित विकल्पनिबन्धनत्वात् परसमयानां परिमितिनं ` विद्यते । ननु यद्यपरिमिताः परसमयाः कथं तन्निबन्धनभूतानां नयानां संस्यानियमः-- ““नगमसंग्रहन्यवहार्जुसूत्रशन्दसमभिरूटैवम्भूता नयाः" [तत्त्वार्थसू० १।३२] इति श्रूयते; न; स्यू कतस्तच्छ्र तेः, अवान्तरमेदेन तु तेषामपरिमितत्वमेव स्वकल्पनाश्शिल्पिघटितविकल्पानामनियतत्वात् तदृत्थश्रवादानामपि तत्संश्यापरि माणत्वात् ।""-- सन्मति ० टी ° प° ६५१५ । शास्त्रवा० यद्खो० पृ० २७५ ° । तुना---घवक्ार प° ८० । गो° कम० गा० ८९४। २..-रा भव-क०, प० १, २, भ० १।
|^
- का० १. ११९] मङ्कलम् 1 १३
प्रकल्पितविकल्पनिबन्धनत्वात्परसमयानाम्, विकल्पानां चासंख्यत्वात् \ अयं भावः-घावन्तो जने तत्तदपरापरवस्त्वेकदेल्ानामवधारणप्रतिपादकाः शब्दघ्रकारा भवेयुस्तावन्त एव परसमया भवन्ति ¦ त॑तस्तेषामपरिमितत्वमेव, स्वकल्पनारिल्पिघटितविकल्पानामनियतत्वात् तदुत्थप्रवादानासपि तत्संश्यापरिमाणत्वादिति । तदेवं गणनातिगाः परसमया भवन्ति । अथवा 'सुत्रकरदाख्ये द्वितीयेऽङ्कः परप्रवादुकानां त्रीणि शतानि त्रिषषट यधिकानि परिसंख्या- यन्ते । तदथंसंग्रहगाथेयम्- ““असिइसयं किरियाणं अकिरियवारईण होई चुलसीई । अन्नाणि अ सत्ती वेणइयाणं च बत्तीसं ।१।।'' [सूत्रक० नि° गा० ११९] ६ १९. अस्या व्धाख्धा-अह्ीत्यधिकं हातम्, ““क्िरियाणं ति" क्रिणावादिनाम । तत्र क्रियां जीवाद्यस्तित्वं बदन्तीत्येवंशीखाः क्रियावादिनः>, मरीचिकृमारकपिलोल्कमाठरप्रभृतयः । ते
सृष्टि होती है तथा विकल्प असंख्य होते है ! तात्पयं यह् है कि-लोकमे जितने एक-एक धमक
अवध।रण करनेवाले शब्द प्रयोग हो सकते हैँ उतने हौ परदशंन होते हँ 1 चकि काल्पनिक विकल्प ` अपरिमित है अतः उनसे उत्पन्न होनेवाङे प्रवाद भो उतने हौ होते हँ 1 इस तरह परसमय अन- गिनत होते है ।
8 १८. अथवा, सूत्रकृत नामके दूसरे अंगमे परवादियोके ३६२ प्रकारोका इस गाथाभे
संग्रह किया है--“क्रियावादियोकि १८०, अक्रियावादियोके ८४, अज्ञानवादियोके ६४, तथा विनय- वादियोके ३२ प्रकार होते है 1"
§ १९. उ्थाख्या-क्रियावादियोके १८० मेद है । क्रिया अर्थात् जीवादि पदा्थकि अस्तित्वको
१. -उताख्ये १० १, २, भ० १, २।२. ““चउविहा समोसरणा पण्णत्ता, तं जहा--किरियावादी, अक्रिरियावादी, अण्णाणिवादी, वेणडइयवादी।”--मग० ३०।१।. स्था० ४।४।३५५। सर्वार्थसि० ८।१ ।
अत्थि त्ति किरियवादं वयंति नत्थि त्ति किरियवाईइओ । अण्णाणिय अण्णाणं वेण्या विणयवायंति । सूत्र० नि° गा० ११८। ““जसियसयं किरियाणं अक्किरियाणं च होइ च॒लसीती । अन्नाणिय सत्तर ठी वेणइयाण च बत्तोसा । ' सृन्र० नि° गा० ११९। तुलना--““सुअगडे णं असीअस्स किरियावाइसयस्स चउरासीइए अकरिरिआवार्ईणं सत्तदरीए अण्णाणिअवाईणं बत्तीसाए वेणदअवार्ईणं तिण्हं तेसद्राणं पासंडिज असयाणं ।--नन्दीसू° ४६। ““असियस्यं किरियाणं अकिरियवारण होई चखसोई 1." आचा० शी ° १।१।१।३) ““असियक्तय किरियवाई अक्िकिरियाणं च होड चुर रोदी 1 सत्तदी अण्णाणी वेणेया होति बत्तीसा ।'' मावप्रा° गा० १३५ । “उक्तं च-असिदिसदं--"--घर्वाथसि ° ८।५। “असिदिसदं किरियाणं अक्क्रिरियाणं च आहु चुरसीदी । सत्तटृरुण्णाणीणं वेणयियाणं तु बत्तीसं 11" -गो° कम० गा० ८७६। ३. तुलना--““कौत्कङं काण्डेविदधि कौरिक-हरिदमश्र-मांछ्यिक-रोमस-हारोत-मुण्डावलायनादीनां क्रिया- वा ददुष्टोनामशीतिशतम् ।""--राजवा ° षू ° ५१ । “"जीवादिपदाथंसनावोऽप्त्येवेत्येवं सावघारणक्रिया- म्ुपगमो येषां ते अस्तीतिक्रियावादिनः ।'*--सूत्रशी०१।१२ 1 ‹ क्रिया करवा विनान संभवति, सा चात्मसमवाभिनीति वदन्ति तच्छीलाइच ये ते क्रियावादिनः । अन्ये त्वाहु.-क्रियावादिनो ये ब्रुवते क्रिया- प्रधानं कि ज्ञानेन । अन्ये तु व्याख्यान्ति क्रियां जीवादिः पदार्थोऽस्तीत्यादिकां वदितुं सीरं येषां ते क्रियावादिनः । "जगण भम० ३०।१। "क्रियां जोवांजोवादिरर्थोस्तीत्येवं रूपां वदन्तीति क्रियावादिन आस्तिका इत्यथः 1"" स्था०--परम० ४।४।२४४५ । “तत्र न कर्तरमन्तरेण. क्रिया पण्यदन्धादिलक्षणा संभवति तत एवं परिज्ञाय तां क्रियाम् आत्मसमवायिनीं बदन्ति तच्छीटाह्व ये ते क्रियावादिज्नः ।"*
--नन्दिन्म० ए० २१३ 3 । ४. प्रस्तुतमें सूत्रकृतकी नियुक्ति भी सूत्रकृतांगमे सन्निविष्ट मानकर विधान हे ।
१४ षड्दरंनसमुच्चये [ का० १. $ १९ -
` पुनरमुनोपायेनाशीत्थविकशतसंख्या विज्ञेयाः । जीवाजोवास्रवबन्धसंवरनिर्जरापुण्यापुण्यभोश्षरूपा- स्रवयदार्थान् ष्यरियाटचा पट्िकादौ ` विरचय्प्र जेत्रपवा्थंस्याघः स्वपरभेदावुपन्यसनीयो, तयोरधो नित्थानित्यमेदौ, तयोरव्यधः२ कालेश्वरात्मनियतिस्वभावभेदाः पच्च न्यसनीया: । ततदचेवं विकल्पाः कतंग्याः । तद्यथा अस्ति जीवः स्वतो नित्यः कालतः" इत्येको विकल्पः ।
अस्य च विकल्पस्यायम्थंःः- विद्यते खल्वयमात्मा स्वेन रूपेण नित्यश्च कालतः
माननेवारे मरीचिकूमार, कपिल, उलूक, माठर आदि क्रियावादी हैँ । इनके १८० भेद इस प्रकार समञ्लना चाहिए-जीव, अजीव, आसव, बन्ध, संवर, निर्जरा, पुण्य, पाप तथा मोक्ष इन नव पदार्थोकरो पटी आदिपर एक पंक्तिमें स्थापित करो । ` जीव पदाथके नीचे स्वतः ओर परतःयेदो भेद स्थापित करके फिर एकके नीचे नित्य ओर अनित्यरूपसे भी मेद स्थापित करो । फिर हूर एकके नीचे काल, ईइवर, आत्मा, नियति तथा स्वभाव रूपसे पांच-पांच मेद स्थापित करना चाहिए । इस तरह एक जीव पदाथंके इस प्रकार विकल्प होगे--जीव स्वतो नित्य रूप है काल।दिसे--पांच मेद, स्वतोऽनित्य रूप है कालादिसे-रपांच भेद, जीव परतो नित्य रूप है काकादिसे-्पांच मेद तथा परतोऽनित्यरूप कारादिसे-पांच मेद मिलकर बीस भेद हुए । इस तरह नव पदार्थोकि २००८९ = १८० भेद हो जाते हँ 1 इन विकल्पोंका अथं इस प्रकार है- पत्म विकल्प अस्ति जीवः स्वतो नित्यः कारुतः'-जौव स्वतः अपने स्वरूपसे विद्यमान है, नित्य है तथ( कारके अधीन प्रवृत्ति करताहै।
कालवादियोके मतसे यह आत्मा स्वरूपसे विद्यमान है, नित्य हं तथा कालाधीन होकर प्रवृत्ति
१. ` तुखना--“जौवादयो नव. पदार्थाः परिपाट्या स्थाप्यन्ते, तदवः “स्वतः परतः" इति भेदद्टयम्, ततोऽप्यघो नित्याऽनित्यमेदद्वयम्, ततोऽप्यधस्तत्परिपाटूया कालस्वभावनियतीर्वरात्मपदानि पञ्च व्यवस्थाप्यन्ते. । ततइचैवं ` च।रणिकाक्रमः; तद्यथा अत्ति जीवः स्वतो नित्यः कारतः, तथा अस्ति जीवः स्वतोऽनित्यः कालत एव । एवं. परतोऽपि भङ्खकदयम् । सर्वेऽपि , चत्वारः काडेन लम्बाः, एवं स्वमावनियतीङवरात्मपदान्यपि प्रत्येकं चतुर एब लमन्ते । तथा च पञ्चापि चतुष्कका विातिर्भवन्ति । सापि जीवपदार्थेन -लन्ा । ` एवमजीवादयोऽप्यऽ्टौ प्रत्येकं विशति लभन्ते । ततदच नव विशतयो मीकिताः क्रियावादिनामशीप्युत्तरं शतं मवन्तीति ।"--सृत्र° शो० ५।,२। घाचा० ` क्ी० १।१।१।६ स्था० अम० ४।४।३४५। नन्दी ° मख्य० सू० ४६ । “अत्थि सदो परदोचि य णिच्चाणिच्वत्तणेण य णवत्था । कालीसरप्पणियदिसहावेहि यतेहि भगा हु। प्रथमतः अस्तिपदं लिखेत्, तस्योपरि स्वतः परतः नित्यत्वेन अनित्यत्वेनेति चत्वारि पदानि लिखेत्, तेषामुपरि जीवः अजीवः पुण्यं पापम् आखवः संवरः निजंरा बन्धः मोक्ष दति नव पदानि लिखेत्, तदुपरि काल ईरवर आत्मा नियतिः स्वभाव इति पंञ्च पदानि रिखेत् । तैः खत्वक्षसंवारक्रमेण मङ्गा उच्यन्ते; तचथा- स्वतः सन् जीवः कालेन भस्त त्रियते । परतो जौवः कालेन अस्ति क्रियते । नित्यत्वेन जीवः कालेन अस्ति क्रियते । अनित्यत्वेन जीवः कालेन अस्ति क्रियते । तथा अजीवादिपदार्थं प्रति चत्वारश्चत्वारो भूत्वा कालेनैकेन सह षटूत्रिशत् । एवमीश्वरःदिपदैरपि षट्त्रिशत् षट्त्रिंशत् भूत्वा अशौत्यग्रशतं क्रिया- वादमड्गाः स्युः1'--गो० कम०, टी०; गा० ८७७। २. “क्रि कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जोवाम केन क्व च संप्रतिष्ठा: । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ काकस्वमावो नियति्यंद्च्छा भानि योनिः पुरष इति चिन्त्यम् । संयोग एषां नत्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥1 "~= वरेताङ्व० १।२; ६।१ मारदुपरि० ९।१ । “कालो सहाव णियई पृन्वक्यं पुरिसकारणेगंता ---घन्भरति० ३।५३। घमंसं° गा० ५६६। ३. "तत्र स्वत इति स्वेनैव क्पेण जीवोऽस्ति न परषाध्यपेक्षया हस्वत्वदीर्घत्वे इव । नित्यः शाश्वतः न क्षणिकः पूर्वोत्तरकालयो रवस्थितत्वात् । कालत दवि.काल एव विद्वस्य स्थि्युत्पत्तिप्रलयकारणम् । उक्तं च~'का छः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
|
1 न भ
-का० १. § १९ ] मङ्गलम् । १५
कालवादिनो मते! कालवादिनश्चः नाम ते मन्तव्या ये कालक्रतमेव जगत्सवं मन्यन्ते १ तथां च ते प्राहुः-न कालसमन्तरेण चम्पकाह्ोकसहकारादिवनस्पतिकुसुमोद्गमफलबन्धादयो हिमिकणानु- षक्तशीतप्रपातनं्षन्नरचारगर्भाधानवर्षादथो वर्तृविभागसंपादिता बाकुसारयौवनवलोषलितागमादयो
करता है 1 कारवादी इस समस्त जगत्को कालकृत मानते हैँ । उनका अभिप्राय है कि-कराकके
विना चम्पा अरोक आम आदि वनस्पतियोमें फर तथा फलोका रुगना, कुहुरेसे जगतुको धूमिक करनेवाला हिमपात, नक्षत्रोका संचार, गर्भाधान; वर्षां आदि ऋतु विभागसे होना; बचपन,
कालकः सुप्तेषु जागति कालो हि दुरतिक्रमः ।' स चातीन्धियः युगपच्चिरक्षिप्रक्रियाभिन्यङ्ग्यो हिमोष्णवर्षा- न्यवस्थाहैतुः क्षणक्वमुहूतयामादोरात्रमासतु-अयन - संवत्सरथुगक्ल्पपल्योपमषागरोषमोत्सपिण्यवसर्पिणीपु- द्ग प रावर्तातीतानागतवतमानसर्वाद्धादिन्यवहाररूपः। द्ितीयविकल्पे तु कालादेव आत्मनोऽस्तित्वमभ्युपेयं किन्त्वनित्योऽसौ इति विदो षोऽयं पूव विकल्पात् । तृतीयविकल्पे तु परत एवास्तित्वमभ्युपगम्यते ? कथं पुन परतोऽस्तित्वमात्मनोऽभ्युपेयते ? नन्वेतत् प्रसिद्धमेव सवपदार्थानां परपदाथ॑स्वरूपापेक्षया स्वरूपपरिच्छेदो यथा दीघंत्वापेश्नया ्स्वत्वपरिच्छेदो ह्स्वत्वापेक्षया च दीघत्वस्येति । एवमेव चानात्मनः स्तम्भ- कुम्भादीन् समीक्ष्य तद्टयतिरिक्ते वस्तुनि आत्मबुद्धिः प्रवत॑ते इति, अतो शार्त्मनः स्वरूपं तत् परत एवा- वधघार्यते न स्वत इति । चतुथ विकल्पोऽपि प्राग्वदिति चत्वारो विकल्पाः 1 --भाचा० शो० १।१।१।४ | स्था० अमन० ४।४।३४२५ । “जस्य च विकल्पक्यायम५ः- विद्यते खल्वयमात्मा स्वेन रूपेण नित्यश्च कारतः कालवादिनो मते । कालवादिनर्च नाम ते मन्तव्या ये कालकृतमेव सवं जगत् मन्यन्ते । तथा च ते आहुः-न कालमन्तरेण चम्पकाशोकसहकारादिवनस्पतिकुसुमोद्गमफलबन्धादयो हिमकणानुषवत- शीतप्रपातनक्षत्रगर्भाधानवर्षादयो वां ऋतुविभागसंपादिता बालकुमारयौवनवकिपकितागमादयो वाऽव- स्थाविशेषा घटन्ते, प्रतिनियतकाल्विभाग एव तेषा मुपलभ्यमानत्वात्, अन्यथा सखवमव्यवस्था भवेत, न चेतद् रखष्टमिष्टं वा। अपि च मुद्गपक्तिरपिः."--नन्दि० मङ्य० ए° २१६8. ।
१. “"विधातृविहितं मार्गं ॒न करिचदतिवत्तते । कालमूलमिदं सर्वं भावाभावौ सुखासुखे ॥ कालः सृजति भूतनि काकः संहरते प्रजाः । संहरन्तं प्रजाः कालं कारः शमयते पुन ॥ कालो विकुरुते भावान् सर्वाल्लोके शुभाशुभान् । कालः संक्षिपते सर्वाः प्रजा विसुजते पुनः॥ कालः सुषु जागत्ति कालो हि दुरतिक्रमः। कालः स्वेषु भूतेषु चरत्यविधृतः समः ॥ अतीतानागता भावा ये च वर्तन्ति साम्प्रतम् । तान् कालनिर्मितान् बुद्धवा न संज्ञां हातुमर्हसि ॥।* --महामा० बादिण० १।२७२-७६। “कालः पचति भूतानि“ -य्मिस्तु पच्यते कालो यस्तं वेद स वेदवित् ।'"-- मैत्रा ० ६।१५; उपनिषद्राक्यकोष । “कालः कलयते लोकं काकः करयते जगत् । कालः कलयते , वि्वं तेन कालो- ऽभिधीयते ॥ काकस्य वशगाः सत्रे देवषिसिद्धकिन्नराः। कालो हि भगवान् देवः स साक्षात्परमेरवरः ॥ सर्गपालनसंहर्ता स कालः सतः समः । कालेन कल्प्यते विद्वं तेन कालोऽभिधीयत्े ॥ येनोत्पत्तिहच जायेत येन वै कल्प्यते कला । सोऽन्तवच्च भवेत्काखो जगदुत्पत्तिकारकः ॥ यः कर्माणि प्रपर्येत प्रकर्षे वतमानके । सोऽपि प्रवत्तको जेयः कालः स्यात् प्रतिपांलकः ॥ येन मृत्युवशं याति कृतं येन ख्यं व्रजेत् । संहर्ता सोऽपि विज्ञयः काकः स्यात् कछनापरः ॥ कालः सुजति - भूतानि कालः संहरते प्रजाः । कालः स्वपिति जागति कालो हि दुरतिक्रमः।॥ काठे देवा विनश्यन्ति काटे चासुरपन्नगाः 1 नरेन्द्राः सर्वजीवाश्च काले सवं विनश्यति ॥)' हारीत खं० स्था० १ भ० ४., "केचित् कांलं कारणतया वर्णयन्ति- कालः सृजति मृतानि" -सांख्य° माठर० पू० ७६। माध्य० व° पृ० ३८६। चतुःकष० पृऽ ६८ । कोकत० १।६१। सन्मति० टी° एरु ७११1 "कालो सव्वं जणयदि कालो सन्वं विणस्सदे भदं । जागत्ति हि सृुत्तेसु त्रि ण सक्कदे वंचिदुं कालो ।।""--गो० कमे० गा० ८७९ । २ -तक्षव- गर्भा--क०, १० १, २,भ०१,२)
१६ षडदर्शानसमुच्चये [ का० १. §8२०-
वावस्थाविशेषा घटन्ते, भ्रतिनियतकालविभांगत एव तेषामुपलस्यमानत्वात् । अन्यथा सवंमन्यव- स्यधा भवेत् । न चेतदृदृष्टमिष्टं वा । अपि च, मुद्गपक्तिरपि न कालमन्तरेण लोके भवन्ती दृकूयते, कितु कालक्रमेण । अन्यथा स्थालोन्धनादिसामग्रीसंपकंसंभवे प्रथमसमयेऽपि तस्या भावो भवेत्, न च भवति, तस्मादयत्कृतकं तत्सवं कालकृतमिति । & २०. तथा चोक्तम्-
“न॒ कार्व्यतिरेकेण गभ॑वालयुवादिकम् ।.
यत्किचिज्जञायते रोके तदसौ कारणं किल ॥१॥
किच कारादुते नैव मुद्गपक्तिरपीक्ष्यते।
स्थाल्यादिसंनिधानेऽपि ततः कालादसौ मता ॥२॥
कालाभावे च गर्भादि सर्वं स्यादव्यवस्थया। परेष्टहेतुस.दावमात्रादेव तदुन्धवात् ॥३॥।” [शास्त्रवा० इलो° १६५-६८]
“कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः । कालः सुप्तेषु जागति काखो हि दुरतिक्रमः ।।२1। | महाभा०, हारीतसं० ]
जवानी तथा मुँह अदिमें शुरं तथा बालोमे सफेद लनेवाख वृद्धावस्था आदि अवस्थाओकां होना ` भसम्भव हो जायेगा; क्योकि ये सब कालकं प्रतिनियत विभागसे ही सम्बन्ध रखती है । काकुन हो तो यह सब अव्यवस्थित हो जायेगा । परन्तु इनकी अव्यवस्था न तो अनुभवमें ही अतीरहैओरनइष्टहीहै। मृगकी दाका परिपाक भी कालक्रमसेही होता है। यदि काठकं बिना ही परिपाक हो जाय तो बटलोई ईधन आदि सामग्रीकं मिते ही प्रथम क्षणमें ही दाल पक जानी चाहिए 1 पर एेसा तो नहीं देखा जाता अर्थात् मूगकी दालको पकानेके किए १५-२० मिनिर- करा समय तो अपेक्षित होता ही है । इसलिए यह नियम है कि जो-जो कतक अर्थात् कायं है वे सब कालकृत ही हैँ । जिन वस्तुओंकी उत्पत्तिमें दूसरे कारणक व्यापारकी अपेक्षा होती है उन्हं कृतक कहते्है। =
` § २०. कहा भी है--“ईइस संसारमें गर्भाधान बाल्यकाल जवानी आदि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह सब कालकी सक्ञायतासे ही उत्पन्न होता है, कालके बिना नहीं । क्योकि काल एकं समर्थं कारण है ॥१॥ बटरोई इन्धन आदि पाककी सामग्री मिक जानेपर भी जबतक उसमें काक अपनी सहायता नहीं करतां तबतक मृंगशकी दाका परिपाक नहीं देखा जाता अतः यह मानना ही होगा कि मंगकी दालका परिपाक कालने ही किया है ।।२॥ | यदि दूसरोके द्वारा माने गये हेतुक सद्धाव मात्रसे ही कायं हो ओर कालको कारण न माना जाय तो गर्भाधान आदिकी कोई व्यवस्था ही नहीं रहेगी । अर्थात् यदि ऋतुकारुकी कोई अपेक्षा नहीं है तो मात्र स्त्ी-पुरुषके संयोगसे ही गर्भाधान हो जाना चाहिए ॥३॥
. “कार पृथिवी आदि भूतोके परिणमनमे सहायक होता है, कार ही प्रजाका संहार करता है अर्थात् उन एक भवस्थासे दूसरी अवस्थामें ले जाता है । सदा जाग्रत् कार ही सुषुप्तिदशामें भी प्राणिर्योकी रक्ना करता है । अतएव यह् कार दुरतिक्रम है अर्थात् उसका निराकरण अशक्य है 1"
१. -वालदुभादि--क०, १० १,२,म० १,२। २. संहरति १० १, २, भ० १।
0
- का० १. ६ २१] मङ्खलम् । १७
अत्र॒ परेष्टहेतुस-ावसात्रादिति पराभिमतवनितापुरुषसंयोगादिरूपहेतुसङ्ावसात्रादेव तदु-डूवा- दिति गर्भादु-डवप्रसङ्धात् ! तथा कालः पचति--परिपाकं नयति परिणति नयति भूतानि पुथिव्थादीनि ।! तथा कालः संहरते परजाः-पवंपर्यायात्प्रच्याव्य पर्यायान्तरेण प्रजा रोकान्त्था- पयति । तथा कालः सुपु जागति-काल एव सुपर जनमापदो रक्षतीति भावः! तस्माद् हि स्फुटं दुरतिक्रमोऽपाकतुंमशक्यः कार इति । . § २१. “उक्तेनैव प्रकारेण दितीयोऽपि विकल्पो वक्तव्यः, नवरं कालवादिन इति वक्तव्य ईभ्वरवादिन इति वक्तव्यम् । तद्यथा--अस्ति जीवः स्वतो नित्यः ईश्वरतः । ` ईश्वरवादिनश्च सवं जगदीणश्व रकृतं मन्यन्ते । ईश्वरं च सहसिद्धज्ञानवैराग्यधर्मेश्वयंरूपचतुष्टयं श्राणिनां च स्व्गपि वगंयोः
प्रेरकमिति! तदुक्तम्- .
““ज्ञानमभ्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगत्पतेः ।
एेदवर्यं चैव धमंश्च सहसिद्धं चतुष्टयम् ॥१॥"
इन इलोकोमे आये हुए कु विरिष्टं पदोंका अथं-
परेष्टहेतुसद्धावमात्ात् = दूसरोको अभिमत स्त्री-पुरुष सम्भोग मात्रसे ।
तदुदवात् = गभाधान हो जाने से ।
कालः पचति = कार ही पृथिवी आदि भृतोमे परिवतंन कराता है!
कालः संहरते प्रजाः = कारु ही आत्माओंको एक प्यायसे दूसरी पर्यायमें ङे जाता है-उनमें परिणंमन कराता है 1
कालः सुप्तेषु जागति = कार ही सोते हुए प्राणीकी आपत्तियोंसे रक्ता करता हे ।
कालो हि दुरतिक्रमः = अतः कारु अध्य शक्ति हौ उसे कोई नहीं टार सकता ।
$ २१. जिस प्रकार पहला विकल्प कारुवादियोकी अपक्षासे है उसी तरह “अस्ति जीवः स्वतो नित्यः ईव रतः" अर्थात् जीव स्वतः विद्यमान है, नित्य है ओर ईनरके अधीन प्रवृत्ति करता हे' यह् दूसरा विकल्प ईङ्वरवादियोकी अपेक्षासे है । ईदवरवादी इस जगत्को ईदवरकृत मानते ह । वह् ईदवर सहजसिद्ध ज्ञान वैराग्य धर्म ओर एेडवयं इस ॒चतुष्टयका धारक है तथा प्राणियोको स्वगं ओर नरकमें भेजनेवाला ह । कहा भी ठे--
“जगत्पति ईशवरको अप्रतिहत ज्ञान, वैराग्य, धमं तथा. देडवयं रूप चतुष्टय सहज ही प्राप्त है ।९॥ १. “'उवतेर्नव प्रकारेण द्वितीयोऽपि विकल्पो वक्तव्यः, नवर कालवादिन इति वक्तव्ये ईरवरवादिन इति वक्तव्यम् 1 तदथा." नन्दि० मख्य प° २१४ ^. । "'तथाऽन्येऽभिदधते-समस्तमे- तज्जीवादि ईङ्वरासप्रसूतम्' ˆ" - आचा ० श० १।५।१।४ । इुद्धच० ९।६३ । ““अण्णाणी हु अणीसो अप्पा तस्स य सुहं च दुक्खं च । सर्गं णिरयं गमणं सव्वं ईसरकयं होदि ॥'"--गो० कम० गा० ८८० | २. “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" --तैत्ि० २।१।४ । ““विरवतर्चक्षुरुत विइवतो मुखो विश्वतो बाहुरुत विरवतः पात् । संबाहुभ्यां घमति सम्पतत्रर्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥""--इवेता ° ३।३। "“अहुं सवंस्य प्रभवो मत्तः सवं प्रवर्तते ।--गीता ३०।८। “यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईदवरः 1" --गीता १५।१७ । “संज्ञा कमं त्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्खम्"'--बेशे ०२।१।१८ । "ईश्वरः कारणं पुरुष- कर्माफत्यदरनात्"'--न्यायस्° ४।१।२०। ३. श्लोकोऽयं निम्नग्रन्थेष्वपि समुद्धृतः--श्चाखवा० इको १३५ । सूत्र शी० प° २४६। सन्मति० ठी पू० ६९। प्रमाणमीण पृ १२। नन्दि० मर्य० प° २१४। £
षने
१८ षडदशंनसमुच्चये [ का० १. § २३ ~
““्डज्ञो जन्तुरनीरोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ।
ईरवरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्ग “वा इवश्रमेव वा ।।२।।"* [ महाभा० वन० ३०।२१ ] इत्यादि ।
६ २२. तृतीयो विकल्प -आत्मवादिनास् । अत्लवादिनो ` नाम “पुरुष एवेदं सवम्" [ऋग्बेद पुरुषस ०] इत्यादि प्रतिपन्नाः । § २३. चतुर्थो विकल्पो नियतिवादिनाम्" । ते ह्योवमाहुः-नियतिर्नामि तत्वान्तरमस्ति यद्वश्यादेते भावाः सर्वेऽपि नियतेनैव रूपेण प्रादुर्भावमहनुवते, नान्यथा ! तथाहि-पदयदा यतो भवति तत्तदा तत एव नियतेनैव रूपेण भवदुपलमभ्यते, अन्यथा कायेकारणन्यवस्था, प्रतिनिवतरूपग्यवस्था च न भवेत्, निथामकाभावात् ! तत एवं कायंनेयत्यतः प्रतीवमानापेनां निर्यात को नामं प्रसाण- पथकुरलो बाधित क्षमते ।.मा प्रापदन्यत्रापि प्रमाणवथव्याघातप्रसङ्खः । तथा चोक्तम्-
अपने सुख-दुःख भोगके क्षेत्रको खोजनेमें स्वयं असमथं ये बिचारे अज्ञ जन्तु ईङ्वरके द्वारा प्रेरित होकर ही सुखदुःख भोगनेके किए स्वगं तथा नरकमें जाते हैँ ॥२।”
§ २२. तीसरा विकल्प आत्मवादि्योकी अपेक्षासे है । आत्मवादी “इस समस्त जगत्को `
पुरुष रूप ही मानते हँ'" । इनके मतसे जगत् पररुष-ब्रह्मरूप है, अद्रैत है 1 § २३. चौथा विकल्प नियतिवादियोकी दृष्टस है 1 नियतिवादियोंका अभिप्राय है कि
नियति नामका एक स्वतन्त्र तत्त्व है 1 इस नियतिसे ही सभी पदाथं नियत रूपमे उत्पन्न होते हैँ अनियत रूपमे नहीं । नो जिस समय जिससे उत्पन्न होता है वह उस समय उससे नियतसरूपमे ही उत्पत्ति काभ करता है 1 यदि नियत तत्त्व न हौ तो संसारसे कायंकारणकी व्यवस्था तथा पदार्थो के अपने निरिचत स्वरूपकी व्यवस्था ही उठ जायगी । इस तरह जब कार्योको नियत अवस्थाही इस नियतितत्तवके अस्तित्वका सबसे बड़ा साधक प्रमाण विद्यमान है तब कौन प्रामाणिक इस नियतितंत्त्वके अस्तित्वसे इन्कार कर सकता रै 1 यदि प्रतीतिसिद्ध वस्तुका एक जगह लोप किया जाता है तो संसारते प्रमाण मागं ही उठ जायेगा । कहा भी हे--
१. अन्यो जन्तु--आ०, प० १, २; भ० १, २। २. स्वर्ग नरकमेव वा'--पहामा०। ३. ""तथाऽन्ये न्नवते--न जीवादयः पदार्थाः कालादिभ्यः स्वरूपं प्रतिपद्यन्ते कि तहि ? आत्मनः । कः पन- रयमात्मा ? आत्माद्रंतव्रादिनां विरवपरिणतिरूपः । उक्तं च एक एव हि भूतात्मा भते भते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥*“ तथा “पुरुष एवेदं स्वं यद्धतं यच्च भाग्यम्" इत्यादि । --भाचा० शी० १।१।१।४ । बुद्धच० ९६४ । सन्मति टी° छ० ७१४५ नन्द्० मदस्य प्र० २१४ ^ । “वेदवादिनः पुनरित्थं कारणमाहुः-~' पुरुष एवेदं सवम् इत्यतः पुरुषः कारणमाहुः । -सांख्य० माठरण घ्र० ७५ । ““एवक्क्रो चेव महप्पा पुरिसोदेवोय सव्ववावो य । सन्वंगणिगढोविय सचेयणो णिग्गुणो परमो ॥“--गो० क्म° गा० ८८१ । ४. “पुरुष एवेदं यदूमू तं यच्च भन्यम् । यदिदं वर्तमानं जगत् सर्वं तत् पुरुष एव । यच्च.मूतमतीतं जगत् यच्च भग्यं भविष्यज्जगत्तदपि पुरुष एव । यथा अस्मिन् कल्पे वर्तमानाः प्राणिदेहा: सर्वेपि वि राट्पुरुषस्यावयवाः तथेव अतीतागामिनोरपि कल्प- योद्रष्टव्यमित्यमिप्रायः ।"--कऋग्वे° पुरुषक्ु° सायणमा० । इवेताइव० ३।१५ । ५. तथाऽन्ये नियतित एवात्मनः स्वरूपमवधारयन्ति । का पुनरियं नियतिरिति ? उच्यते--पदार्थानामवर्यंतया यद्यथा भवने प्रयोजककर्वी नियतिः । उक्तं च--्राप्तव्यो नियतिबलाश्रयेण"" "`इयं च मत्करिपरित्राण्मता- नुसखारिणो प्राय इति ।""--भाचा० शी० १।३।१।४ | त्था० रमण ४।४।३७४ । सन्मति री घूर ७१४ । नन्दि० मख्य० धृ० २१४८ । नन चतं नियति खोके मदगपक्तिरपीश्ष्यते। तत्स्वभावादि-
भावेऽपि नसिावनियता यतः ॥ अन्यथाऽनियतत्वेन स्वाभावः प्रसज्यते । अन्योऽन्य।त्मकतापत्तेः क्रियाववै- फल्यमेव च ॥'“-- शाखा ० इको ° १ ७५-७& । ““जत्तु जदा जेण जहा जस्स य णियमेण होदि तत्त् तदा। तेणे तहा तस्स हवे इदि वादो णियदिवादोदु ॥ गो० कमण गा० ८८२।
[न ~ ------=--==-
~ का० १. § २४] भङ्घकम् 1 ९९
““नियतेनैव करूपेण सवे भावा भवन्ति यत् । ततो नियतिजा ह्येते तत्स्वरूपानुवेधतः ।९॥ यद्यदेव यतो यावत्तत्तदेव ततस्तथा ।' नियतं जायते न्यायात् क एनां बाधितुं क्षमः ।\२।} | शास््रवा० श्लो० १७२, १७४ | § २४. पञ्चमो विकल्पः स्वभाववादिनाम्ः । स्वभाववादिनो द्येवमाहुः-इह वस्तुनः स्वत एव परिणतिः स्वभावः सें भावाः स्वभाववश्ञादुपजायन्ते । तथाहि-मरदः कुम्भो भवति न पटादिः, तन्तुभ्योऽपि पट उपजायते न घटादिः । एतच्च प्रतिनियतं भवनं न तथास्वभावतामन्तरेण .घटा-
संटङमाटीकते.\ तस्मात्सकलमिदं स्वभावकृतमवसेयम् । तथा चाहुः
च कि संसारके सभी पदाथं अपने-अपने नियत स्वरूपसे उत्पन्न होते हैँ अतः यह् ज्ञान हो जाता है कि ये सब नियतिप्षे उत्पन्न हुए हैँ 1 यह समस्त चराचर जगत् नियतितत्त्वसे गंथा
हआ है उससे तादात्म्यको प्राप्त होकर नियतिमय हो रहा है ।1१॥1
“जिसे जिस समय जिससे जिस रूपमे होना है वह उससे उसी समय उसी रूपमे उत्पन्न होता है। इस तरह अबाधित प्रमाणसे प्रसिद्ध इस नियतिके स्वरूपको कौन बाधा दे सक्ता है ? वह॒ सवतः निर्बधि है" 11२
8 २४. पाचवां विकल्प स्वभाववादियोको अपेक्षासे है 1 स्वभाववादियोका कथन है कि वस्तुओंका स्वतः ही परिणति करनेका स्वभाव है ! सभी पदाथं अपने परिणमनस्वभावके कारण ही उत्पन्न होते हैँ । उदाह रणाथं-मिटरीसे घडा ही ` बनता है कपड़ा नही, सूतसे भी कपड़ा ही उत्पन्न होता है घड़ा नहीं । यह् प्रतिनियत कायंकारणभाव स्वभावके बिना नहीं बन सकता 1
इसलिए यह् समस्त जगत् अपने स्वभावसे ही निष्पन्न है । कहा भी है--
*केचित्स्वभावादिति वर्णयन्ति शुभाशुभं चैव भवाभवी च । स्वाभाविकं स्व॑मिदं च यस्मादतोऽपि मोघो भवति प्रयत्नः ॥ यदिन्दरियाणां नियतः प्रचार: प्रियाप्रियत्वं विषयेष चैव । संयज्यते यज्जरयाति- भिश्च कस्तत्र यत्नो ननु स स्वभावः ॥ यत्पाणिपादोदरपृष्ठमूर्घ्ना निर्वर्तते गर्भगतस्य भावः । यदात्मन- स्तस्य च तेन योगः स्वाभाविकं तत्कथयन्ति तज्ज्ञाः ॥ कः कण्टकानां" बुद्धच० &।५८-६२ । “अपरे स्वभावमाहुः-- स्वभावः कारणमिति । तथाहि-येन शुक्टछीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः। मयूराश्चित्रिता येन स नो वृत्ति विधास्यति ॥*" सास्य ° माठर ० ° ७५ । ““स्व॑हेतुनिराशंसं भावानां
जन्म वण्यते । स्वभाववादिभिस्ते हि नाहुः स्वमपि कारणम् ॥ राजीवकेसरादीनां वैचित्यं कः करोति हि । मयूरचन्द्रकादिर्वा विचित्रः केन निर्मितः ।॥ यथैव कण्टकादीनां तैक्ष्यादिकमहेतुकम् । कादाचित्कतया तदद् दुःखादीनामहेतुता ॥'-- त्रसं का० १०.११२ ! बोधिचर्या० प ० षू ९४१ । “न स्वभा. वातिरेकेण गभंबालशुभादिकम् य॑त्किचिज्जायते लोके तदसौ कारणं किर ॥ स्वंभावाः स्वभावेन स्वस्वभावे तथा तथा । वर्तन्तेऽथ निवत्तन्ते कामचारपराइमुखाः॥ न विनेह स्वभावेन मुद्गपक्तिरपीष्यते। तथा कालादिभावेऽपि नारवमासस्य सा यतः ॥ अतत्स्वभावात्तदधावेऽतिप्रसङ्खोऽनिवारितः। तुल्ये तत्र मृदः कुम्भो न पटादीत्ययुक्तिमत् ।॥ शाखका० इको० १६९-१७२ । ““अपरे पुनः स्वभावादेव संसारन्य- वस्थामभ्युपयन्ति । कः पुनरयं स्वभावः ? स्वत एव तथापरिणतिभावः स्वभावः । उक्तं च-कः कण्टकानां
प्रकरोति" स्वभावतः पवत्तानां निवृत्तानां स्वभावतः । नाहं कर्तेति भूतानां यः पश्यति स परयति । केनाञ्जितानि नयनानि मृगाङ्खनानां कोऽकरंकरोति रुचिरा द्गरुहान् मयूरान् । करचोत्परेषु दलसन्निचयं करोतिःको वा दधाति विनयं कुलजेषु पुंस्सु ॥"--भाचा० शो ० १।१।१।४ । सन्मति
टी० पु ७११। नन्दि० मख्य प०२१४ ^ “को करइ कंटयाणं तिक्खत्तं मियविहगमादीणं । विविहत्तं तु सहामो इदि सव्वं पि य सहाभोत्ति ।॥""--गो० छमे° गा० ८८३ ।
२० षड्दर्शानसमुच्चये [ का० १. ६ २९ -
“कः कण्टकानां प्रकरोति तैक्ष्ण्यं, विचिक्रभावं मृगपक्षिणां च । स्वभावतः सव॑मिदं प्रवृत्तं न 'कामचारोऽस्ति कुतः प्रयत्नः ॥१।1"' [ बुद्धच० ९।६२ | “बदर्याः कण्टकस्तीक्ष्ण ऋजुरेकर्च कुञ्चितः । फरं च वतुं तस्या वद केन विनिमितम् ।1२॥1'' [ लोकतत्त्व° २।२२ ] इत्यादि ।
§ २५. अपि च, आस्तामन्धत्कायंजातमिह .मुदृगपक्तिरपि न स्वभावमन्तरेण भवितुमर्हति । तथाहि-स्थाटीन्धनकालादिसामम्रीसंभवेऽपि न -ककटुकमुद्गानां पक्तिरूपलभ्यते, तस्माद्यद्यम्डूावे भवति तत्तदन्वथग्पतिरेकानुविघधायि तत्करृतमिति स्वभावकरता मुद्गपक्तिरप्येष्टव्या । ततः सकल- मेवेदं वस्तुजातं स्वभा वहेतुकमवसेयमिति ।
६ २६. तदेवं उ स्वत ॒ इति पदेन कुन्धाः पञ्च विकल्पाः । एवं च परतः इत्यनेनापि पच्च
“यह् सारा संसार स्वभावसे ही अपनी सारी प्रवृत्ति कर रहा है, इसमें किसीकी इच्छा या प्रयत्का कोई हस्तक्षेप नहीं है । बताओ--करटमे तीक्ष्णता-नुकीकापन किसने पैदा किया, किसने उन काटिंको धिसकर पेना किया होगा ? हरिण तथा पकियोके विचित्र स्वभाव किसने किये । पक्लियोके अनेक रंगके पर उनको मधुर कूजन, हिरणकी सुन्दर अखे ,उसका छलगिं भरकर कूदना-फाँदना ये सब स्वभावसे ही ह ।१॥।
विचार करके बताइए कि-बेरके अत्यन्त नुकीले कु सीघे ओौर कुछ तिरछे काटि किसने पैदा किये ? फिर उसका अत्यन्त स्वादु ओौर गोर फर किसने बनाया ? तात्पर्यं यहू- सब स्वभावकी ही लोका है २1“ इत्यादि ।
$ २५. अन्य कार्योकी बात तो जनि दो, मूंगको दालका पाक भी स्वभावके बिना नहीं हो सकता । बटलोरई, ईधन, समय आदि सभी सामग्री उपस्थित है, पर ककड -मूंगका पाक नहीं होता । इससे स्पष्ट मालूम होता है कि जिसमें पकनेका स्वभाव है वही पक सकता है अन्य नहीं । इस तरह स्वभावके साथ अन्वय-व्यतिरेक होनेसे समस्त कायं स्वभावकृत ही समन्चना चाहिए । मूगका पाक भी स्वभावकृत ही है ।
१ २६. इस तरह स्वतः' पदके कारु नियति आदि पांच विकल्प होते हैँ 1 आत्मा परतः" पदके भी इसी तरह पांच विकल्प होते हैँ । आत्मा परतः-परसे व्यावृत्त है, अर्थात् आत्मा स्वरूपसे
१. “ कामकारोऽस्ति" बुद्धच० । उद्धृतोऽयम्-खोकत० २।२१। भाचा० शी० १।१।१।४ । सन्मतिर टी पू० ७१२ शाखवार य्ञो०. ० ८३ ^ । २. ककदुक-क०, भ०२। ३. “तत एवं स्वत इति पदेन लब्धाः पञ्च विकल्पाः । एवं परत इत्यनेनापि पञ्च कम्यन्ते । परत इति-परेभ्यो ग्यावृत्तेन रूपेण विद्यते खल्वयमात्मेत्यथं: । एवं नित्यत्वापरित्यागेन दश्च विकल्पा कुब्धाः एवमनित्य- पदेनापि दश, सर्वे मिलिता विशतिः । एते च जीवपदार्थन लब्धाः । एवमजी वादिष्वष्टसु पदार्थेषु प्रत्येकं विदातिधिशतिधिकल्पा लभ्यन्ते, ततो विशतिर्नवगुणिताः शतमशीय्युत्तरं क्रियावादिनां भवति ।*-- नन्दि मङूय० प° २१४७३ । ४. ““तृतीयविकल्पे,तु परत एवास्तित्वमम्युपगम्यते, कथं पुनः परतोऽस्तित्व- मात्मनोऽभ्भुपेयते ? नन्वेतत् प्रसिद्धमेव सर्वपदार्थानां परपदार्थस्वल्पापेक्षया स्वल्पपरिच्छेदः यथा दीर्घ- त्वापेक्षया हस्वत्वपरिच्छेदो ह्स्वत्वपिक्षया च दीघंत्वस्येति । एवमेव च अनात्मनः स्तम्भकरुम्भादीन् समीक्ष्य तद्न्यतिरिक्ते वस्तुनि आत्मबुद्धिः प्रवर्तते इति, अतो यदात्मनः स्वरूपं तत् परत एवावधायते न स्वत इति ।'“--भाचा० शी० १।१।१।४।
0
का० १. & २७ 1 मङ्धरखस् । २१
लभ्यन्ते ! परत इति परेभ्यो व्यावुत्तेन रूपेणात्मा विद्यते । . यतः प्रसिद्धमेतत्-सवंपदार्थानां पर- पदारथंस्वरूपपेक्षया स्वरूपपरिच्छेदो यथा दोघंत्वाद्ययेक्षया हस्वत्वादिपरिच्छेदः, एवमात्मनि स्तस्भादीन्समीक्ष्य तदृन्पतिरिक्तबुद्धिः° प्रवतंते ।! अतो यदात्मनः स्वरूपं तत्परत एवावधायेते न स्वत इति \ एवं नित्थत्वापरित्यागेन दश विकल्पा लब्धाः । एवमनित्यपदेनापि, सर्वेऽपि भिकिता विशतिः ! एते च जीवपदार्थेन छब्धाः । एवमजीवादिष्वष्टसु पदार्थेषु प्रत्येकं विशतिविहतिविकल्पा लभ्यन्ते । ततो विशतिनंवगुणिता शतमशीत्युत्तरं क्रियावादिनां भवति ।
६ २७. तथा न॒ कस्यचित्प्रतिक्षणमवस्थितस्य पदार्थस्य क्रिथा संभवति उत्यस्यनन्तरभेव विनाज्ञादित्येवं ये वदन्ति ते अक्रियावादिनः आत्मादिनास्तित्ववादिन इत्यथः । ते च -कोक्रल- काण्ठेविद्विरोमकयुगतप्रमुखाः । तथा चाहुरेके-
“शक्षणिकाः सवेसंस्कारा अस्थिराणां कुतः क्रिया । भूतिये(्यीषां क्रिया सैव कारणं सेव चोच्यते ।॥।१॥।"
है पररूपसे नहीं । यह तो प्रसिद्ध ही है कि समी पदाथकि स्वरूपका निश्चय परपदार्थकी व्यावृत्ति
करके ही होता है । जैसे दोघंत्वादि-लम्बाई आदिकी अपेक्षासे हस्वत्वादि-चृटाई आदिका स्वरूप निरिचित होता है । उसी तरह सभी पदाथोकि स्वरूपका निर्णय पररूपके निरचयकी अपेक्षा रता है 1 इसी तरह स्तम्भादि जड पदार्थोकी समीक्षा करनेके अनन्तर ही आत्मामं स्तम्भादिसे भेद- बुद्धि होती है । अतः आत्माके स्वरूपका निर्चय परषदाथके निरूपण करनेके बाद उससे व्यावृत्त सुद्धि होनेपर ही होता है 1 परपदाथंसे बिकुल निरपेक्ष होकर किसी भी वस्तुका मात्र स्वतः ही निणंय करना असम्भव है । इस तरह नित्य पदके 'स्वतः ओर परतः इन दो भंगोको कार आदि पाँचोके साथ गुणा करनेपर दस विकल्प होते ह । इसी तरह अनित्यः पदके भी दस भेद समञ्च लेने चाहिए 1 जिस प्रकार ये बीस विकल्प जीव पदाथंके होते हँ उसी तरह अजीव आदि अन्य- आठ पदा्थोकि भौ बीस-बीस ही विकल्प होते हैँ । इस प्रकार बीस विकल्पोको नव पदा्थेसि गुणा करनेपर क्रियावादियोके १८० भेद हो जाते हैँ ।
§ २७. अक्रियावादी क्रिया अर्थात् अस्तित्वका सर्वथा उच्छेद करते हैँ । उनका कहना है
कि सभो पदाथं क्षणिक हँ । किसी भी क्षणिक पदाथंकी दूसरे क्षणतक सत्ता नहीं रहती अतः उसमें
क्रियाकी सम्भावना ही नहीं है 1 अौर इसीक्ए आत्मा आदि नित्य पदार्थोका अस्तित्व नहीं है । कोक्रुर काण्ठेवि द्विरोमक सुगत आदि प्रमुख अक्रियावादी है! इन्हीमे-से किसीने कहा भी है कि- “सभी संस्कार क्षणिक हैँ । अस्थिर पदार्थोमिं क्रिया कैसे हो. सकती है ? अतः इन पदार्थो
१. -रिक्तं बुद्धिः प० १,२, भ० १, २1 २. “'तथा नास्त्येव जीवादिकः पदाथं इत्येवं वादिनः
भक्रियावादिनः ।* -- सूत्र ° शी० १।१२। भचा० शी १।१।१।४॥। ““जक्रियां क्रियाया अभावम्, न हि कस्यचिदप्यनवस्थितस्य पदाथंस्य क्रिया समस्ति तद्धावे च अनवस्थितेरभावादित्येवं ये वदन्ति ते सक्रियावादिनः । तथा चाहूुरेके क्षणिकाः सवंसंस्कारा `" "““““ ।' इत्यादि । भन्ये त्वाहुः-अक्रियावादिनो येन्रुवते कि क्रियया, चित्तशुद्धिरेव कार्या, ते च बौद्धा इति । अन्ये तु व्याख्यान्ति-अक्रियां जीवादि- पदार्थो नास्तीत्यादिकां वदितुं शीलं येषां ते अक्रियावादिनः 1" --मग० अम० ३८।१ । “--अक्रिया-
वादिनो नास्तिका इत्यथंः--स्थाञ अम० ४।४।३४७५ । नन्दि० मख्य० पऽ २१५५ । ३. "'मरीचि- कूमारकपिलोलकगाग्यग्याघ्रमूतिवाद्लिमाठरमौद्गलायनादीनामक्रियावाददष्टीनां चतुरशीतिः ।"- राज्ञवा० पएरू०५१। ४. उद्धृतोऽयम्--“क्षणिकाः'" ˆ“ ““"भूति्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ॥" --बोधिचर्या० पं० प्र० ३७६ । ““तत्रेदमुक्तं भगवता-क्षणिकाः “““भूतियेषां क्रिया सैव कारकं सैव*"" -तस्वसं० पं० प° ११॥। (भूतिर्येषां क्रिया सेव कारक सैव" “-नन्दि० मल्य०पू० २१५८ अगण० भमनण०्२०।१।
२२ षडदरांनसमुच्चेये [ का० १. ६२८ -
§ २८. एतेषां चतुर्ीति्भंवति ! सा चासुनोपायेन द्रष्टव्या- पुण्यापुण्यर्वजितरेषजीवाजी- कादिपदार्थसप्रकन्यासः, तस्य चाधः प्रत्येकं स्वपरविकल्पोपादानम्, असत्त्वादात्मनो नित्यानित्य विकल्पौ न स्तः, कालादीनां पच्चानामघस्तात्षष्ठी यदृच्छा न्यस्यते 1 इह यदृच्छावादिनः सर्वेऽप्य- क्रिधावादिनस्ततः पराग्यद्च्छा नोपन्यस्ता । ततः एवं विकल्पाभिकापः-“नास्ति जीवः स्वतः कालतः" इत्येको विकल्पः 1 अयं भावः-इह पदार्थानां लक्षणतः सत्ता निश्चीयते कायंतो वा । न चात्मनस्ता- द्गस्ति लक्षणं येन तत्तत्तां प्रतिपद्येमहि । नापि कायंमणनामिव महीध्रादि संभवति, अतो
की भूति अर्थात् उत्पत्ति या एक क्षण स्थाथिनी सत्ता ही क्रिया है ओर इसी भूतिको ही कारण या कारक कहते हँ ।" ` § २८. इनके चौरासी भेद इस प्रकार होते है--पुण्य ओर पापको छोडकर जीवादि सात पदार्थोको स्व ओर पर इनं दोसे तथा कार् ईदवर आत्मा नियति स्वभाव ओर यदुच्छा इनं छहसे गुणा.करनेपर चौरासी भेद हो जाते हँ । अक्रियावादी आत्मा आदि नित्य पदार्थोका असत्त्व मानते हैँ अतः इनमे नित्य ओर अनित्य ये दो विकल्प नहीं होते दँ । जितने यदुच्छावादी हवे सब. अक्रियावादी हैँ अतः क्रियावादियोकी भेद गणना यदुच्छा विकल्पको नहीं गिनाया है । अक्रियावादियोंका प्रथम विकल्प “नास्ति जीवः स्वतः कालतः" अर्थात् जीव स्वतः नहीं है काकी दृष्टिसि' इस प्रकारका होता है । इसका तायं यह है कि--पदार्थोकौी सत्ताका निश्चय यातो लक्षण अर्थात् असाधारण स्वरूपसे होता है या फिर उसका कायं देखकर 1 परन्तु आत्माका कोई भी एेसा असाधारण लक्षण नहीं है जिससे उसकी सत्ता साधी जा सके 1 जगतूमें पवंत आदि स्थूल कार्योको देखकर उनके उत्पादक सूक्ष्म परमाणुरूप जगते कारणोका अनुमान किया जाता है; पर
१. “तेषामपि जीवाजीवाखवबन्वसंवरनिजंरामोक्षाख्याः सप्तपदार्थाः स्वपरमेदद्येन तथा काल्यदुच्छा- नियतिस्वभावेशवरात्मरभिः षडभिदिचन्त्यमानाश्चतुरशीति विकल्पा भवन्ति । तद्यथा-"नास्ति जीवः स्वतः काकतः, नास्ति जीवः परतः कारतः" इति काकेन द्रौ न्यौ । एवं यदृच्छानियत्यादिष्वपि द्वौ दरौ मेदौ प्रत्येकं मवतः, सर्वेऽपि जीवपदार्थे-दवादश्च भवन्ति, एवमजीवादिषु प्रत्येकं द्वादश एते सद्वादशकाः चतुर-
शीतिरिति।“--भआाचा० शौ० १।१।१।४ । सूत्र श्ची० १।१द् । नन्दि० मख्य० ० २१५९. | स्था० भम० ४।४।३४५ । “णत्थि सदो परदो वि य सत्त पयत्था य पुण्णपाङऊणा । कालादियादिभंगा सत्तरि चदुपंति संजादा ॥ णत्थि य सत्तपदत्था णियदीदो कालदो तिपंतिभवा । चोद्स इदि णत्थित्ते अकिकरि- याणं च चुलसीदी ॥”--गो० कमं° गा० ७८४-८४ । ` २. ““अयमत्राथंः-- नास्ति जीवः स्वतः कालत इति । इह पदार्थानां लक्षणेन सत्ता निश्चीयते कार्यतो वा । न चात्मनस्तारगन्ति किचिल्लक्षणं येन सत्तां प्रतिपचेमहि । नापि कार्यमणूनामिव महीध्रादिसंभवति । यच्च लक्षणकार्याभ्यां नाभिगम्यते वस्तु तन्नास्त्येव वियदिन्दीवरवत्, तस्मान्नास्त्यात्मेति । दितीयविकल्पोऽपि-यच्च स्वतो नात्मानं बिभर्ति गगनारविन्दादिकं तत् परतोऽपि नास्त्येव । अथवा स्वेपदार्थानापरेव परभागादर्शनात् सर्वा्वग्भाग- सक्ष्मत्वाच्चोभयानुपलन्धेः सर्वानुपरन्धितो नास्तित्वमघ्यवसीयते । उक्तं च-“यावद् दृश्यं परस्तावद्दधागः स च न दश्यते ।' इत्यादि । तथा यदृच्छातोऽपि नास्तित्वमात्मनः । का पुनयंदुच्छा ? अनभिसंधि पूविका अर्थप्रात्ति्य॑दुच्छां । “अत्तकितोपस्थितमेव †""""^““ ““वुथामिमानः ॥ सत्यं पिशाचाः स्म॒ वने वसामो भेरि कराग्रैरपि न स्पुशामः। यदृच्छया सिद्धयति लोकयात्रा भेरीं पिशाचाः परिताडयन्ति ।॥ यथा काकतालीयमनबुद्धिपूर्वकम्, न काकस्य बुद्धिरस्ति मयि तारं पतिष्यति, नापि तालस्याभिगप्रायः काकोपरि पतिष्यामि, अथ च तत्तथैव भवति । एवमन्यदपि अतकितोपनतमजाकृपाणी यमातुरभेषजी यमन्धकण्टकीय- मित्यादि द्रष्टग्यम् । एवं जातिजरामरणादिकं लोके यादुच्छिकं काकतालोयादिकल्पमवसेयमिति ।'"- भभाचा० शी० १।।१।४।
~~ का० १..६ २९ ] मङ्धलम् 1 २३
नास्त्यात्मेति ! एवसमीश्वरादिवादिभिरपि यद्च्छापयेन्तेविकल्पा वाच्याः 1 स्सर्वेऽपि मिलिताः षडविकल्पाः \ असीषां च विकल्पानामथंः प्राग्व -डार्वनीयः।
६ २९. नवरं यद्च्छात इति यदृच्छावादिनां मते यद्च्छा ह्यनभिसंधिपुविकाथंप्रापिः । अथ के ते यदुच्छावादिनः ? उच्यते-इह ये भावानां संतानापेक्षया न प्रतिनियतं कायंकारणभाव- मिच्छन्ति कितु यदृच्छया ते यदृच्छावादिनः। ते दयेवमाहुः-न खद परतिनियतो वस्तुनां कायं- कारणभावस्तथा प्रमाणेनाग्रहणात् ! तथाहि-लाल्कादपि जायते शार्को गोमयादपि जायते शार्कः । वह्वंरपि जायते वद्िररणिकाष्ठएदपि \ धुमादपि जायते धूमोऽग्नीन्धनसस्पकदिपि । कन्दादपि जायते कदली बीजादपि । वटादयो बोजादुपजायन्ते शाखेकदेशादपि । गोधमबोजादपि जायन्ते गोधूमा वंशजीजादपि ! ततो न व्रतिनियतः कचिदपि कायंकारणभाव इति । यद्च्छातः
कर्चित्कचिड्वतीति प्रतिपत्तव्यम् ! न खल्वन्यथा वस्तुस्षदावं परयन्तोऽन्यथात्मानं प्रेक्षावन्तः परिक्लेरायन्ति ! यदुक्तम्--
आत्माका कोद भौ स्थूर कायं हमारे दृष्टिगोचर नहीं होता जिससे उसका अनुमान किया जाय ।
इस तरह प्रत्यक्ष ओर अनरुमानका विषय न होनेके कारण आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता अतः आत्मा नहीं है । इसी तरह ईइवर आदि यदृच्छा पयंन्त विकल्पोकी अपेक्नासे नास्तिकी मीमांसा
कर लेनी चाहिए । इन कार आदि छो विकल्पोमे कालादि पांचका अथं तो पहकेकी तरह ही समञ्ना चाहिए ।
§ २९. 'यदृच्छा' विकल्पका अथं इस प्रकार है--यदृच्छावादियोके मतानुसार यद्च्छाका अथं है-बिना संकल्पके ही अथकी प्राप्ति होना, या जिसका विचार ही नहीं किया उसकी अतकित उपस्थिति होना । यदृच्छावादी पदार्थोमिं सन्तानकी अपक्षासे निचित का्यंकारणभाव नही मानते । उनका कहना है कि_ पदार्थोमिं कोई नियत का्यंकारणभाव नहीं है किन्तु यदुच्छासे अर्थात् जो कोई भी पदाथं जिस किसीसे भी उत्पन्न हो जातादहै। वे कहते हैँ कि पदा्थोकि प्रतिनियत कायंकारणभावका किसी भी प्रमाणसे ग्रहण नीं होता, अतः प्रतिनियत कार्यकारणभाव काल्पनिक ही है प्रामाणिक नहीं है । देख्यो, कमलकन्दसे भी कमरकन्द उत्पन्न होता है ओर गोबरसे भी कमरुकन्दकी उत्पत्ति देखी जाती है । एक जगह अग्निकी उत्पत्ति अग्निसे देखते हैँ तो दूसरी जगह अरणिके मन्थनसे भी अग्निक उत्पत्ति प्रत्यक्ष सिद्ध है! एक जगह अग्निओौर ईधनके सम्पकंसे यदि धूमका उत्पाद होता है तो दूसरी जगह धूमसे भी धूमकी पेदाइर दृष्टिगोचर
होती है । केला कन्दसे भी उत्पन्न होता है ओर बीजसे भी । बट आदि वृक्ष बीजसे भी उत्पन्न
होते है ओर डाली काटकर उसकी करम रगानेपर भी उनको उत्पत्ति देखी जाती है । एक जगह हके बीजसे गेहंका अकर निकलता है तो दूसरी जगह् बाँसके बीजसे भी गेहुंका अकर रह्कहाता हुआ निकल आता है 1 इस तरह ध्यानसे देखा जाये तो पदार्थोमिं कहीं भी निरिचत कायंकारण- भाव नहीं है 1 यदृच्छासे जो कोई जिस किसी भी पदार्थ॑से उत्पन्न हौ जाता है 1 जब वस्तुओंका स्वरूप ही यादुच्छिक-अनियत है तब उसको प्रतिनियत कायंकारणभावके शिकजेमे क्यों कसा
जाये ? कोई भी बुद्धिमान् क्यों इस अप्रामाणिक का्यंके सिद्ध करनेमें अपनी बुद्धिको क्लेश देगा ? कटा भो है-
[1
१. सवे मिलिताः प० १,२,भ०१, २। २, नन्दि मलखय० धृ° २१५८ । ३, कन्दली क०, १० १, २; भ०१,२।
४ षड्दर्दोनसमुच्चये [ का० १, 9३१९
“अतकितोपस्थितमेव सर्वं चित्रं जनानां सुखदुःखजातम् । काकस्य तालेन यथामिघातो न बुद्धिपूर्वोऽस्ति वृथाभिमानः ।।१।1"' [ आाचा० २।१।१।१।४ ] इत्यादि | ६ ३०. ष्दृष्टमेव सवं जातिजरामरणादिकं लोके -काकतारीयाभमिति । तथा च स्वतः बडिवकल्पा छन्धास्तथा नास्ति परतः कालत इत्येवमपि षडिवकल्पा कभ्यन्ते । सर्वेऽपि भिकलिता द्वादश विकल्पा जीवपदेनं कन्धाः । एवमजीवादिष्वपि षटसु पदार्थेषु प्रत्येक दादशद्रादश् विकल्पा लभ्यन्ते । ततो दादशभिः सप्र गुणिताश्चतुरशीतिभंवन्त्यक्रियावादिनां विकल्पाः । § ३१. तथा कुत्सितं ज्ञानमज्ञानं तदेषामस्तीत्यज्ञानिकाः । “अतोऽनेकस्वरात्“ [ हैम° ७1२ ] इति मत्वर्थीय इकप्रत्यथः । अथवाऽज्ञानेन चरन्तीत्यन्नानिकाः, असंचिन्त्यक्रतकमंबन्ध- वैफल्यादिप्रतिषत्तिलक्षणाः “्ाकल्यसात्यमूग्रिमोदपिप्पलादजादरायणजेमिनिवयुप्रभृतयः । ते ह्येवं
“जिस प्रकार काकतारीय' न्यायमें तालवृक्षसे गिरते हुए तारुफलसे जुडते हए कौवेकी टक्कर अकस्मात् बिना विचारे ही होती दहै, उसी तरह इस संसारमे सभी प्राणियोको नाना प्रकारके सुख-दुःख अतकरितोपस्थित-बिना विचारे ही अपने अआपदहीहो जाते हैँ । सुख-दुःखकी उत्पत्तिमे ` किसीका भी बुद्धिपुवंक व्यापार नहीं होता। अतः इस याद्च्छिक जगतूमें “अहं करोमि-्म करता ह यह् अहंकार करना व्यथं है ! कोई किसीका कु भी नहीं करता, सब यों ही होता रहता है
8 ३०. संसारी प्राणियोंकी उत्पत्ति बुढापा तथा मरण आदि सभी काकताटीय न्यायसे अचानक-भूवंसूचनाके बिना ही होते है, यह् तो सबके अनुभवकी ही बात है । इस तरह स्वतः" की अपेक्षा छह मेद हृए । नास्ति परतः कालतः-परतः नहीं है कालको अपेक्षासे' इस तरह 'परतः'की अपेक्षा भी छह भंग समक्षना चाहिए । जिस प्रकार जीवके ये १२ मेद स्वतः परतः"को अपेक्षा होते हैँ उसी तरह अजीवादि छहके भी बारहू-वारह् विकल्प समञ्लना चाहिए । इस प्रकार
सातो जीवादि पदार्थोका बारह विकल्पोंसे गुणा करनेपर (७८ १२ ) अक्रियावादियोके चौरासी `
मेद हो जाते हँ ।
§ ३१. खोटे ज्ञानको अज्ञान कहते है, खोटे ज्ञानवालरे अन्ञानिक-अज्ञानवादी हैँ 1 अज्ञानशब्द- |
से 'अतोऽनेकस्वरात्' सूत्रसे मत्वर्थीय इक् प्रत्यय करनेपर अज्ञानिक शब्द सिद्ध होता है। अथवा अज्ञानपुवंक जिनका आचरण-व्यवहार है उन्हे अज्ञानिक कट्ते हैँ । इनका सिद्धान्त है कि-बिना विचारे अज्ञानपुवंक किया-गया कमेबन्ध विफल हो जाता है, वह् दारुण दुःख नहीं देता 1 इत्यादि हाकल्य, सात्यमु्रि, मौद, पिप्पलाद, बादरायण, जैमिनि तथा वसु आदि प्रमुख अज्ञानवादी
[शि 1
१. दृष्ट-आ० । २. -तारीयाम्यामिति क° ।-तालीयाभाविति प० १, २। ३. “"हिताहितपरीक्ना- वरिरदोऽज्ञानिनत्वम्""--सर्वाथसि° ८।१। “(तथा न ज्ञानमज्ञानं तद्वियते येषां तेऽज्ञानिनः, ते ह्यज्ञान- मेव श्रेय इत्येवं वदन्ति ।*"--सुत्र० शी० ¶१।१२ । स्था० अम० ४।४।३४५ । "कुत्सितं ज्ञानमज्ञानं तद्येषामस्ति ते अज्ञानिकाः ते च वादिनर्चेत्यज्ञानिकवादिनः। ते चाज्ञानमेव श्रयः, असच्नचिन्त्यक्ृत- कर्मबन्धरवैफल्यात्, तथा न ज्ञानं कस्यापि क्वचिदपि वस्तुन्यस्ति प्रमाणानामखंपूणंवस्तुविषयत्वादित्या- दयम्युपगमवन्तः ।"--मग० अम० ३०।१ । अथवा अज्ञानेन चरन्तीति अन्ञानिकाः असञ्जचिन्धयक्ृत- बन्धवैफल्यादिप्रतिपत्तिलक्षणाः । तथाहि ते एवमाहुः-न ज्ञानं धेयः“ --नन्दि० मङ्य० घु० २१५४६ । ४. ततोऽनेक-आ०, कण०, प०१, २,भ० १। ५. श्लाक्ल्यवाल्कलकुथुमिसात्यमुद्रि- नारायणकण्ठमाध्यन्दिनमौदपैप्पलादबादरायणाम्बष्टोकृदौरिकायनवसुजैमिन्यादीनामनज्ञानकु दृष्टीनां सप्तषषष्टिः।'"
--राजवा० ए्र० ५१।
का० १. ६३२1 अज्ञानवादः। २९५
ब्रवते-न ज्ञानं श्रेयः, तस्मिन् सति विरुढप्ररूपणायां विवादयोगतधित्तकार्ष्यादिभावतो दीघेतर- संसारप्रवृत्तेः \! यदा पुनरज्ञानमाश्रीयते तदा नाहुंकारसंभवो नापि परस्योपरि चित्तकाटृष्यभावः, ततो न बन्धसंभवः । अपि च, यः संचिन्त्य क्रियते कमंबन्धः, स गरुणविपाकोऽत एवावष्यं* वेयः, तस्य ॒तीव्राध्यवसायतो निष्पन्नत्वात् ! यस्तु मनोव्यापारमन्तरेण कायवाक्कमंप्रवत्तिमात्रतो विधीयते, न तत्र मनसोऽभिनिवेश्ञस्ततो नासाववहयं वेद्यो नापि तस्य दारुणो विपाकः 1 केवल- मतिडुष्कसुधापङ्कधवक्ितभित्तिगतरजोमल इव सः कमंसंगः स्वत ॒एव श्ुभाध्यवसायपवनविक्षो- भितोऽपयाति । मनसोऽभिनिवेशाभावश्चाज्ञानाभ्युपगमे समुपजायते, ज्ञाने सत्यभिनिवेज्ञसंभवात् । तस्मादन्ञानमेव सुमृक्षुणा मुक्तिपथप्रवृत्तेनाभ्युपगन्तव्यं न ज्ञानमिति ।
§ ३२. अन्यच्च, भवेदयक्तो ज्ञानस्याभ्युपगमः, यदि ज्ञानस्य निश्चयः कतु “पार्येत \ यावता स एव न पायेतेः \ तथाहि-सवेंऽपि दशंनिनः परस्परं भिन्नमेव ज्ञानं प्रतिपन्नाः, ततो न निश्चयः कतु शक्यते किमिदं सम्यगुतेदम्' इति! अथ यत्सकलवस्तुस्तोमसा्षात्कारिभगवदधंमानोपदेशा-
(1 १
रहे हँ 1 इनका कथन दै कि ज्ञान कल्याणकारी नहीं है 1 यह् ज्ञान ही तमाम वितण्डाबादोकीसुष्टि
करतादहै) इसज्ञानषे हौ एकर वादी दूसरेके विरुद्ध तत्तव प्ररूपण करके विवादका अखाडा बनाता है 1 वादविवादसे चित्तम कटृषता आदि दोष होते हँ ओर उससे दीघं संसारमे भ्रमण होता है। जब इस अनथंमूर ज्ञानको छोड़कर अज्ञानका आश्रय लेते हैँ तब मेरा यह सिद्धान्त है, मै तुम्हारा ` खण्डन करूगा' इत्यादि ज्ञानमूलक अहंकार कभी उत्पन्न ही नहीं हो सकता 1 ओर अहंकार न होनेसे दूसरेके ऊपर कटुषता न हो सकेगी । इस तरह चित्तमें काटष्यके न होनेसे कर्मबन्धकी कभी भी सम्भावना ही नहीं है। इसी तरह्, जो कायं विचार कर जान-बृञ्चकर किये जाते हँ उनसे दारुण फ देनेवाला कमवन्ध होता है, ओर उस कर्मंबन्धका कठोर फर अवदय ही भुगतना पड़ता है 1 तीव्र अध्यवसायसे अर्थात् बुद्धिपूर्वकं होनेवाले कषायावेशसे जो कम॑बन्ध होता है वहु अकाटथ होता है, उसका फल भोगना ही पडता है, इस कमंकी गति टारे नाँहि टर 1 किन्तु जो कमं मनके अभिप्रायके बिना ही केवर वचन ओर कायकी प्रवृत्तिमात्रसे उपाजित किये जाते है, उनमें चित्तका
तीत्राभिनिवेद-अत्यन्त कषायवृत्ति न होनेसे उनका फल भी अवश्य ही नहीं भुगतना पडता, ये
फल दिये विना भी जड़ सकते हँ ओर यदि इसने फल भी दिया तो इनका दारुण फल नहीं होता
अज्ञानपूवंक होनेवाखा क्मवन्ध तो जिस दीवारुपर पोता गया चूना खूब सूख गया है उस दौष्क भित्तिपरआयी हुई धूलके समान है, जो थोडी-सी भी शुभ-अध्यवसाय रूप हवाके चलनेसे अपने ही आप क्चड जाती है ।' मनमें रागद्रेषादि रूप अभिनिवेश उत्पन्न न होने देनेका सबसे सरू उपाय है ज्ञानपूवंक .व्यापारको छोऽ-९ --गनमें ही सन्तोष करना । क्योकि जबतक ज्ञान रहेगा तबतक वह् कुछ-न-कुछ रागद्रेषादिरूप उत्पः ‹ करता रहेगा, वह॒ कभी शान्त ॒रहनेवाला नहीं है । अतः मोक्षके अभिलाषी मोक्न मागमे लगे हुए सुमुक्षुको अज्ञान ही साधक हो सकता है, ज्ञान नहीं ।
8 ३२. दूसरी बात यह् है किं ज्ञान तो तब उपादेय कहा जा सकता है जब ज्ञानके स्वरूप- का ठीक-टीक निश्चय हो जाये । पर संसारमें अनेकों मत-मतान्तर है ओर जब सभी अपने तत्तव- ज्ञानको सच्चा कहते हँ तब कौन सच्चा है ? यही जानना सबसे कठिन कायं क्या, असम्भव ही है । सभी दशंनवारे जब अपनी-अपनी ढाई चावरकी खिचड़ी अलग-अलग पकम रहे ह, अपने-अपने सिद्धान्तोमें सत्यताकी दुहाई देते है, तब यह सच्चा कि यहु" यही विवेक करना कठिन हो रहा
है । जैन लोग जव यह् कहते है कि--'समस्त वस्तुओंका हस्तामरलकवत् साक्नात्कार करनेवाले
१.-वरयवेद्ययः कण, प० १, २, म० १, २।२. -वश्यवे-भ० २) ३. सकलसंगः भ० २। ४. -मिति च -भ० २ ५. पायते क०। ६. पार्यत आ० । ७. उत नेदमिति भण०२। ४
२६ षड्दशंनसमुच्चये [ का० १.३ ३३ ~
दृषज्त्रयतेः ज्ञानं तत् सम्यग्, नेतरत्, असवंज्ञमुकत्वादिति चेत्; सत्यमेतत्; कि तु स एव सकल- चस्तुस्तोमसाक्ात्कारी, न तु सौगतादिसंमतः सुगतादिरिति कथं प्रतीयते, तद्ग्राहकप्रमाणाभावा- दिति तदवस्थः संशयः । ननु यस्य दिवः समागत्य देवाः पूजादिकं कृतवन्तः, स एव वधंमानः स्वंज्ञः, न हेषा: सुगतादय इति चेत्; न; वधंमानस्थ चिरातीतत्वेनेदानीं तद्धावम्राहकप्रमाणा- भावात् \! संप्रदायादवसीयत इति चेत् । ननु सोऽपि संप्रदायो धृतंपुरुषप्र्वतितः, कि वा सत्यपुरुष- प्र्वतित इति कथमवगन्तव्यम्, प्रमाणाभावात् 1 न चाप्रमाणकः वयं प्रतिपत्तु क्षमाः । मा प्रापदति- प्रसद्धुः । अन्यच्च, मायाविनः स्वयमस्वंज्ञा अपि जगति स्वस्य सवं्ञभावं प्रचिकटयिषवस्तथा- विघेन्रजाल्वश्ाहशंयन्ति देवानितस्ततः संचरतः स्वस्य पूजादिकं कुवंतः, ततो देवाऽऽगसमदशेनादपि कथं तस्य सव्॑ञत्वनिश्चयः । तथा चाह जैन एव स्तुतिकारः समन्तभद्रः-
'देवाऽऽगम-नभोयान-चामरादिविभूतयः । मायाविष्वपि दृश्यन्ते नातस्त्वमसि नो महान् ।१।।'' [ आप्तमी° १।१ ]
§ ३३. भवतु वा वधंमानस्वामी सवंज्ञः । तथापि "तस्य सत्कोऽयमाचाराङ्खादिक उपदेशा
भगवान् वधंमानके उपदेशसे होनेवाला ज्ञान सम्यग््ञान है, दूसरे मतोका उपदेश तो असवंज्ञोने किया है, अतः उनके मतसे होनेवाला ज्ञान मिथ्याज्ञान है) तब मनम सहज ही यह् विकल्प आता है कि-वधंमान ही सर्वज्ञ धे, वे ही समस्त वस्तुजोका साक्षात्कार कस्तेथे, बौद्धादि मतवालोके देव सुगत, कपिर आदि सवंज्ञ नहीं थे" यह् कंसे माना जाये ? वधंमानकी स्व॑ज्ञता तथा सुगतादिकी असवंज्ञताको ग्रहण करनेवाला कोई प्रमाण ही जब नहीं मिक्ता तब यह सन्देह ओर भी पृष्ट हो जाता है कि-कौन सवंज्ञ थे-वधंमान या सुगतादि?। स्वगंसे देवता आकर व्धंमानकी पूजा करते थे उनके प्रातिहायं भे इसलिए वधमान ही सवंज्ञ थे, सुगतादि नही" यह तकं तो बिकुल लंगडा है; क्योकि वधंमानका निर्वाण हुए करीब २। हजार वषं बीत चुके है, (उस समय देव अये थे या नहीं यही सन्दिग्ध है । देवोकी बात जाने दीजिए 'वधंमान हए भी थे इसीको सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण आज नहीं मिक्ता ।' “वदि भगवान् वर्धमान न होते तो आजकर जो जैन सम्प्रदाय चल रहा है उसे किसने चलाया ? अतः इसी सम्प्रदाय प्रवतंनके कारण उनका अस्तित्व ओर उनकी सवंज्ञता सिद्ध होती है यह कहना भी असंगत है; क्योकि-"यह् सम्प्रदाय स्वयं वधंमानने चलाया है या किसी धूतंने ?' इसीका निरचय करना, साधक प्रमाणका अभाव होनेसे कठिन है । बिना प्रमाणके तो हम एक भी बात स्वीकार नहीं कर सकते । इस तरह इस चचमिं अब अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है । संसारम मायावी लोग स्वयं असर्वंज्ञ रहु-
कर भी जगते अपनी सव॑ज्ञताका ठ्ढोरा पीटनेके लिए नाना प्रकारसे इन्द्रजाल करके देवोका
आकादासे आना-जाना, उनके द्वारा अपनी पूजा कराना आदि चमत्कार दिखाते हैँ । इसलिए देवोके आनेसे या उनके द्वारा पजित होने मात्रसे स्वंज्ञताका निरचय कंसे किया जा सकता है ? तुम्हारे जैनमतके ही स्तुत्िकार आचायं समन्तभद्रने स्वयं हौ कहा है कि “देरवोंका आगमन, आकारामें विहार करना तथा चंवर छत्र आदि विभूतियां मायावियोमे भी देखी जाती हैँ । इसलिए हे वीर! तुम हम-जैसे परीक्षकोपर अपनी महत्ता, इन देवागम-जंसी साधारण वस्तुओसे नहीं जमा सकते । अर्थात् इन मायावी साधारण देवागमं आदिमे तुम हमारे महान् पृज्य नहीं हो सकते ।।१।1"
8 ३२३. अथवा, (वधमान स्वामीको सवंज्ञ मान भी लियाजायेतव भीयहजो आचारांग
१. -ते तत्प- भ० २। २. ~णक प्रतिपत्तु क्षमा वयंमाभ० २)
- का० १. § ३४ 1 अन्ञानवादः। ९७
न पुनः केनापि धूर्तेन स्वयं विरचय्य पर्वाततः' इति कथमवसेथम्, अतीन्द्रिये विषये प्रमाणा- भावात् ! भवतु वा तस्यैवाधमुपदेशस्तथापि तस्यायमर्थो नान्य इति न शक्यं प्रत्येतुम् । नानार्था हि शब्दा रोके प्रवतंन्ते, तथादशंनात् ! ततोऽन्यथाप्यथं.संभावनाथां कथं विवक्षि च्ताथंनियमः- निश्चयः! छड्यस्थेन हि परचेतोवत्ते रप्रत्यस्नत्वात् कथमिदं ज्ञायते-"एष सवंज्ञस्याभिप्रायोऽनेन -चामिप्रायेणायं शब्दः प्रयुक्तो नाभिप्रायान्तरेण' इति । तदेवं दीघंतरसंसारकारणत्वात् सस्थग्नि अयाभावाच्च न ज्ञानं श्रेयः, †क त्वज्ञानमेवेति स्थितम् । |
§ ३४. ते चाज्ञानिकाः सप्रषष्टिसंख्या असुनोपायेन * प्रतिपत्तव्याः । इह जीवाजोवादीन्ं दार्थान् क्रचित् पटूकादो व्यवस्थाप्य पथन्त उत्पत्तिः स्थाप्यते \ तेषां च जोवादीनां नवानां प्रव्येकमधः
आदिमे महावीरके नामसे प्रचलित उपदेश निबद्ध हँ वे उपदे महावीरने हीद्यि थेया किसी धृतंने स्वयं बनाकर उनके नामसे प्रचलित किये है ?' इसका निरचय किस प्रकार कियाजये? जो बात आंँखोके सामने नहीं है अतीन्द्रिय है उसको सिद्ध करनेवाला तो कोई प्रमाण ही नहीं मिता । अथवा यह् भी मान किया. जाये कि--भगवान् महावीरने ही इन आचारांग आदिका उपदेश किया था; फिर भी इन शाब्दोका यही अथं है दूसरा नही" इसका निरचय कौन कंसे करेगा ? जगतूमें एक ही शब्दके अनेक अथं देखे जाते हैँ 1 इसक्ए जो अथं आपको विवक्षित हैँ उससे विपरीत अथं यदि उन्हीं शब्दोका निकलता है तब अथंकां नियम कैसे होगा ? (भगवान् वधंमानके चित्तमे इन शब्दोंका यही अथं था' यह् तो अल्पज्ञानी हमलोग जानि ही नहीं सकते । अतः सवज्ञका यह् अभिप्राय है, इसी अभिप्रायसे उनने इन शब्दोका प्रयोग किया है, दूसरे अभि- प्रायसे नहीं" यह जानना नितान्त असम्भव है। सारांश यह है कि यह ज्ञान ही अनेक क्षगड़ोकी जड़ है 1 इसीसे ( अहंकारपूर्वक राग-देष होकर ) अनन्त संसारकी वृद्धि होती है । ओर इसका सम्यग् निश्चय करना भी अत्यन्त कठिन है 1 इस अनथंमूर ज्ञानसे कभी कल्याण नहीं हो सकता, अतः अज्ञान ही श्रेयःसाधक है" यही अन्तिम निष्कषं निकलता है
8 २४. इन अज्ञानवादियोके ६७ प्रकार इस तरह समञ्लना चाहिए-किसी पटी आदिषर जीवादि नव पदार्थोको एक पंकितिमे लिखकर अन्तम ददावे स्थानपर "उत्पत्ति नामका पद
१. -यंभाव-म० २। २. -ताथं निद्वयः क०। ३. वाभि-म०र२ । ४. “ते चामी-जीवादयो नव पदार्थाः उत्पत्तिरच दशमी, 'सत् असद् सदसत् अव॑क्तग्यः सदवक्तव्यः असदवक्तव्यः सदसदवक्तम्यः" दत्येतेः सप्तभिः प्रकारैः विज्ञातुं न शक्यन्ते, न च विज्ञातेः प्रयोजनमस्ति । भावना चेयम्-सन् जीव इति को वेत्ति । कि वा तेन ज्ञातेन । असन् जीव इतिको जानाति) किवा तेन ज्ञातेन । इत्यादि । एवमजीवादिष्वपि प्रत्येक सप्त विकल्पाः । नवसप्तकाः त्रिषष्टिः । अमी चान्ये चत्वारः त्रिषष्टिमध्ये प्रज्निप्यन्ते; तद्यथा-सती भावोत्पत्तिरिति को जानाति । कि वाऽनयां ज्ञातयाः। एवमसती सदसती अवक्तन्या भावोत्पत्तिरिति को वेत्ति । कि वानया ज्ञातयेति ? शेषविकत्पत्रयमुत्पत्युत्तरकारू पदार्थावयवापेक्षमतोऽत्र न संभवतीति नोक्तम् । एतच्चतुष्टयप्र्ेपात् सप्तषष्टिर्भवम्ति ।'*--भाचा० शौ ० १।१।१।४ ! नन्दि° मलखयण० घु० २१७८. । सुश्च°्ो० १।१२। स्था० अम० ४।४।३४५। “को जाणडई् णवभावे सत्तमसत्तं दयं अवच्चमिदि । अवयणजुदसत्ततयं इदि भंगा होति तेसद्री \ को .जाणदइ सत्तचऊ भावं सुद्धं खु दोण्णिपंतिभवा । चत्तारि होति एवं अण्णाणीणं तु सत्तद्भी ।।-जीवादि नवपदार्थेषु एकंकस्य अस्त्यादिसप्तभङ्गेषु एकंकेन जीवोऽस्तीति को जानाति । जीवो नास्तीति को जानाति । इत्याद्यालपे छृते त्रिषष्टर्भवन्ति । पुनः शुद्धपदार्थं इति लिखित्वा तदुपरि अस्ति नास्ति अस्तिनास्ति अवक्तन्य इति चतुष्कं लिखित्वा एतत्पद्क्तिदयसंभवाः खलु भङ्गाः रुद्धपदार्थोऽस्तीति को जानीते । -इत्याद- यरचत्वारो भवन्ति । एवं भित्वा अज्ञानवादाः सप्तषष्टिः ।'" --गो० कमं० टी° गा० ८८६९-८४।
२८ षड्दर्रानसमुच्चये [का० १. §२३४-
सप्र सत्त्वादयो न्यस्यन्ते । तद्यथा-सत््वम्, असत्वम्, सदसत्त्वम्, अवाच्यत्वम्, सदवाच्यत्वम्, असदवाच्यत्वम्, सदसदवाच्यत्वं चेति । तत्र सत्त्वं स्वरूपेण विद्यमानत्वम् । असत्त्वं पररूपेणा- विद्यमानत्वम् । सदसत्त्वं स्वरूपपररूपाभ्यां विद्यमानाविद्यमानत्वम् ।' -> तत्र यद्यपि सर्वं वस्तु स्वपररूपाभ्यां सवंदेव स्वभावत एव सदसत्, तथापि क्र्चित्किचित्कदाचिदुद्भूतं प्रमात्रा विवक्ष्यते, तत एवं ज्रयो विकल्पा भवन्ति<-। तथा तदेव सत्त्वमसत्त्वं च यदा युगपदेकेन शब्देन वक्तुमिष्यते तदा तद्वाचकः शब्दः कोऽपि न विद्यत इत्यवाच्यत्वम् । ->एते चत्वारो विकल्पाः सकलादेश्षा इति सकलवस्तुविषयत्वात्<-।४। यदा त्वेको भागः सन्नपरश्चावाच्यो युगपद्विवक्ष्यते तदा सदवाच्यत्वम् । यदा त्वेको भागोऽसन्नपरश्चावाच्यस्तदासदवाच्यत्वम् । यदा त्वेको भागः सन्नपरश्चासन्नपरतरश्चा- वाच्यस्तदा सदसदवाच्य[त्व]मिति। न चेतेभ्यं : सप्तभ्यो विकल्पेभ्योऽन्यो विकल्पः संभवति, सव॑स्यै- तेष्वेवान्तभविात् । ततः सप्र विकल्पा उपन्यस्ताः । सप्त च विकल्पा नवभिर्गृणिता जातास्त्रिषष्टिः 1 उत्पत्तेश्चत्वार एवाद्याः विकल्पाः । तद्यथा-सत्वमसत्त्वं सदसत्वमवाच्यत्वं चेति । शेषविकल्पन्नयं तुत्पच्युत्तरकालं पदार्थावयवपेक्षमतोऽत्रासंभवीति नोक्तम् । एते चत्वारो विकल्पास्तन्रिषष्टिमध्ये प्रक्षिप्यन्ते ततः सप्तषष्टिभंवन्ति । ततः` “को जानाति जीवः सन्" इत्येको विकल्पः, न कश्चिदपि
किना चाहिए । जीवादि नव पदा्थेकि नीचे सतव असत्त्व आदि सात भंग स्थापित करना चाहिए 1 वे सात भंग इस प्रकार ह-- १ सत्व, २ असत्त्व, ३ सदसत्तव, ४ अवाच्यत्व, ५ सदवाच्य- त्व, ६ असदवाच्यत्व, ७ सदसदवाच्यत्व । १. सतत्व--वस्तु अपने स्वरूपसे है । २. असत्त्व-- वस्तु पररूपसे नहीं है । ३. सदसतत्व--वस्तु स्वरूपकी अपेक्षा सत् तथा पररूपकी अपेक्षा असत् होनेसे क्रमराः दोनों अपेक्षाओंसे सदसदुभय रूप है । यद्यपि वस्तु स्वभावसे हमेशा ही सदसद्-उभयधर्म- वाटीहैफिरभी जो अंश प्रयोग करनेवारेको विवक्षित होताहै तथा उद्भूत होता है उसी अंसे वस्तुका सत् असत् या क्र पराः विवक्षित सदसत् रूपसे व्यवहार हो जाता.है । ४. अवाच्यत्व- जब सत्त्व ओर असत्त्व दोनों ही धर्मोको एक साथ एक ही शन्दसे कनेक इच्छा होती है तब युगपत् दोनों धर्मोको प्रधानरूपसे कहनेवाङे शब्दका अभाव होनेसे वस्तु अवक्तव्य है । ये चार भंग सकलवस्तुको विषय करनेके कारण सकलरादेश कहकाते हँ । ५. सदवाच्यत्व-जब एक अज्ञ सद्रूपसे तथा दूसरा अवक्तव्यरूपसे विवक्षित होता हँ तब वस्तु सदवाच्य होती है । ६. असदवाच्य- जब एक भाग असद्रूपसे तथा दूसरा अवाच्यरूपसे विवक्षित होता है तब वस्तु असदवाच्यरूप होती है । ७. सदसदवाच्य--जब एक भाग सत् दूसरा असत् तथा तीसरा अवाच्यरूपसे विवक्षित होता है तब वस्तु सदसदवाच्यरूप होती है । इन सातों भंगोको जीवादि नव पदा्थसि गणां करनेपर (७८९) ६३ भंग होते दँ । दसवें यह “उत्पत्ति"के सत् असत् उभय तथा अनुभय मवाच्यये चारही विकल्प होते हँ । बाकोके तीन भंग तो उत्पत्तिके बाद जव पदा्थंकी सत्ताहो जाती है तब उसके अवयवोंकी अपेक्षा बनते हं । इस तरह उत्पत्तिके चार भंगोको उक्त ६३ भंगोंमें
१.-><-एतदन्तगंतः पाठो नास्त क०, प० १, २, भ° १। २.-><एतदन्तगतः पाठो नास्ति क०,
प० १, २, ज० १। ३. -म्योऽत्र सप्तभ्यो भ०२। ४. ~या विकल्पास्त्रिषष्ठिमध्ये प्रिप्यन्ते ततः
सप्तषष्टिर्भवन्ति । तत्र को जानाति जीवः सत्निति एको विकल्पो भान्यते । कोऽर्थः, जीवो वर्तत इति न
करिचदपि जनाति म०२। ५, भवति प० १, २, म० १, २। ६. “तत्र सन् जीव इति को वेत्ति"
इत्यस्यायमर्थः-न कस्यचिद्धिशिष्टं ज्ञानमस्ति योऽतीन््रियान् जीवादीनवभोत्स्यते, न च तज्ञैः
किचित्फलमस्ति । तथाहि-यदि नित्यः स्वं गतोऽमृर्तो ज्ञानादिगुणोपेत एतद्गुणव्यतिरिक्तो वा, ततः
कतमस्य पुरुषार्थस्य सिद्धिरिति तस्मादज्ञानमेव श्रेय । अपि च, तुल्येऽप्यपराधे अकामकरणे रोके स्वल्पो
दोषः, लोकोत्तरेऽपि भाकुद्िकानाभोगसहसाकारादिषु क्षुट्लकभिक्षुकस्थविरोपाध्यायसूरीणां यथाक्रम-
मूत्तरोत्तरं प्रायरिचत्तमिति । “~ जाचा० शी० १।१।१।४। नन्दि० मङ्य० प° २१७ बी०।
- का० १. § ३५ ] वैनयिकचादः 1 २९
जानाति, तद्ग्राहकप्रमाणाभावादिति भावः! ज्ञातेन वा कि तेन प्रयोजनम्, ज्ञानस्याभिनिवेश्षेतुतया परखोकप्रतिपन्थित्वात् । एवमसदादयोऽपि विकल्पा भावनीयाः 1 “उत्पत्तिरपि {क सतोऽसतः सद- सतोऽवाच्यस्य वा" इति को जानाति, ज्ञातेन वा न किचिदपि प्रयोजनमिति
§ ३५. तथा विनयेन चरन्तीति वेनयिकाः९, रवसिष्ठपराशरवाल्मीकिव्थासेलापुत्रसत्यदत्त- प्रभृतयः । एते चानवधृतलिङ्धाचारशास्त्रा विनयप्रतिपत्तिलक्षणा वेदितव्याः! ते च दात्रि्ञत्संख्या अमुनोपायेन ब्रष्टग्याः । सुरनुपतियतिज्ञातिस्थविराधममातुपित्रूपेष्वष्टसु स्थानेषु कायेन मनसा वाचा दानेन च देशाकारोपपल्नेन विनयः कायं इति चत्वारः कायादयः स्थाप्यन्ते । चत्वारद्याष्टमि- गुणिता जाता द्वाचिश्शत् । एवमेतानि त्रीणि हतानि त्रिषष्रयधिकानि परदशेनानां भवन्ति ।
मिलानेपर अज्ञानवादियोके कुर ६७ भेद हो जाते हैँ ।
अज्ञानवादी कहते हैँ कि--कौन जानता है कि “जीव सत् है" ? जीवकी सत्ता सिद्ध करने- वाला कोई प्रमाण नहीं है अतः उसकी सत्ताको कोई सिद्ध नहीं कर सकता 1 अथवा जीवकी सत्ता- का ज्ञान भी हो जाये तो उससे कोड प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, प्रत्युत ज्ञान अहंकारम कारण होनेसे परलोकका बिगाड़नेवाखा ही है । इसी तरह जीवो नास्ति" इत्यादि विकल्पोमें अज्ञानवादकी प्रक्रिया समञ्च टेनो चाहिए 1 इसो तरह उत्पत्ति सत्को होती है, या असत्की, अथवा उभयात्मक- की, या अवाच्यकौ ? यह् सब कोन जान सकता है ? इसके जाननेसे कोई प्रयोजन भी सिद्ध नहीं होता । इसलिए इन सबके सम्चनेमे माथापच्ची करना व्यथं ही है 1 इत्यादि 1
§ ३५. विनयपूवंक जिनका आचार-व्यवहार है वे वेनयिक कहते हैँ । वसिष्ठ, पाराशर, वाल्मीकि व्यासः, इलापुत्र, सत्यदत्त आदि प्रमुख वेनयिक हुए हैँ । इनका वेष, आचार तथा शास्त आदि कुछ भी निरिचत नहीं है, हर एक शास्त्र, वेष तथा आचार इन्हे इष्ट है । विनय करना ही इनका मुख्य कतव्य है 1 इनके बत्तीस भेद इस प्रकार समक्लना चादिए-देवता, राजा, साधु, ज्ञातिः वृद्धः; अधमः, माता तथा पिता इन आटठोकौ मन, वचन, काय तथा देश-कालानुसार दान देकर विनय की जातौ है । अतः देवता आदि आसको मन, वचन आदि चारसे गुणा करनेपर वैनयिकोके बत्तीस भेद सिद्ध होते ह 1 इस तरह क्रियावादी अक्रियावादी आदि सभीके कूल भेद ३६३ होते है । ये सभी परदशंन हैँ ।
१. ““सवंदेवतानां सवंसमयानां च समदनं वैनयिकम्'' --सर्वाथसि ° ८१ । “"तथा विनयादेव मोक्ष इत्येवं गोशालकमतानुसारिणो विनयेन चरन्तीति वेनयिका व्यवस्थिताः" षृत्र° शो० १।६।२७। “(तथा वैनयिका विनयादेव केवलात् स्वगमोक्षावापिमभिलषन्तः मिथ्यादृष्टयः` ` """--षृन्न° शी १।१३। “'विनयेन चरति स वा प्रयोजन एषामिति वैनयिकाः, ते च ते वादिनरचेति वेनयिकवादिनः, विनय एव वा वैनयिकं तदेव ये स्वर्गादिहैतुतया वदन्त्येवंशीलाइच ते वेनयिक्रवादिनः विधृतलिङ्खाचारशास्वा विनयप्रतिपत्तिखक्षणाः-ˆ.'-मग० जम० ३०।१ । स्था० अम० ४।४।३४५ । २. “'वसिष्ठपाराशर- जतुकणिवाल्मीकिरोमषिसत्यदत्तव्यासैकापुत्रोपमन्यवेन््रदत्तायस्थूणादीनां वेनयिकदुष्टीनां द्वात्रिशत् । एषां दृष्टिशतानां त्रयाणां त्रिषष्टयुत्तराणां प्रखूपणं निग्रहरच दुष्ठिवादे क्रियते । ` --राजवा० पर° ५१। ३. ““सुरनृपयतिज्ञातिंस्थविराधममातुपितृष्वष्टसु मनोवाक्कायप्रदानचतुविधविनयकरणात् । तद्यथा देवानां विनयं करोति मनसा वाचा कायेन तथा देरकारोपपन्नेन दानेनेत्येवमादि । एते च विनयादेव स्वरगापवर्गमागंमम्युपयन्ति । नीचैवृत्तयनुत्सेकलक्षणो हि विनयः, सवत्र चैवंविधेन विनयेन देवादिषु उपतिष्ठमान. स्वर्गापवगंभाग् भवति ।""--आचा० शौ ° १।१।१।४ । सूत्र° शो० १।१२ । स्था० अम० ४।४।३५१ । नन्दि० मङ्य० प° २१७ ब्री° | ^मणवयणकायदाणगविणवो सुरणिवइणाणिजदिवृड्ढे । जाके मादुपिदुम्मि च कायव्वो चेदि अटुचऊ ।।--देवनुपतिज्ञानियत्िवृ ढबालमातृपितुष्वष्टसु मनोवचनकाय- दानविनयाइचत्वारः कर्तव्याश्चेति ` दात्रिशद्रैनधिक्रवादाः स्युः 1” --गो० क्मं० ठी° गा० ८८८ ।
| |
३० षड्ददनिसमुंच्वये | का० १. $ ३६-
§ ३६. अथवा लोकस्वरूयेऽप्यनेके वादिनोऽनेकधा विप्रवदन्ते । तदयथा- 'केचिश्नारी- श्वरजं जगल्निगदन्ति ! परे सोमाग्निसंभवम् । वैशेषिका द्रव्पगुणादिषड्विकल्पम् । -केचित्काद्यपकृतम् । परे दक्षप्रजापतीयम । केचिद्: ब्रह्मादित्रयेकमतिसुष्टम् । वेष्णवा ध्विष्णुमयम् । "पौराणिका विष्णुनाभि्पद्मजब्रह्मजनितमात्जम् । ते एव केचिदवणं ब्रह्मणा वर्णादिभिः सृष्टम् । केचित्रालकृतम् । “परे क्ित्यादष्ट मूतीश्विरकृतम् । “अन्ये
र
१ ३६. अथवा, लोकके स्वरूपम ही अनेकों वादी अनेक प्रकारकी कल्पनां करते हँ । कोई इस .जगत्का उत्पत्ति नारीइवर अर्थात् महेर्वरसे मानते हैँ । कोई सोमाग्नि-सोम ओर अग्निसे सं्ारको सुष्टि कहते हं । वैशेषिक द्रव्य, गण, क्म, सामान्य, विशेष ओर समवाय इस षट्पदार्थीरूप ही जगत् मानते हँ । कोई जगत्की उत्पत्ति कार्यप-ब्रह्यासे मानते हँ । कोई जगत्को दक्षप्रजापति- करत कहते हँ । कोर ब्रह्मादि त्रिमूतिसे सुषश्टिकी उत्पत्ति बताते हँ 1 वेष्णव विष्णुकृतं कहते हैँ । पौराणिक कहते हँ कि--विष्णुकी नाभिके कमले ब्रह्मा उत्पन्न होते है, ब्रह्माजी अदिति आदि जगन्माताओंकी सृष्टि करते हे, इन जगन्माताओसे इस जगत्को सृष्टि होती दै । कोई वणं व्यवस्थासे रहित इस वणंशून्य जतुकरो ब्रह्मने चतुवणंमय बनाया है' यह् कहते हँ । कोई संसारको काक्कृत
१. “नानो(रो)रवरजं केचित् केचित् सोमाग्निसंभवं लोकम् । द्रव्यादिषड्विकल्पं जगदेतत् केचिदिच्छन्ति ।* -रःकत० १४१। २. "इच्छन्ति कारयपीयं केचित्सवं जगन्मनुष्यायम् । दक्षप्रजापतीयं त्रंलोक्यं केचिदिच्छन्ति ।'ˆ--कोरुत० १।४५ । ३. “केचित्प्राहुमूततिस्तिधा गतेका हरिः शिवो ब्रह्मा । रंमुर्बीजं जगतः कर्ता विष्णुः क्रिया ब्रह्मा ॥ वष्णवं केचिदिच्छन्ति केचित्काकृतं जगत् । ईश्वरप्रेरितं केचित् केचिद् ब्रह्मविनिर्मितम् ॥ अन्यक्तप्रभवं सवं विश्वमिच्छन्ति कापिलाः । विज्ल्िमात्रं शन्यं च इति शाक्यस्य निर्वयः ॥ पुरुषप्रभवं केचित् दैवात् केचित् प्रभावतः । अक्रात् क्रितं केचित् केचिदण्डोद्धवं जगत् ।॥ यादच्छिकमिदं सवं केचिद् भूतविकारजम् । केचिच्चानेकरूपं तु बहुधा संप्रधाविताः ॥'* खोकत० १।४६-४५० । ४. “जके विष्णुः स्थे विष्णुराक्राद विष्णुमालिनि। विष्णुमाककरके लोके नास्ति क्रिचिदवंष्णवम् ।॥ सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमाल्लोके सर्वमाश्रित्य तिष्ठति ॥“-- छोकत० १।५१-५२ । ५. ““तस्मिन्लेकार्णंवीभूते नष्टस्थावर- जद्खमे । नष्टामरनरे चैव प्रनष्टोरगराक्षसे ॥ केवर गह रीभूते महाभूतविव्जिते । भचिन्त्यात्मा विभुस्तत्र शयानस्तप्यते तप: ॥ तत्र तस्य शयानस्य नाभौ पद्म विनिर्गतम् । तरुणाकमण्डलनिभं हद्यं काञ्चन- कणिकम् ॥ तस्मिश्च पद्मं भगवान् दण्डकमण्डलुयज्ञोपवीतमृगचर्मवस्त्रसंयुक्तः । त्र्या तत्रोत्पन्नः तेन॒ जगन्मातरः वृष्टाः ॥ अदितिः सुरसंघानां दितिरसुराणां मनुमंनुष्याणाम् । विनता विहुंगमानां माता विश्वध्रकाराणाम् ॥ कद्रूः सरीसुपाणां सुलसा माता तु नागजातीनाम् । सुरभिश्चतुष्पदानाम् इछा पुनः स्वंबीजानाम् ॥ प्रभवस्तासां विस्तरमुपागतः केचिदेवमिच्छन्ति 1 -लोकतण० १।५४.६० । ६, पद्मजब्रह्मजनित ( मातृज ) म् आ०। -पयमजं त एव ब्रह्मज भ० २। ७. “केचिद दन्त्यवणं सृष्टं वर्णादिभिस्तेन । कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः । कालः सुप्सु जागत कालो हि दुरतिक्रमः ॥" --रोकत ० १।६०-६१ । ८. “श्रकृतीनां यथा राजा रक्षाथमिह चोद्यतः । तथा विदवस्य विश्वात्मा स जागत्ति महेश्वरः ॥ अज्ञो जन्तुरनीरोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईङवर- प्ररितो गच्छेत् स्वगं वा इवश्रमेव च ॥ सूक्मोऽचिन्त्यो विकरणगणः सर्ववित् सर्वकर्ता, योगाभ्या- सादमल्निधिया योगिना ध्यानगम्यः। चन्द्रार्काग्निक्षितिजलमर्द्दीकषिताकाशम्त्तिः । ध्येयो नित्यं दामसुखरतंरीरवरः सिद्धिकामः ॥ --कोकृत० १।६२-६४ । ९. ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्राहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्ेरयः पद्म्यां दूद्रोऽजायत ॥ १२। अस्य प्रजापतेर््राह्मणो ब्राह्मणत्वजाति- विशिष्टः पुरुषो मुखमासीत् मुलादुत्पन्न इत्यर्थः । योऽयं राजन्यः क्षत्रियत्वजातिविरि्टः स बाहूकृतो
= का० ९१.६३६] लोकवादः 1 ३१
"ब्रह्मणो मुखादिभ्यो ब्राह्यणादिजन्मकम् । -सांख्याः प्रकृतिप्रभवम् । शाक्याः विजपिमात्रम् अन्य एकजीवात्मकम् ! केचिदनेकजीवात्मकम् 1 परे पुरातनकमंकृतम् \ अन्ये स्वभावजम् । *केचि- दक्षरजातभूतोद्भूतम् । केचि"दण्डप्रभ वम् ! आश्रमी ^त्वहेतुकम् । पुरणोऽ नियतिजनितम् । पराह्ञरः "परिणामप्रभवम् । केचिदाद्च्छिकम् । नेकवादिनोऽ^नेकस्वरूपम् । तुरुष्का गोस्वामि-
कहते दँ तो कोई उसे पृथिवी आदि अष्टमूरतिवारे ईऽवरकेद्रारा रचा हुआ कहते हैँ । कोई ब्रह्याके मुख आदिसे ब्राह्मण क्षत्रियादिकी उत्पत्ति बताते हँ । सांख्य इस सृष्टिको प्रकृतिक्रत मानते हैँ । बौद इस जगत्को क्षणिक वि नानरूप कहते हैँ । ब्रह्माद्रैतवादी जगतुको एक जोवरूप कहते हँ तो कोई वादी इसे अनेक जोवरूप भी कहते हैँ 1 कोई इसे पूव॑कर्मसि निष्पन्न कहते हँ तो कोई स्वभावसे उत्पन्न बताते हँ! कोई अक्षरसे सपुत्पन्च भूतो-दारा इस जगतुकी उत्पत्ति बताते हँ । कोई इसे अण्डसे उत्पन्न हुआ बताते हँ । आश्रमी इसे अटैतुक कहते है । पूरण जगत्को नियतिजन्य मानते है । पराशर इसे परिणामजन्य कहते हँ । कोद इसे यादृच्छिक-अनियतहेतुज मानते ह । इस तरह अनेकों वादी इसे अनेक स्वरूप बताते हैँ । तुरुष्क गोस्वामी नामके दिव्य पुरुषसे जगत्की सृष्टि
बाहुत्वेन निष्पादितो बाहुभ्यामुत्पादित इत्यथः । तत्तदानीमस्य प्रजापतेर्ययावृरू तद्रो वैश्यः संपन्नः ऊरुम्यामुत्पादित इत्यथंः । तथाऽस्य पद्भ्यां पादाभ्यां शूद्रः शुद्रत्वजातिमान् पुरुषोऽजांयत । इयं च मुखादिभ्यो ब्राह्मणादीनामुत्पत्तियजुःसंहितायां सप्तमकाण्डे स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत" इत्यादौ विस्पष्टमाम्नाता 1” --ऋक्० पुरुषसू० । ““आसौदिदं तमोभूतमग्रज्ञातमलक्षणम् । अभ्रतकर्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयंभूर्भगवानन्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥ लोकानां स च वृद्धयथं मुखबाहूरुपादतः । ब्राह्मणं क्षत्रियं वेदयं शूद्रं च विन्यवर्तयत् |“ --लोकत ° १।६५-६ ७ । “"एवं समुत्पन्नेषु चतुषु महाभूतेषु महेडवरस्याभिध्यानमात्रात् तैजसेभ्योऽणुभ्यः पाथिव- परमाणुस्हितेभ्यो महदण्डमारभ्यते । तस्मिश्चलुवंदनकमलं सवंलोकपितामहं ब्रह्माणं सकलभुवन्सहित- मुत्पाद्य प्रजासर्गे विनियुट्क्ते। स च महेश्वरेण विनियुक्तो ब्रह्माऽतिशयज्ञानवेराग्यैरवयंसंपन्नः प्राणिनां कर्मविपाकं विदित्वा कर्मानुरूपज्ञानभोगायुषः सुतान् प्रजापतीन् मानसान् मनुदेवषिपितृगणान् मुखबाहुरुपादतइचतुरो वर्णान् अन्यानि चोच्चावचानि सृष्ट्वा" --प्रश० मा० प° २२। १. ब्रह्मादिभ्यो म० २। २. “इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविरोषभूतपयंन्तः । प्रतिपुरुषविमोक्षाथं स्वार्थं इव परार्थं आरम्भः ॥' सांख्यका० ५६ । ३. “विज्ञप्षिमात्रमेवेदमसदर्थावभासनात् । यथा तैमिरिकस्यासत्केशपाशादिदर्शनम् ॥“--विक्ञक्षि° इशरो० १। ४. अक्षरात् क्षरितः कालस्तस्माद् व्यापक इष्यते । व्यापकादिप्रकृत्यन्तां तां हि सृष्टि प्रचक्षते ।॥ अक्षरांशस्ततो वायुस्तस्मात्तेजस्ततो जलम् । जलात् प्रसूता पृथ्वी भूतानामेष संभवः ॥"* --रोङ्त० २।२३-२५ । ५. ` नारायणपरान्यक्तादण्ड- मनव्यक्तसंभवम् । अण्डस्यान्तस्त्वमी भेदाः सप्त द्वीपा च मेदिनी ।॥ गर्भोदकं समृद्रार्च जरायुश्चापि पर्वताः । तसिमिन्नण्डे त्वमी रोका: सप्त ससत प्रतिष्ठिताः ॥ तत्रेहा्ः स॒ भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मना ध्यात्वा तदण्डमकरोद् द्िधा॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां तु दिवं भूर्मि च नि्ममे।'" --रोकत० २।२५-२० । ६ “हेतु रहिता भवन्ति हि भावाः प्रतिस्मयभाविनरिचत्राः । भावादृते न भाग्यं संमवरहितं खपुष्पमिव ।"--ोकत ० ३।२८ । ७. प्राप्तव्यो नियतिबखाश्रयेण योऽथ: सोऽवश्यं भवति नृणां शुभोऽशुभो वा । भूतानां महति कृतेऽपि हि प्रयत्ने नाऽभाग्यं भवति न भाविनोऽस्ति नाशः ॥"” --रोकत ० २।३९ । ८. “श्रतिसमयं परिणामः प्रत्यात्मगतश्च सवं भावानाम् । संभवति नेच्छयापि स्वेच्छा क्रमवतिनी यस्मात् ॥'' --कोकत० २।३० । ९. “कारणानि विभिन्नानि कार्याणि च यतः पृथक् । तस्मात्तिष्वपि कालेषु नैव कर्मास्ति निश्चयः ॥'" --रोङत ° २।६५ । |
३२ षडदशंनसमुच्चये [ का० १. ६३७ - नामक'दिव्यवुरुषप्र भवम् । इत्यादथोऽनेके ° वादिनो विद्यन्ते । एषां स्वरूपं लोकततत्वनिणंयात् हारिभद्रादवसातन्यम् ।
६३७. एवं सर्वंगतादिजीवस्वरूपे ज्योतिश्वक्रादि चार स्वरूपे च नैके विप्रतिपद्यन्ते । तथा 'जोद्धा-
मानते हैं । रत्यादि अनेकों वादी इस संसारके विषयमे अपने मतका अनेक तरहसे निरूपण करते है । इनका विशेष स्वरूप हरिभद्रसूरिकृत लोकतत्त्वनिर्णेय ग्रन्थमें देखना चाहिए ।
§ ३७. इसो प्रकार जीवक्रे सर्वंगतत्व आदि स्वरूपक्रे विषयमे तथा ज्यो तिश्चक्रके गमनादिक-
जाक अकि
१. -नामेकदि- कं० । २. -नेकवादि- कण, प० १, २, म० १, २। ३. -दिचर- आ०। -दिवार- प० १, २, भ० १। ४. एतेषां निकायानां वर्णनं विनयपिटकभूमिकायामित्थम्-- '"चल्ल- वग्गके सप्तरातिकास्कन्धक ( प° ५४९ } से मालूम हं कि--नुद्धनिर्वाणके १०० वर्षं बाद बौद्ध दो निकायो ( सम्प्रदायो )मेँ विभक्त हो गये । प्राचीन बातोके दु पक्षपाती स्थविर कहलाते धे विनयविरुद्ध कुछ नयी बातोके प्रचार करनेवाले महासांधिक । पारीकी कथावत्थुअदटुकथा, दीपवंस
महावंस तथा कुं ओौर ग्रन्योके अनुसार बुद्धनिर्वाणके २२० वर्षो बाद सम्राट् अशोकके 7 महासांधिकों मौर स्थविरो फिर कितने ही छोटे-मोटे मतभेद होकर १८ निकाय हो गये । कथावत्थ- अटुकथाके अनुसार यह् गाखामेद इस प्रकार ह-- `
बुद्धधमं
ए
| | | १ स्थविरवादी | १३ महासांधिकं ऋ श | | | |
२ वुजिपुत्रक ( वात्सीपुत्रीय ) ७ महीशासक १४ एक व्यावहारिक १५ गोकुलिक | आ स ता |
| । | | ३ न | | | ८ धर्मगुत्तिक < सर्वास्तिवादी १६ प्रज्ञप्तिवादी १७ रित
४ भद्रयाणिक | ५ छन्नागारिक १० काड्यपीय ( बाहुश्रुतिक ) ( षण्णागारिक ) | ६ सम्मितीय १९१ सांक्रान्तिक १८ चैत्यवादी | १२ सूत्रवादी
( सौत्रान्तिक )
- का० १. § ३८ 1 दशने मतभेदाः | ३३.
#॥ |
नामष्टादशनिकायभेदाः, 'वैमाविकसौत्रान्तिकयोगाचारमाध्यसिकादिभेदरा वा वर्तन्ते! जैमिनेश् शिष्यकरृता बहवो भेदाः । |
ओंवेकः कारिकां वेत्ति तन्त्रं वेत्ति प्रभाकरः! वामनस्तूभयं केत्ति न किचिदपि रेवणः* ।। १1"
१ ३८. अपरेऽपि बहुदककुटीचरहंसपरमहंसभाटरप्रभाकरादयोऽनेकेऽन्तर्भेदाः। सांख्यानां ` चरकादयो भेदाः । अन्येषामपि सवंदशंनानां देवतत््वप्रमाणमुक्तिप्रभूतिस्वरूपविषये तत्तदनेकशिष्य- . संतानकृताः, तत्तदुग्रन्थकारङृता वा मतभेदा बहवो विद्यन्ते ।
मे अनेकों विवाद हैँ! एक बौद्धदसंनमें ही १८ प्रकारके निकाय तथा वैभाषिक सौत्रान्तिक योगाचार ओर माध्यमिर आदि मेद मौजूद हँ 1 जैमिनि दशंनमें रिष्योके व्याख्या मेदसे ही अनेकों मेदहो गये दहं} ““उम्बेक कारिकाके अ्थ॑को जानता है, प्रभाकर तन्क्-सिद्धान्तकं स्वरूपको समलता है, वासनको कारिका तथा तन्त्र दोनोका ज्ञान है, पर रेवण एकको भी नही जानता 1" इत्यादि प्रवाद प्रसि दहीहै।
१३८. इसी तरह ओर भी बहूदक, कुटी चर, हंस, परमहंस, -भाटु प्रभाकर आदि अनेकों अवान्तर मेद 1 सांख्यदशंनयें भी चरक आदि आचार्यकं अपने-अपने पुथक् सिद्धान्त हैँ । प्रायः. अन्य सभी दशंनोमें देव, तत्त्व, प्रमाण तथा मुक्ति आदिके स्वरूपमे अनेक शिष्योक मतोकी तथा विभिन्न ग्रन्थकारोको अनेक मत-परम्पराएं विद्यमान है |
ज नाः म जक 0 माः क = = _ 1 ----~ -=~ 8 ए गि)
चीनी भाषामें अनुवादित भदन्त वसुमित्र प्रणीत अष्टादशनिकाय म्रन्थके अनुसार यह् अठारह ` राखाभेद उस प्रकार है-
बुद्धघमं [क | । १ स्थविरवादी १३ महासांधिक ति _ | ।
[म ४१1१ 1 यमय भ््््येःःःः 7
[९ । § ॥
| |
1 ¢ 4 १४ पज्ञप्िवादी १६ लोकोत्तर- १७ एक व्यावहारिक
£. £ & € £ € गदो | ध छि # ल इ १५ चेतीय १८ गोकुलिक 411९/ [ल (ट प = | (9 144 > ५ 1 # ~,
--- ८ सर्वास्ति
९ महीशासक ११ काडयपीय १२ सौत्रान्तिके
१० धमग॒प्त
१. ते च माध्यमिकयोगाचारसौत्रान्तिकिवेभाषिकसंज्ञाभिः प्रसिद्धा बौद्धा यथाक्रमं सर्वशान्यत्व- बाह्यार्थशुन्यत्व-बाह्यार्थानुमेयत्व-बाह्याथंप्रत्यक्षत्ववादानातिषठन्ते 1" --सवंद्० बोद्धद० । “चतुष्प्रस्था- निका बौद्धाः ख्याता वैभाषिकादयः ॥ अर्थौ ज्ञानान्वितो वंभाषिकेण बहु मन्यते । सौत्रान्तिकेन प्रत्यक्ष ग्राह्योर्थो न बहिमतः।॥ आकारसहिता बद्धिर्योगाचारस्य सम्मता । केवखां संविदं स्वस्थां मन्यन्ते मध्यमाः पुनः |)! तरिवेकवि० ८।२७ १-७३ । २. रेणवः म० २।
३४ षडदर्शंनसमुच्चये [ का० २. § ३९ -
६ ३९. तदेवमनेकानि दशंनानि लोकेऽभिघीयन्ते । तानि च सर्वाणि देवताततत्वपरमाणावि- भेदेनात्राल्पीयसा प्रस्तुतग्रन्थेनाभि"घातुमहाक्यानि, तत्कथमन्राचार्येण (सवंदशंनवाच्योऽर्यो निगद्यते इत्येवं गंदितुमह्यक्योऽर्यो वक्तुं प्रत्यज्ञायि \ गगनाद्धुरप्रमितिरिव पारावारोभयतटसिकताकणगण-
नमिवात्यन्तं दुःशाक्योऽयम्थः प्रारब्ध इति चेत्; सत्यमेतत्; यद्यवान्तरतद्दधदापेक्षया वक्तुमेषोऽथंः
प्रक्रान्तः स्यात् । यावता तु मुलभेदापेक्षयेव थानि सर्वाणि दानानि तेषामेव वाच्योऽत्र वक्तव्यतया प्रतिज्ञातोऽस्ति नोत्तरभेदापेक्षया, ततो न कश्चन दोषः । सवंशब्दं च व्याचक्षाणे रस्माभिः पुराप्य- यमर्थो वक्त एव, परं विस्मरणशीरेन भवता विस्मारित इति ॥१।॥ एनमेवा्थं ग्रन्थकारोऽपि चालाकषहु-~ ~ 6 |
दशनानि षडेवात्र मूलमेदन्यपेक्षया ।
देवतातत्वमेदेन ज्ञातव्यानि मनीषिभिः ॥२॥
§ ४०. अत्र प्रस्तुतेऽस्मिन्प्रन्थे दशनानि षडेव, मूमेदव्यपेक्षया मृरभेदापेक्षया मनीषिभि- मेंधाविभिर्ञातव्यानि, न पुनरवान्तरत्धोदपेक्षघाधिकानि, परमाधंतस्तेषामेष्वेवान्तर्भावात् । षडवेति सावधारणं पदम् ! केन हेतुना मलभेदानां षोढात्वमित्या्यक््पाह-रेवतातत्वमेदेन इति । देवा एव देवताः, स्वार्थेऽच्र तत्प्रत्थयः, तत्त्वानि प्रमाणेरुषपच्चाः परमाथंसन्तोऽर्थाः, दन्दे देवता- तत्त्वानि, तेषां भेदेन पार्थक्येन । ततोऽयमत्रायंः ~ देवतातत्त्वभेदेन यतो देनानां षडेव मृलभेदा
भवेयुस्ततः षडेवात्र द्ंनानि वक्ष्यन्ते, न पुनरूतरभेदापेक्षयाधिकानीति । एतेन पराक्तनषलोके
सवंजञब्वग्रहणेऽपि षडवात्र दशनानि वक्तं प्रतिज्ञातानि सन्तीति ज्ञापितं द्रष्टव्यम् ।\२॥
६ ३९. शंका-ईइस तरह जब अनेकों दशंन अपने मेद-प्रमेदोके परिवारके साथ संसारमें प्रसिद्ध ह । ओर उन सब अगणित दश्ंनोकं देवता, तत्त्व तथा प्रमाणादिका वणन करना इस छोटे-से ग्रन्थमें केथमपि सम्भव नहीं है तब आचाय॑ने 'स्व॑दशंनोका वाच्य अथं मेरेढारा कहा जाता है" ग्रह॒ असम्भव प्रतिज्ञा क्यों की ? इस प्रतिज्ञाका पूणं करना तो अंगुलोसे आकाशको नापने तथा समु्रके दोनों तटोकं रेतके कणोको गिनती करनेकं समान अत्यन्त कठिन ही नही, असम्भवं ही है)
समाधान--आपकी शंका तो तब ठीक होती जब ग्रन्थकारने सब दर्शंनोके अवान्तर
` ` मेद-प्रमेदोके कथन करनेकी प्रतिज्ञा की होती । पर ग्रन्धकारने स्वयं ही मूलभेदोकी अपेक्षासे ही
सर्वद्यंनोकं कहनेकी प्रतिज्ञा की है, उत्तर मेद-प्रभेदोकी अपेक्षासे नहीं । इसक्एि कोई दोष या अनुपपत्ति नहीं है । मूर दजशंनोका वर्णन वे अपनी प्रतिज्ञानूसार करेगे ही । हमने स्वयं ही सवं ब्दका व्याख्यान करते समय यह् बात अत्यन्त स्पष्ट करहीदीथी। यह तो आपकी स्मरण- दाक्तिका दोष है जो उसे भुला दिया ॥१॥ ग्रन्थकार स्वयं.भी इसी बातक्रो कहते है-
चू कि देवता ओर तत््वोके भेदको अपेश्ना भूरददन छह ही हैँ । अतः यही छह भूलदश्ंन एस ग्रन्थमे विहज्जनो-दारा ज्ञातव्य हैँ ।२॥
8 ४०. प्रस्तुत ग्रन्थे मूलभेदोको ' दृष्टिसे छह ही दशंन विवश्षित हैँ । यद्यपि अवान्तर भेदोकी अपेक्षा दशंनोके अधिक भेद भी हो सकते हैँ परन्तु परमार्थतः उनका इन्हीं छहों दशंनोें अन्तर्भाव हो जाता है । देवता तथा तत्त्वोकं वर्गीकिरणकी अपेक्षासे मूरुदशंनोकी संख्या छह ही है नतोर्पाच ओरन सात ही अतः विद्रज्जनोको इस ग्रन्थमे छह ही मृदरंनोंका वणन मिलेगा, दरशनोकं उत्तरोत्तर मेद-प्रभेदोका नहीं । प्रथम इलोकमे जो समस्त दशंनोकं कहनेकी प्रतिज्ञा की गयी है उसका अभिप्राय भी छह मूक दर्हानोके कथनका ही है । यह बात इस विवरणसे सूचित हो जातीं है ॥२॥ |
१. धातुं शक्या म० २।
~ का० २. § ४२] दानानां नामानि । ३५
६ ४१. अथ षण्णां दशनानां नामान्याह- बौद्ध" नैयायिकं सांख्यं जेनं वेशेषिकं तथा ।
जेमिनीयं च नामानि दशेनानाममृन्यहो ॥२॥ . ` |
§ ४२. बुद्धाः सुगतास्ते च सप्त भवन्ति-१ विपश्यी, २ शिखी, २ विश्वभुः, ४ क्रकुच्छन्दः, काञ्चनः, ६ काहयपः, ७ शाक्यसिहश्येति । तेषामिदं दशनं बौद्धम् ! रन्यायं न्यायतकंमश्षपादषि- प्रणीतं ग्रन्थं विदन्त्यधीयते वेति नैषायिकास्तेषामिदं दशनं नेयायिकम् । -संख्यां प्रकृतिप्रभति- तत््वपच्छविशतिरूपां विदन्त्यघीयते वा सांख्याः । यद्रा तारुब्यादिरपि श्ाङ्ख्यध्वनिरस्तीति वृद्धा- स्नायः । तत्र * शङ्धुःनासा कथि दादयः पुरुषविहषस्तस्थापत्य पोत्रादिरिति “गर्गादित्वात् यज॒पत्यये छाङख्यास्तेषामिदं दशनं सांख्यं शाङ्ख्यं वा! जिना ऋषभादयग्चतुविश्तिरहुन्तस्तेषामिदं दर्शनं जेनम्।
एतेन च्तुवरातेरपि जिनानामेकमेव दर्शनमज निष्ट, न पुनस्तेषां मिथो सतभेवः कोऽप्यासीदित्या-
१.४१. अब उन छह मल दशनोकं नाम कहते है-
अये रिष्यो, बोद्ध, नैयायिक, सांख्य, जेन, वैशेषिक ओर जैमिनीय ये छह भुर वशशंनोके नाम हे ॥३\।
8 ४२. बुद्ध- सुगत सात होते है--१ विपश्यी, २ रिखी, ३ विरवभू, ४ क्रकुच्छन्द ५ काञ्चन (कोणागमन), ६ काइयप, ७ दाक्यसिह 1 बुद्धोके ददांनको बौद्धदर्शांन कहते हँ 1 जो त्याय~न्यायतकं अर्थात् अक्षपाद ऋषिके द्वारा प्रणीत ग्रन्थक जानते अथवा अध्ययन करतेहैँवे नैयायिक है 1 नैयायिकोके दशंनको नैयायिक ही कहते ह । जो संख्या--प्रकति आदि तत्त्वोकीं पचीस संख्याको जानते अथवा अध्ययन करतेहंवे सांख्य ह। कहीं शांख्य' एेसा तारव्य- शकारवाका पाठ भौ वृद्धपरम्परासे सुना जाता है । शांख्य-शंखनामके आदि पुरुषकी सन्तान-दर- सन्तान-पृत्रपौत्रादि (गर्गादित्वात् यन् प्रत्यय करनेपर) शांख्य कही जाती है । इनके दर्शांनको शांख्य या सांख्य कहते हँ । ऋषभ आदि महावीर पयंन्त चौबीस अरहन्त-तीर्थकरोको जिन कहते है । 'जिन'के दशंनको जेन" कहते हँ । इससे यह सूचित होता है किं-चौबीसों ही जिनोका एक ही
१. दीघनिकायादिषु सप्त एव तथागताः स्मृताः । तथाहि-“सप्त तथागताः । तदययथा--विपदयी, रिखी विश्वभूः, क्रकुच्छन्दः, कनकमुनिः, काश्यपः, शाक्यमुनिक्चेति।'--धमंसं ° ए ° २॥ दीघ ° महाप्रदानसुक्त, जाटानारियसुत्त । “बुद्धाः स्युः सप्त ते त्वमी ॥ विपरी रिखी विद्वमूः क्रकुच्छन्ददच काञ्चनः | कारयपदच सप्तमस्तु शाक्यसिहोऽकबान्धवः 1“ अभिधान ° २।१४९-५० । जातकादिषु -अष्टाविशतिवबुंद्धाः संसूचिताः, तथाहि-तण्टंकरो मेधंकरो अथोऽपि सरणंकरो । दीपंकरो च संबुद्धो कौण्डञ्ज्यो दिपदुत्तमो ॥ मंगलो च सुमनो च रेवतो सोभितो मुनी । अनोमदस्सी पद्मो नारदो पद्युत्तरो ॥ सुमेधो च सुजातो च पियदस्सी महायसो । अत्थदस्सी धम्मदस्सी सिद्धत्थो लोकनायको ॥ तिस्सो फुस्सो च संबुद्धो विपस्सी सिखी विस्सभू । ककुसंधो कोणागमणो कस्सपो चापि नायको ॥ एेते अहेसुं संबुद्धा वीतरागा समाहिता । सतर॑सीव उप्पन्ना महातमविनोदना ।॥ जकिन्ता अग्गिखन्दाभ विन्ता ते ससावका' जातक निदानकथा, बुद्धवंसो पि० २७। २. “न्यायः पञ्चावयववाक्यादिः तं वेत्त्यधीते वा नेयायिकः। --भमिधान० ३।५२६ । ३. “'पञ्चर्विंशतेस्तत्त्वानां संख्यानं संख्या, तदधिकृत्य कृतं शास्त्रं सांख्यं . तद्रेत्ति अधीते वा सांख्यः” अमिधान ० ३।५२६ । “सांख्यं संख्यात्मकत्वाच्च . कपिलादिभिरुच्यते 1" मारस्यपु° अ० ३ । “अस्य च सांख्यसंज्ञा सान्वया-संख्यां प्रकूवते चेव प्रकृति च प्रचक्षते । तत्त्वानि च चतु्विशत् तेन सांख्याः प्रकीतिताः ॥ इत्यादिभ्यः भारतादिवाक्येम्यः । संख्या सम्यगविवेकेन आत्म- कथनमित्यर्थः; ।'"--सांख्यध्र ° प° ५। ४, संख~म० २ । ५. "गगदिर्य॑न्"" -- हेम ° ६।१.४२ ।
३६ षड्दरानसमुच्चये [ का० ४. इ ४३ -
वेदितं भवति । 'नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विेषा एव वैडेषिकं, विनयादिभ्थ इति स्वाथं इकण् । तद्रेलेषिकं विदन्त्यघीयते वा, ““तद्रेतत्यधीते” [हैम० ६।२] इत्यणि वैदोषिकास्तेषामिदं वेरोषिकम् । जैमिनिराद्यः पुरुषविशेषस्तस्येदं . मतं जंमिनीयं मीमांसकापरनामकम् । तथाहान्दश्च कारश्च समुच्चयार्थौ । एवमन्यत्राप्यवसेयम् । अमूनि षडपि दर्शनानां नामानि । अहो इति शिष्यामन्त्रणे । आमन्त्रणं च रिष्पराणां चितव्यासद्ध्याजनेन श्ास्त्रश्नवणायाभिमूुखीकरणाथंमनत्रोपन्यस्तम् ।\३॥
8 ४३. अथ यथोदेशस्तथा निदेश इति न्यायादादौ बौदढधमतमाचष्े-- तत्र बौद्धमते तावदेवना सुगतः किर । चतुर्णामायसत्यानांः दुःखादीनां प्ररूपकः ॥४॥
§ ४४. तत्रशब्दो निर्घारणाथंः, तावच्छब्दोऽवधारणे ! तेषु दइनिष्वपराणि द्ंनानि ताव- तिष्ठन्तु, बौद्धमतमेव प्रथमं निधर्िच्यत इत्यर्थः । अत्र चादौ बौद्धदहंनोपलक्षणार्थं मुग्धशिष्यानु-
दशन. था गौर वह् था जेनदशंन । इनमें परस्पर कू भी मतभेद नहीं था । विरोष नित्यद्रन्धसें रहते हँ तथा अन्त्य हैँ । अन्त्य-जगतुके विनाश तथा प्रारम्भकालमें रहनेवारे परमाण, मक्त आत्मा तथा मुक्त आत्माओकर पण्ड मन “अन्त्य' कहे जाते हैँ । इनमे रहनेके कारण विशेषोंको अन्त्य कंहते है । विदोषको ही (विनयादिभ्यः स्वार्थ॑मे इकण् प्रत्यय करनेपर) वैरोपिक कहते है 1 इस वशेषिक अर्थात् विरेष पदाथंको जो जानें अथवा अध्ययन करे (तद्व्यधीते : इस सूत्रसे अण प्रत्यय करनेपर) उन्हे वैशेषिक कहते ह । वैरेषिकोके दश्ञंनको वैरोषिक कहते हैँ 1 जेभिनि नामके माद्य आच्रायं हृए हँ" उनके मतको जैमिनीय मत कहते हैँ । इसे मीमांसक भी कहते हैँ 1 श्लोकमें तथा" शब्द आर ;च' शब्द समुच्चयाथंक ह । अहो" शब्दका प्रयोग शिष्यके आमन्त्रणके लिए किया गया है । रिष्योके चित्तको दूसरे विषयोसे हटाकर चास्त्र॒सुननेकी ओर उपयुक्त करनेको आमन्त्रण किया गया है ॥३॥ | $ ४२. जिंसं रमसे नाम निर्देश किया गया हो उसी क्रमसे उनका लक्षण ओर विवेचन करना चाहिए" इस नियमके अनुसार आदिमे निदिष्ट बौद्धमतका वणन करते ह-- बौद्धमतमे दुःख, समुदय, निरोध ओर मागं इन चार आयंसत्योके उपदेश देनेवाे सुगत- देवता है ॥४॥ | § ४४. रलोकमें निर्धारण अथंमे "तत्र शब्दका ओर अवधारण अथंमें 'तावत्' शब्दका प्रयोग किया है । अतः छो दशंनोमे-से अन्य दर्शनोको विवक्षा नहीं करके केवल बौद्धदर्शान ही
१. “नित्यद्रव्यवृत्तयोऽत्र विरोषाः ते प्रयोजनमस्य वैरोषिकं रास्त्रं तद् वेत्ति अधीते वा वैरोषिकाः | --भमिघान ० ३।५२६ । “द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे। यस्यन स्खलिता बद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥” --सवंद० ओ० प° २२०। २. ““““"यदिदं चतुल्लं अरियसच्चानं आचिक्छना देसना पञ्बपना पटुपना विवरणा विभजना उत्तानिकम्मं । कतमेसं चतुत्नं ? दुक्खस्स अरियसच्चस्स दुक्लसमुदयस्स अरियसच्चस्स, दुक्लनिरोधस्स अरियसच्चस्स, दुक्लनिरोघगामिनिया परटिपदाय अरियसच्चस्स 1" --मज्क्षिम ° सच्वविमंग० । संयु ° ५।४२५-२६ । विनय ०ङ्खदूहाव्रग्ग । विषुद्धि० १६।१३। “चत्वार्ययंसत्यानि । त्यथा--दुःखं समुदयो निरोधो मार्गश्चेति ।'* --घर्मतं० प° ५ । ““सत्यान्युक्तानि चत्वारि दुःखं समुदयस्तथा । निरोधो मार्गं एतेषां यथाभिसमयं क्रमः ॥"* --अमिध० ६३ ! “श्राधात्मक दुःखमिदं प्रसक्तं दुःखस्य हेतुः प्रभवात्मकोऽयम् । दुःखक्षयो निःसरणात्मकोऽयं त्राणात्मकोऽयं प्रशमाय मार्गः.॥ दत्या्यसत्यानि““” --सीन्दुर० १६१४ । प्रमाणवा० १।१७८ ।
अशि
~ का० ४. ई ४५ ] बौद्धमतम् । ३७ ग्रहाय बौद्धानां लिङ्धवेषाचारादिस्वरूपं प्रदङ्येते । चमरो मौण्डयं कृत्तिः कमण्डलु लिङ्गम् ।
'्धातुरक्तमागुल्फं परिधानं वेषः । शौचक्रिया बह्वी | _ “मुद्ध शय्या प्रातरुत्थाय पेया भक्त मध्ये पानकं चापरा | द्राक्नाखण्डं शकरा चार्धरात्रे मोक्नरचान्ते शाक्यूत्रेण दृष्टः ॥१॥। › मणुन्नं भोयणं भुच्चा मणुन्नं सयणासणं । | मणुन्नम्मि अगारम्मि मणुन्नं ज्लायए-मुणी 11२1" | ६ ४५. भिक्षायां पात्रे पतितं सवं शुद्धमिति मन्वाना “मांसमपि भुञ्जते । मागें च जीव- दयार्थं 'प्रमृजन्तो ब्रजन्ति । ब्रह्मचर्यादि स्वकीयक्रियाथां च भृशं दृढतमा भवन्ति । इत्थादिराचारः । घमंबुद्धसङ्करूपं -रत्नत्रथम् 1 ˆ तारादेवी ज्ासने विष्ननाशिनी । विपरयादयः सप्त ` बुद्धाः कण्ठ रेखाच्रयाङ्धिताः सवंज्ञा देवाः । “ बुद्धस्तु सुगतो ध्ंधातुः" [अभिधान ० २।१४६] इत्यादीनि 'तल्ला-
प्रथम विवक्षित है1 मुग्ध शिष्यको इस बौद्धद्शनका स्युरु परिचय करानेके लिए सबसे पहले नौद्धोके किग--वेष ओर आचार आदिका स्वरूप बताया जाता है 1 चमर धारण करना, मुण्डन करना, चमंका आसन ओर कमण्डलु ये बौद्धोके लिग हैँ। धातुसे रंगा हुआ घुटने तकका वस्त्र इनका वेष है । शौच क्रिया तो अनेक प्रकारसे की जाती है |
“कोमर शय्या, प्रातः तिस्तरसे उठते ही दुग्ध आदिका पान, मध्याह्लमे भोजन, सायंकाक फिर शरबत, आधी रात्रिके समय दाखे. ओर मिश्रो, इस समस्त सुखोपभोगके बाद भी अन्तमें मोक्षको प्राप्नि 1 ये सव बातें शाक्यपुव् बुद्धके ही अनुभवकी ॥१॥ |
“मनोज्ञ स्वादु भोजन करके मनोज्ञ---युन्दर मकानमें मनोज्ञ--कोमलक शय्या ओरं मनोज्ञ आसनपर सोने ओर बैठनेसे सुनि मनोज्ञका ही ध्यान करेगा ॥२॥ ` |
$ ४५. बोद्ध भिक्षु भिक्लाके समय पात्रमे जो भी आ जाये वह् सब शुद्ध है" ेसा मानकर पात्रमे आये हुए मांसकोभीखादर्ेते है मागमे चरते समय जीवोकी दयाकि लिए देख-भाककर माजन करके गमन करते हँ । अपने ब्रह्मचयं आदि ब्रतोकी रक्षा तथा उनके पालनमें अत्यन्त दुढ़ होते ह । इत्यादि इनका आचार दै । धमं, बुद्ध ओर .संव ये तीन रत्नत्रय है । तारादेवी इनकी
१. केसमस्सुं ओहारित्वा"--विनय ° मडावःग । २. बौद्धमते काषायवस्त्रपरिधानं विहितम्, “कासावानि परिधापित्वा' ` ` “--विनय ° महार्ग । "काषायवासाः स बभौ "बुद्ध च० ५ ०।१५। “अनुजानामि भिक्खवे छ रजनानि-मूररजनं खन्धरजनं तचरजनं पत्तरजन पुप्फरजनं फररजनं'” विनय ० महावग्य ८।१३।२० । ३. उद्ृतोऽयम् --सूत्र° शौ ० ३।४ । ४. उद्ृतेयम् --सन्र° शी० ३।४ । छाया- मनोज्ञं भोजनं भुक्त्वा मनोज्ञे शयनासने । मनोज्ञे अगारे मनोज्ञं ध्यायेन्मुनिः ॥" ५. “अनुजानामि भिक्लवे, तिकोटिपरिसुदधं मंसं अदिं असुतं अपरिसंकितं च ।'” --विनय० महावग्ग ६।१३।३५ । मञ्क्षम ° जीवकसु° २।१।५। ६. “"भिक्खु अन्तरघरं पवि कीर्थि पटिपन्नो ओव्िखित्तचक्खु युगमत्त- दस्सावी संतो गच्छति, न हत्थिं ओलोकेन्तो, न अस्सं, न रथं, न पत्ति, न इत्थं, न पुरिसं ओलोकेन्तो, न उद्धं उल्कोकेन्तो, न अधो ओलोकेन्तो, न दिसाविदिसं पेक्वमानो गच्छति [ महानिदेस ४७४ ]* --विषुद्धि० प° १३ । ““अलोलचक्षुयुंगमात्रदर्शी निवृत्तवाग्यन्त्रितमन्दगामी । चचार भिक्षां ख तु भिक्षुवर्यो निधाय गात्राणि चरं च चेतः ॥"” बुद्धच० १०।११ । ७. -द्विषु क्रियायां च-भ० २। ८. ` तत्र प्रथमं तावत् त्रीणि रत्नानि । तद्यथा बुद्धो ध्मः संघदचेति 1” --धमसं° प° १। ९ ““““तारिण्यापच्छरण्ये" *`”' इत्यादि तारास्तवनं सखग्धरास्तोत्रे द्रष्टम् । १०. महाग्युत्पन्ती तथागतस्य बुद्ध-भगवान्-तथागत-अर्हन्-सम्यकसंबुद्ध-विद्याचरणसम्पच्नादीनि एकाशीति नामानि लिखि तानि विन्ते । “सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथ।गतःˆ ˆ” -अमर० १।१३ । “बुद्धस्तु सुगतो धरमम॑धातुस्त्रिकारुविग्जिनः । बोधिसत्वो महार्बोधिरायंः शास्ता तथागतः ॥'" अभिधान ° २।१४६ ।
३८ षड्दशंनसमुच्चये [ का० ४. § ४६ -
मानि । तेषां प्रासादा वर्तृका बुद्धाण्डकसंज्ञाः। भिक्ुसौगतशाक्यशौद्धो दनिसुगतताथागतदन्य- वादिनामानो बौद्धाः । तेषां शौद्धोदनिधमेत्तिराचंट धमंकोतिप्रज्ञाकरदिग्नागप्रमुखा ग्रन्थकारा गुरवः।
§ ४६. अथ प्रस्तुतरलोकोऽग्रतो व्याख्यायते । बौद्धमते बोद्धदशंने सुगतो बुद्धो देवता देवः । किठेत्याप्तप्रवदे । कोदु्ः सः । चतुर्णामित्थादि । आराद् दुराद्याताः सवंहेयघ्मेभ्य इत्यार्याः, पृषो- दरादित्वाद्रूपनिष्पत्तिः। सतां साधूनां पदार्थानां वा यथासंभवं मुक्तिप्रापकत्वेन यथावस्थितवस्तु - स्वरूपचिन्तनेन च हितानि सत्यानि । अथवा सद्भ्यो हितानि सत्यानि । आर्याणां सत्यानि -आयं- सत्यानि तेषामायंसत्याना मित्यर्थः । चतुर्णा दुःखादीनां दुःखसमुदयमागंनिरोधलक्षणानां तत्त्वानां -श्रहूपको देकः । तत्र "दुःखं फलभूताः पव्वोपादानस्कन्धा विज्ञानादयो वक्ष्यमाणाः । त एव
[कि ए 1
शासनदेवता है, यह समस्त विष्नोका ना करनेवाखी है । विपदयी आदि सात बुद्धदेव दहँजो
सर्व॑ हैँ ओर उनके कण्ठमें तीन रेखाएं होतो दँ । सुगतको बुद्ध कहते हैँ । धर्म॑धातु आदि बुद्धके ही पर्याथरवा वक नाम.) इनके प्रासाद-स्तुप गोल होते हैँ ओर उन्हँं 'बुद्धाण्डक' कहते है । बौद्धोको भिक्षु, सौगत, शक्यः. शौद्धोदनि, सुगत, तथागत तथा शून्यवादी आदि भी कहते हैँ । इनके शौद्धोदनि धर्मोत्तर, अचंट, धम॑कोत्ति, प्रज्ञाकर, दिग्नाग जादि प्रमुख ग्रन्थकार गुर हए हैँ । $ ४६. रखोकाथं-बौद्धमतमे बुद्ध ही देव हँ । "किक" शब्दसे आप्त प्रवादकी सूचना है] ये दुःखादि चार आय॑स्थोका उपदेश देते हँ । आर्यं शब्द पृषोदरादिगणमें पठित होनेसे सिद्ध है । जो-सभी हेयधमसि किनाराकशो कर गये हँ अर्थात् दूर हो गये हँ उन्हें आर्यं कहते हैँ । जिसके दवारा साधुओको मुक्तिक प्राप्ति होती है अथवा जिखके द्वारा समस्त पदा्थोकि स्वरूपका यथार्थं चिन्तन होता है, या जो सत्युरुषोको हितकारक है वह् सत्य है । आयकि चार सत्य होते है-- दुःख, समुदय, निरोध ओर मागं । बुद्ध इन्हीं चार आयंसत्योके आद्य उपदेष्टा हैँ । रूप, वेदना, संज्ञा, ` संस्कार ओर विज्ञान इन पाँच विपाकरूप उपादान स्कन्ध ही दुःख हैँ । जिससे एचस्कन्ध-
१. दनिसुतताथा-प० १,. २, भ० १, २, क०। २. वस्तुरूषप-आ०, क०। ३. यस्मा पनेतानि ` बुद्धादयो अरिया पटिविन्जन्ति तस्मा अरियसच्चानी ति वृच्चन्ति । यथाह--""चत्तारिमानि, भिक्खवं अरियक्तच्चानि । कतमानि" पे"""“इमानि खो, भिक्छवे चत्तारि अरियसच्चानि" [ सं ० ५।७२.५-२६ | जरिया इमानि पटि विज्ज्न्ति तस्मा अरियसच्चानी ति वुच्चन्ति। अपि च, अरियस्स सच्चानी ति वि अरियसच्चानि । ययाह--“सदेवके भिक्छवे, रोके" " "पे" मनुस्या तथागतो अरियो, तस्मा अरिय- सच्चानीति वृच्चन्ती ति [ क्षं° ५।४३५ ] अथवा एतेसं अभिसम्बुद्धता अरियभावसिद्धितोऽपि अरियसच्चानि । यथाह-“इमेसं खो, भिक्खवे, चतुन्नं अरियसच्चानं यथाभूतं अभिसम्बुद्धत्ता तथागतो अरहं सम्मासम्बुद्धो ति वृच्चती"" ति [ सं ५।४३३ ] अपि च खो पन, अरियानि सच्चानीति पि अरियसच्चानि । अरियानी ति अवितथानि । अविसंवादकानोति अत्थो । यथाह--““इमानि खो भिक्खवे चत्तारि अरियसच्चानि. तथाति. अवितथानि अनज्जथानि तस्मा अरियसच्चानी ति वुच्चन्ती" ति [ सं० ५।४३५ ] --विसुद्धि० १९।२०-२?॥ बाधात्मक दुःखमिदं प्रसक्तं दुःखस्य हेतुः प्रभवा- त्मकोऽयम् । दृःखक्षयो निःसरणात्मकोऽयं त्राणात्मकोऽयं प्रशमाय मागः सौन्दर० १६।४॥ ३. “आर्याणामेव तत्सत्यमिति कृत्वा आय सत्यमिति व्यवस्थाप्यते ।'* माध्यमिक च्° परू ४७ ६.। ४. निरूपकः--म० २1 ५. “इह हि पृ वंहेतुजनिता प्रतीत्यसमुत्पन्नाः पञ्चोपादानस्कन्ाः दुःखदुःखतया विपरिणामदुःखतया संम्कारदुःखतया च प्रतिकूलवतित्वाच्च पीडात्मकत्वेन दुःखमित्युच्यते 1" --माध्यभिक० ० ° ४७\। “दु इति अयं सदौ कुच्छिते दिस्सति । कुच्छितं हि पृक्तं दपुत्तो ति वदन्ति । ख-सदो पन तुच्छे । तुच्छं हि आकासं खं ति वृच्चति । इदं च परमं सच्चं कुच्छितं अनेक- उपहुवाधिद्ानतो, तुच्छं बालजनपरिकप्ित-धुवसुभयुखत्तभावविरहिततो, तस्मा कुच्छितत्ता तुच्छता च दुक्खं ति वुच्चति ।“ विसुद्धि° १६।१५६।
~ का० ४. § ४७ ] बौद्धमतम् 1 | ३९
तुष्णासहाया हेतुभूताः समुदयः , समुदेति स्कन्धपञ्चकलक्षणं दुःखमस्मादिति ब्युत्पत्तितः । निरोष- हेतुनैरात्म्याद्याकारश्ित्तविेषो भागंः* । मागंग् अन्वेषणे, माग्येतेऽन्विष्यतेः याच्यते निरोधाथि- भिरिति चुरादिणिजन्तत्वेनाल्प्रत्ययः । निःक्लेशावस्था चित्तस्य निरोधः. । निरुध्यते रागद्वेषोपहत- चित्तलक्षणः संसारोऽनेनेति करणे धनि, मुक्तिरित्यथः । § ४७. दुःखादीनामित्यत्रादिश्ब्दोऽनेकार्थोऽपि व्यवस्थार्थो मन्तव्यः । यदुक्तम्- “सामीप्ये च व्यवस्थायां परकारेऽवयवे तथा । चतुष्वर्थेषु मेधावी आदिशब्दं तु लक्षयेत्* 1111" तत्रादिद्ाब्दः सामीप्ये थथा ग्रामादौ घोष इति, व्यवस्थायां यथा ब्राह्मणादयो वर्णां इति, प्रकारे यथा आढचाः देवदत्ताद्य इति देवदत्तसदृशा आढचा* इत्यथः, अवयवे यथा स्तम्भादयो गृहा
रूप दुःख उत्पन्न होता है उसे समुदय कहते हँ । अतएव ये ही पांच स्कन्ध तृष्णाके सहकारसे जब नवीन स्कन्धोको उत्पत्तिमे हेतु होते हैँ तब समुदय कहकाते हँ ! निरोध निर्वाणके इच्छक मुमुस्ु जिसे द् ढते हं जिसको याचना करते हैँ वह् मागं है 1! ( अन्वेषणाथंक मागण घातुसे चुरादिगणीय णिच् प्रत्ययके बाद अल् प्रत्यय करनेपर मागं शब्द सिद्ध होता है) निरोधमें हेतुभूत नैरात्म्यादि भावना रूपसे परिणत चित्तविशेष ही मागं कहलाता है 1 ये नैरात्म्यादि भावनां ही निर्वाणमें कारण होनेसे मागं कही जाती हैँ । चित्तकी कंशरहित अवस्थाको निरोध- निर्वाण कट्ते हँ । राग-देष आदिसे विक्रत चित्तरूपी संसार जिससे नष्टं किया जाता है व्ह निरोध अर्थात् मुक्ति है । ( करणाथंक घन् प्रत्यय करनेपर निरोध शब्द सिद्ध होता है ) ।
$ ४७. यद्यपि अदि" शब्दके अनेक अथं होते हैँ फिर भी षदुःखादीनाम्' यहाँ (आदिः रब्दका व्यवस्थारूप अथं विवक्षित है । कहा भी है-
“विद्रज्जन समीपता, व्यवस्था, प्रकार ओर अवयव इन चार अर्थोमिं आदि" -शब्दका प्रयोग . मानते हँ ।।१।।* यथा, श्रामादौ घोषः-गांवके पास ज्ञोपड़ा है" इस वाक्यमें आदि शब्द समीपा्थंक है । ब्राह्मणादयो वर्णाः-वणोमिं ब्राह्मण आदि अर्थात् प्रथम है" यहाँ आदि शब्दका व्यवस्था अर्थात् प्रथम अथं होता है । "माद्या देवदत्तादयः-देवदत्त जैसे धनवान् है यहां आदि शब्द प्रकारवाची है । “स्तम्भादयो गृहाः-खम्भे आदि अवयव ही घर है यहाँ आदि शब्द अवयव
१. “सं इति च अयं सहो, समागमो समेतति आदिसु संयोगं दीपेति । उ इति अथं, उपपन्नं उदितं ति आदिसु उप्पत्तिं । अयसो कारणं दीपेति । इदजञ्चापि दुतियसच्चं अवसेसपच्चयसमायोगे सतति दुक्लस्सुप्पत्तिकारणं । इति दृक्लस्स संयोगे उप्पत्तिकारणत्ता दुक्खसमुदयं ति वुच्चति ।'* - वि बुद्धि १६।१० । “यतो हि हेतोदुःखं समुदेति समुत्पद्यते स ॒हैतुः तृष्णाकर्मक्छेशलक्षणः समुदय इत्युच्यते ॥1'". ` माध्यमिक ° प° ४७६ । २. “चतुत्थसच्चं पन, यस्मा एतं दुक्डनिरोधं गच्छति आरम्भणवसेन तदभिमुखभूतत्ता पटिपदा च होति दुक्छनिरोधप्पत्तिया, तस्मां दुक्खनि रोघगामिनिपटिपदा ति वुच्चति ।** विसुद्धि° १६।१९. ““दुःखनिरोधगामिनी आर्याष्टाङ्गमार्गानुणमा प्रतिपत् ` `" माध्यमि स्चरू° पू ° ४७७ । ३. वाच्यते भ° २। ४. ““ततियस्षच्चं पन, यस्मा नि-सहो अभावं, रोध-सहो च चारकं दीपेति, तस्मा अभावो एत्थ संसारचारकसङ्खातस्स दुक्खरोधस्स सब्वगतिसुञ्जता, समधिगते वा तस्मिं संसार- चारकसङ्खातस्स दुक्वरोधस्स अभावो होति तप्पदिपक्खत्ता ति पि दुक्वनिरोधं ति वुच्चति । दुक्खस्स वा अनुप्पादनिरोधपच्चयता दुक्वनिरोधं ति 1" --विसुद्धि° १६।१८ । "दुःखस्य च विगमोऽपुनरत्पादो निरोध इत्युच्यते ।'" --माध्यमिङ्बरु° प° ४७७ । ५. इलोकोऽयं शब्द्कत्पदुमकोशे आदिशब्द- निरूपणावसरे समुदृतः.। ६. आढय। इति देवदत्ता- आ० । ७. आढचादय इत्यथः भ° २।
४० षड्दशंनसमुच्चये [ का० ५. § ४८ -
` इति \ अत्र तु ग्वस्था्थैः संगच्छते । दुःखभादि श्रयमं येषां तानि तथा- तेषामिति बहुत्रीहिः ॥\८॥ § ४८. अथ दुःखतत्त्वं व्याचिख्यासुराह- ` दुःखं संसारिणः स्कन्धास्ते च पञ्च प्रकरतिताः । विज्ञानं वेदना संज्ञा संसरि रूपमेव च ॥५॥ § ४२. दुःखं ईःखतत्वं किमित्याह । संसरन्ति. स्थानात्स्थानान्तरं ` भवाद् भवान्तरं वा गच्छन्तीत्येवंशीलाः संसारिणः स्कन्धाः सचेतना अचेतनां वा परमाणुप्रचयविशेषाः । ते च स्कन्धाः वाक्यस्य सावधारणत्वात्पञ्चवाख्याताः, न त्वपरः .कश्चिदात्माख्यः स्कन्धोऽस्तीति । के ते स्कन्धाः । ` पञ्च प्रकोतित। । इत्थाह-विज्ञानम् इत्ादि ! विज्ञानस्कन्धः, वेदनास्कन्धः, संज्ञास्कन्धः, संस्कार- स्कन्धः, रूपस्कन्धश्च । एवज्ञब्दः पुरणाथ, चक्ञ्दः समुच्चये ! तत्र र्पविज्ञानं रसविज्ञानमित्थादि ` निविकल्पकं विज्ञानं विरि्टलानं विज्ञानस्कन्धः । निविकल्पकं च ज्ञानमेवंरूपमवसेयम्- अस्ति शद्यालोचनाज्ञानं प्रथमं निविकल्पकम् । बालमूकादिविन्ञानसदृशं शुद्धवस्तुजग् 11१11" [मी० रखो° प्रत्य ° ११२] इति ॥
अर्थ॑में प्रयुक्त हुआ है । दुःखादीनाम्' यहाँ आदि शब्द व्यवस्थावाची है । अर्थात् चार आयंसत्योमें दुःख नामका आययंसत्य प्रथम है ॥२॥ | § ४८. अब दुःखततत्वका स्वरूम कहते ह-- | संसारी स्कन्ध ही दुःख हैँ । ओर विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार ओर रूप ये पांच स्कन्ध कहे गये है ॥५॥ | § ४९, सचेतन ओर अचेतन परमाणुओकं प्रवयको स्कन्ध कहते हैँ । स्कन्ध पांच ही होते है । इन पाच स्कन्धोसे भिन्न कोई आत्मा नामका छठवां स्कन्ध नहीं है । अर्थात् नाम-रूपात्मक इन्हीं पाँ ब स्कन्वोमे आत्माका व्यवह्।र होता है । यही पाच स्कन्ध एक स्थानसे दूसरे स्थानको तथा एक भवसे भवान्तरको जाते हैँ अतः संसरणधर्मा होनेसे संसारीहै1 इन्हीं संसारो पांच- स्कन्धोको दुःखस्य कहते हैँ । वे स्कन्ध पाँच र्है--विज्ञानस्कन्ध, वेदनास्कन्ध, संज्ञास्कन्ध संस्कारस्कन्ध ओर रूपस्कन्ध । रलोकमें एव शब्द पादपुतिकं किए ओर च राव्द समुच्चयार्थक है । रूप रसादि विषयक निविकल्पक ज्ञानोंको विज्ञानस्कन्ध कहते हँ । वि अर्थात् विशिष्ठ ज्ञान विज्ञानस्कन्ध है । निविकल्पक ज्ञानका स्वरूप इनन प्रकार बताया है-- “सबसे पहले निविकल्पक आलोचनाज्ञान होता है । यह मृक बच्चों आदिके विज्ञानकी तरह् शुद्ध वस्तुसे. उत्पन्न होता दै ॥१॥"
१. प्रधानं भ० २। २. कतमञ्च भिक्लवे दुक्खं अरियसच्चं । जाति पि दुक्खा, जरापि दृव्खा मरणम्पि दुक्खं, सोक-परिदेवदुक्लदोमनस्सूपायासापि दुका, अप्पियेहि सम्पयोगो दुक्खो, पियेहि विप्ययोगो . दुक्लो, यस्पिच्छं न कभति तम्पि दुक्खं, सद्त्तेन पञ्चूपादानक्खन्धापि दुक्खा ।' ` --दोरऽ महासतिषटान० । [विभंग० ९९] चिसुद्धि० १६।३१ । “एत्थ हि बाधनलक्छणं दुक्खसच्चं, ` सन्तापनरसं, पवत्तिपच्चुष्पद्वानं 1" --विसुद्धि० १६।२३ । “सङ्ित्तेन पञ्चुपादानक्खंधा दुक्लानि । , --षिसद्धि० १६।५७ । “दुःखं संसारिणः स्कन्धाः --प्रमाणवा० १।१४९॥। ३. इतः प्रभृति
बष्टमरलोकान्तं यावत् सार्धं श्लोकत्रयं आदिपुराणे ( ५।४२-८५ ) विवेकविखासे ( ८।२६८-७० ) च वर्क 4 द्रष्टव्यम् --सवंद० सं० एर ४६। ४. न्तरंग-भ० २।५. -नारच पर-म० २। ६. “विज्ञानं - श्रंतिविज्ञसिः 1" --अभिध्र° १।१६ । “किञ्चि विजाननक्क्खणं सव्वं तं एकतो कत्वा विज्जाणक्खंधो
वैदिततव्वो ति हि वृन्चं' ` “विजानाति विजानाती खो आवुसो तस्मा विज्ञाणं ति वुच्चती' ति
[ म० १।२९२ ] --विसुद्धि° १४।८? । ७. चालोचनं( न )ज्ञानं आ० ।
~ का० ५§ ५३ ] बौद्धमतम् 1 ४१
§ ५०. सुखा वुःखा अदुःखसुखाः चेति वेदना स्वेदनास्कन्धः । वेदना हि पूवंकृतकमंविपा-
कतो जायते । तथा च सुगतः कदाचिख्ड्शामटाटच्यमानः कण्टकेन खरणे .विद्धः प्राह- ^८इत एकनवते कल्पे शक्त्या मे पुरुषो हतः । तत्कर्मणो विपाकेन पादे विद्धोऽस्मि भिक्षवः ॥'" इति ॥
§ ५१. संजानिमित्तोदश्रहणात्मकः प्रत्ययः -संजञास्कन्धः। तत्र संज्ञा गौरित्यादिका' गोत्वादिकं च `तत्परवुत्तिनिमित्तम्, तयोख्दृग्रहणा योजना, तदात्मकः प्रत्ययो नामजात्यादियोजनात्मक सवि- कल्पक जानं संजञास्कन्ध इत्यर्थः ।
§ ५२. पुष्यापुण्यादिधमंसमुदायः °संस्कारस्कन्धः, यस्य संस्कारस्य प्रबोधात्पर्वानुभूते विषये स्मरणादि समूत्पद्यते ।
$ ५३. पथिवीधात्वादयो रूपादयश्च रूपस्कन्धः ।
९ ५०. सुखरूप, दुःखरूप ओर असुखदुःखरूप-जिसे न सुखरूप ही कह सक्ते हैं ओर न दुःखरूपं हो-वेदना-अनुभवको वेदनास्कन्ध कहते हँ 1 पूवंकृत कर्मके परिपाकसे कमके फलकी सुखादिरूपसे वेदना होती है 1 एक बार जब स्वयं सुगत भिक्षाके लिए जा रहे थे तब उनके पेरमें एक कांटा गड़ गया । उस समय उन्होने कहा था कि-
“ह भिक्षुजो, आजसे एकानबेवें कल्पमे मेने राक्ति-छुरीसे एकं पुरूषका वध क्या था 1 ` उसी कमंके विपाकसे आज मेरे पैरमें काटा र्गा है ।'` इति 1
§ ५१. जिन प्रत्ययोमें शब्दोके प्रवृत्तिनिमित्तोकी उदग्रहणा अर्थात् योजना हो जाती है उन सविकल्पक प्रत्ययोको संज्ञास्कन्ध कहते हँ । गौ, अरव इत्यादि संज्ञा हैँ । ये संज्ञाएँ वस्तुके सामान्यधमको निमित्त बनाकर व्यवहारमे आती है, जेसे गौ संज्ञा गोत्वरूपसामान्यधमं ज्हा-जहं होगा वर्हा-वहाँ प्रवृत्त होगी । इसीलिए गोत्व आदि सामान्य गो आदि संज्ञाओंकं प्रवृत्तिनिमित्त
: कहे जाते हैँ । गो आदि संज्ञाओंका अपने प्रवृत्तिनिमित्तोकं साथ उदृग्रहुणा-योजना,करनेवाला
सविकल्पके प्रत्यय संज्ञास्कन्ध है । अर्थात् नाम जाति. आदिकी योजना करके यह भौ है, यह अइव है" इत्यादि ग्यवहारका प्रयोजक सविकल्पकन्ञान संज्ञास्कन्ध कहकाता है । | § ५२. पुण्य पाप आदि धर्मोकि समुदायको संस्कारस्कन्ध कहते है । इसी संस्कारके प्रबोधसे पहले जाने गये पदाथंका स्मरण, प्रत्यभिज्ञान आदि होते है । $ ५३. पृथिवी आदि धातुं तथा रूपादि विषय रूपस्कन्ध कहर्ते ह । .
१. वेति प० १, २, भ० २। २. “वेदनाऽनुभवः"-- भसि ० १।१४ । “यं किचि वेदयितलक्खणं सव्वं तं एकतो कत्वा वेदनाक्लंघो वेदितव्वो ति 1"--विषुद्धि° १४।१२५। ३. ““संज्ञा निमित्तोदुग्रहणात्मिका । निमित्तं नीकपीतदीघंहस्वपुरुषस्त्रीशत्रुमित्रशाताशातस्वभावाः, तेषाम् उद्प्रहणं मनसि धारणमेव स्वरूपं संज्ञास्कन्धस्य 1” --भरसिश्र०, टी, १।१४। “यं क्रिचिं संजाननलक्खणं सव्वं तं एकतो कत्वा सञ्जाक्खंधो वेदितव्वो ति । एत्थापि संजाननलक्वणं नाम सञ्जा व ।. यथाह--' संजानाति संजानातीति खो आबुसो तस्मा सञ्जा ति बुष्वती'' ति [ म० १।२९२ ] --चिखुद्धि° ५४।१२९। ४. तत्प्रतिपत्तिनि-क०, आ०, प० १,२, भण १। ५; ~करत्वज्ञानं प० १, २, भ० १,२। ६. ““चर्तुभ्योऽन्ये संस्काराः संस्कारस्कन्धः" --भमिष० १।१५ । चिसुद्धि० १४।१३६१ । ७. “रूपं पञ्चेन्दरियाण्यर्थाः पञ्चाऽविन्ञत्िरेव च 1” अभिध० १।९। "तत्थ यं किचि सीतादीहि रुष्पनलक्खणं धम्मजातं सव्वं तं एकतो कत्वा रूपक्लंधो ति वेदितन्वं । तदेतं सुप्यनलक्छणेन एकविधं पि भूतोपांदाय- भेदतो दुविधं । तत्थ भूतरूपं चतुष्विधं--पथवीधातु आपोधातु तेजोधातुं बायोधातु ति । उपादायसरूपं चतुवीस विधं" " "“ बिसुद्धि० १४।६४-३६। ६
४२ षडदर्शांनसमुच्चये [का०५ § ५४ -
§ ५४. न चैतेभ्यो विज्लानादिभ्यो व्यतिरिक्तः कञ्चनात्माख्यः पदार्थः सुखदुःखेच्छाद्रेवललाना- वारभूतोऽध्यक्षेणावसीयते (` नाप्यनुमानेन; तदन्यभिचारिलिङ्धग्रहणाभावात् । न च प्रत्यक्लानुमान- व्यतिरिक्तमर्थाविसंवादि प्रमाणान्तरमस्तीति। ते च -पव्च स्कन्धाः क्षणमान्नावस्थायिन एवः
* वेदितव्याः, न पुननित्याः, कियत्कालावस्थायिनो वा । एतच्च “क्षणिकाः सवंसंस्काराः'' [का० ७] । इत्यत्र दलयिष्यते 11५1
§ ५५. दुःखत्वं पत्रभेदतयाभिधायाथ दुःखतत्त्वस्य कारणभतं समुदयतत्तवं व्याख्याति-
सष्देति यतो रोके रागादीनां गणोऽखिलः । आस्मात्मीयभावाख्यः -सखपुदयः स उदाहतः ।।६॥
§ ५६. यतो यस्मात्तमुदयाल्लोके लोकमध्ये रागादीनां रागद्धेषादिदोषाणां गणः समवाय अखिल समस्तः समुदेति "समृधवति । कोदुदो गण इत्याह--अआत्मात्मोधभावाख्यः । आत्मा स्वम् आत्मीयः स्वकीयः तथोभविस्तत्त्वम् । आत्मात्मीयभावः “अयमात्मा अयं चात्मीयः' इत्येवं संबन्ध
§ ५४. इन विज्ञान आदि स्कन्धोसे भिन्न, सुख दुःख इच्छा देष ज्ञानादिका आधारभूत आत्मा नामका कोई स्वतन्त्र पदाुथं नहीं हँ । गौर न स्कन्धोसे भिन्न आत्माका प्रत्यक्षसे' ही अनुभव होता है । रसे आत्माके साथ अविनाभाव रखनेवाखा कोई निदंषि ल्ग भी नहीं है जिससे अनुमानके ढारा आत्माकी सिद्धि की जाये } प्रत्यक्ष ओर अनुमानये दोही अविसंवादी प्रमाण है । इनसे भिन्न कोई तीसरा प्रमाण नहीं है। ये पाचों स्कन्ध क्णक है, एक क्षण तक ही ठहरते है ओर दूसरे क्षणमें विनष्ट हो जते है । ये स्कन्ध न तो कूटस्थनित्य-सदा-एकरूपसे रहनेवाटे ही है मौरन कालान्तर-स्थायी-दो चार क्षण तक ठहरनेवाले-ही हँ । येस्योएक ही क्षण तक ठहरते हैँ ओर दूसरे क्षणमें समल नष्ट हो जाते 1 स्कन्धोकी क्षणिकताका समयेन क्षणिकाः सर्वे संस्काराः” [ का० ७ ] इसमें किया जायेगा ॥॥५॥
§ ५५. इस प्रकार पंचस्कन्धरूप दुःखतत्त्वका वणंन करके अब दुःखतत्त्वके कारणभूत समुदयततत्वका व्याख्यान करते है- ६
जिससे लोकमें नँ हं, यह मेरा है" इत्यादि अहंकार ममकाररूप समस्त रागादिभावोंका <| समुह उत्पन्न होता है उसे समुदय कहते है ।॥६॥ |
§ ५६. जिससे लोकम भें हू, यह् मेरा है, यह पर दहै, यह पराया है' इत्यादि रूपसे अपना | जाल फलानेवाङे राग-दवेषादि दोषसमूह उत्पन्न होते हँ वह् समुदय है । अहंकार ओर ममकार- रूपसे होनेवाला आत्मभाव ओर आत्मीयभाव ही समुदय तत्त्व है । एक जगह अहंकार ओर
१. “"यथा हि अंगसंभारा होति सदो रथो इति । एवं खंधेसु सत्तेसु होति सत्तोति सम्मुति ॥।*” --मिङिन्द० । “नन्वनित्येषु भावेषु कल्पना नामः जायते--यथोपवणितेन न्यायेन स्वरूपसिद्धस्य । स्कन्धव्यतिरिक्तस्यात्मनः सर्वथाऽभावात् । नन्वनित्येषु रूपवेदनासंज्ञासंस्कारविज्ञानास्येषु भावेषु | आत्मेति कल्पना अभूतार्थारोपणं क्रियते आत्मा सत्त्वो जीवो जन्तुरिति । यथाहि इन्धनमुपादायाग्नि
एवं स्कन्धानुपादाय' आत्मा प्रज्ञप्यते । खलतुः्दा० चर० १०।३। “नात्मास्ति स्कन्धमात्रं तु क्टेशकर्मा-
भिसंस्कृतम् । अन्तराभवसंतत्या ` कुलिमेति प्रदीपवत् ॥' -भमिध० ३।१८ । बोधि पं प्र०
४७८ । “स एर्व स्कन्धसमुदायलक्षणः प्रजञतिसन्*“" ` --तसर्वसं ° पण ए० ५३१ २. एवावेद्वित-
भ० २। एवावेत प० १, २, भ०१। ३. “कतमं च भिक्छवे दुक्वसमुदयं अरियसच्चं ? यायं
तण्हा पोनोभविकां नन्दिरागसहगता तत्र तत्राभिनन्दिनी ` सेयथीदं कामतण्हा भवतण्हा विभवतण्हा 1”
--म० नि० महाद्स्थि० । विसुद्धि० १६।६१। ४. उद्वति १० १, २,भ० १२।
- का० ७ § ५८ ] बौद्धमतम् 1 ४३
इत्यथः \ उपलक्षणत्वात् (अयं षरोऽय च परकोयः इत्यादि संबन्धो द्रष्टव्यः! स एवाख्या नाम यस्य स॒ आत्मात्मीयभावाख्यः । अयं भावः-आत्मात्मीयसंबन्धेन परपरकोयादिसंबन्धेन वा यतो रागद्ेषादयः समुद्धवन्ति सः समुदयो नाम तत्वं बौदढमत उदाहतः कथितः\ अच्रोत्तराघं सप्तनवा- क्षरपाददये छन्दोऽन्तरसन्डावाच्छन्दोभङ्कदोषो न चिन्त्यः, आषंत्वात्प्रस्तुतश्शास्त्रस्यः \\६॥
§ ५७. अथ दुःखसमुदथतत््वयोः संसारप्रवुत्तिनिमित्तयोषिपक्षभूते मार्गनिरोधतच्त प्रपञ्चयन्नाह-
लषणिकाः स्वंसस्कारा इत्येवं वासना यका । स॒ मागं इह विज्ञयो ` निरोधो मोक्त उच्यते ॥७॥ $ ५८. परमनिङ्ृष्ट; कालः क्षणः, तत्र भवाः क्षणिकाः“ क्षणमात्रावस्थितयः इत्यर्थः । सवं च ते संस्काराश्च पदार्थाः सवंसंस्राराः क्षणविनश्वराः सें पदार्था इत्यर्थः \ तथा च बौद्धा अभि
दधति--शस्वकारणेभ्यः पदाथं उत्पद्यमानः कि विनश्चरस्वभाव उत्पद्यते । अविनरवरस्वभावो वा 1 यदविनश्वरस्वभावः; तदा तद्वयापिकायाः क्रमयौगपद्याम्यामथं क्रियाया अभ्पवात्पदाथंस्यापि व्याप्य-
ममकार होनेसे अन्यत्र परं ओर परकीय बुद्धि अर्थात् ही उत्पन्न हौ जाती है । तात्पयं यह है कि भिं मेरा पर ओरपराया' इन रूपोमें प्रकट होनेवाले आत्मभाव, आत्मीयभाव, परभाव ओर परकीय- भावोसे ही राग-हेष आदि दोष उत्पन्न होते है । यही भाव बौद्धमतमें समुदय तत्त्व कहे जते हं !
यद्यपि इस श्लोकके उत्तरार्धके एक पादमे सात तथा दूसरे पादमं नव अक्षर हं फिर भौ छन्दभंग नहीं है । क्योकि यह शास्त्र ऋषिप्रणीत होनेसे आषं है । अतः इसके अनुसार सात भौर नव अक्षरवाङे अन्य आ्ष॑छन्दकी प्राचीन परम्परा थी यही मान केना चाहिए ॥१६॥
६ ५७. अब संसारकी प्रवृत्तिमें निमित्तभूत दुःख ओर समुदयतत्त्वके विपक्षी जो मागं ओर निरोधततत्व ह, उनका व्याख्यान करते ह
संसारके सभी संस्कार क्षणिक है इस क्षणिक भावनाको मागंतत्त्व ओर रागादि वासनाओके नाकषको निरोध अर्थात् मोक्ष कहते हैँ ॥५७\
६ ५८. परमनिङ्कष्ट अर्थात् सबसे सूक्ष्म कारको क्षण कहते हैँ । संसारके संभो संस्कार या पदार्थं एक क्षण तक ही रहृते है ओर द्वितीय समयमे वे स्वतः नष्ट हो*जाते हैँ अतएव क्षणिक हैँ पदार्थोको क्षणिक माननेके विषयमे बौद्धोकी विचार सरणी इस प्रकार है-
बौद्ध--जगत्के सभी पदाथं अपने-अपने कारणोंसे उत्पन्न होते हैँ । यह् एक निविवाद वस्तु
है 1 तो अब बताइए कि वे पदाथं अपने कारणोंसे विनइवर स्वभाव लेकर उत्पन्न होते हँ या
[8
१. -दोषा न चिन्त्या: भ० २। २. त्वं शास्त्रस्य भ० २। ३. “अयमेव अरियो अदुगिको मग्गो दुक्लनिरोधगामिनी पटिपदा."*--सं ० नि० । विसुद्धि° १६।६५ 1 ४. “कतमं च भिक्खवे दुक्ल- निरोधं अरियसच्चं ? यो तस्सायेव तण्डाय असेसविरागनि रोघो चागो पटिनिस्सम्मो मुत्ति अनाख्यो ।" दीघ० मह्।सति०--विसुद्धि ° १६।६२ । ५. तत्रेदमुक्तं भगवता--“शक्षणिकाः स्रसंस्कारा अस्थिराणां कुतः क्रिया। भूतिर्थेषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।।"--सश्वस्ं* पं० प° ++ । बरोधिच० परर णर ३७६ । तन्त्रवा० घु० १२० । “उक्तं च-क्षणिकाः सर्वसंस्कारा: विज्ञानमातमेवेदं भोः लजिनपुत्राः यदिदं वरैधातुकम्'” --पन्मति° टी ° प्रु°७६१। ६. ““उत्पादानन्तरास्थायि स्वरूपं यच्च वस्तुनः । तदृच्यते क्षणः सोऽस्ति यस्य ततक्षणिकं मतम् ।॥ तश्वसं° इरो० ३८८ 1 ७, “तथराहि- भावः स्ब्रहेतोरुत्पद्यमानः कदाचित्प्रकृत्या स्वयं नर्व रात्मैवोत्पद्यते, अनश्वरात्मा वाः“ˆअथ अनरद्वरात्मेति पल्लस्तदापि नाराहेतुर किचित्कर एव । तस्य केनचित्स्वभावान्यथाभावस्य कतुंमरक्यत्वात् ।'* --तस्वसं° ० १४० ।
ई
षड्दशंनसमुच्चये [ का० ७ § ५८ -
स्याभावः प्रसजति ! तथाहि--“ यदेवाथंक्रियाकारि तदेव परमार्थसत्” इति \ स च नित्योऽर्योऽथं- न्रियायां प्रवर्तमानः क्रमेण वां प्रवर्तेत, यौगपद्येन वा । न तावत्क्रमेण; यंतो 'त्येकस्था अथंक्रियायाः" करणकाङे तस्यापराथेक्रियायाः करणस्वभावो विद्टते न वा । यदि विद्यते; कतः क्रमेण करोति ! अथ सहकायपेक्षया इति चेत्; तेन सहकारिणा तस्य नित्थस्थ कश्चिदतिङ्ञायः क्रियते न वा!
अविनरवर स्वभाव रेकर ? यदि पदाथं अविनरवर अर्थात् सदास्थायी नित्य स्वभाववाले है; तो नित्यपदाथं क्रम तथा युगपत् दोनो ही प्रकारसे अथ॑क्रिया करनेमे असमथं होनेके कारण असत् ही सिद्ध होता है । क्योकि जो अथंक्रिया करता है वही परमां रूपसे सत् है । अर्थक्रिया ओर गौर पदा्थंकी सत्तामे व्याप्यव्यापकभाव है । अथंक्रिया व्यापक है ओर पदाथंको सत्ता व्याप्य है । अर्थक्रिया क्रमसे होती है या युगपत् । जब नित्यपदाथैमें क्रम ओर युगपत् दोनों ही प्रकारसे अक्रिया नहीं बनती अर्थात् सत्त्वकी व्यापक अथंक्रियाका अभाव है तो व्याप्यभूत सत्ताका अभाव होनेसे अंविनदवर स्वमाववाली वस्तुका भी अभावदहोजतारहै। वह इस प्रकार--जन नित्य पदाथं कोई अथंक्रिया करनेकी तैयारी करता है तब वहु उन अथंक्रिया ओको क्रमसे करता हैया सभीको एक साथ ही कर देता है? नित्य पदाथं समर्थं-स्वभाव- वाका तथा अपरिवतंनशील होता है । उसमे न तो कोई नूतन अतिशय य। स्वभाव उत्पन्न हो सकता है ओर न उसके किंसो विद्यमान स्वभावका विनाश दही हो सकता है! रेस स्थितिमें यदि नित्य पदाथं अपने द्वारा हीनेवारे कार्यको क्रमसे करता है तब, जिस समयः वह् एक कार्यको करता है उस समय उसमें दुसरे तीसरे आदि समयोमें होनेवाली अथंक्रियाओके करनेका स्वभाव है या नहीं ? यदि एक अथंतक्रियाके कालम अन्य अथंक्रियाओके करनेका स्वभाव भी उसमें है; तब विवक्षित अथंक्रियाकी तरह अन्य अथंक्रियाएँ भी उसी समय उत्पन्न हो जानी चाहिए । इस तरह समी अथंक्रियाओकी युगपद् उत्पत्ति होनेपर नित्यम क्रमसे" कायं करना कहाँ सिद्ध हुआ ? नित्यवादी-नित्यमें यदपि सभी अथंक्रिय।ओके करनेके स्वभाव सदा विद्यमान रहते है;
पर जिन-जिन कायकि उस्पादक अन्य सहकारि कारण जब-जब मिरु जाते हैँ नित्य उन्हे तब-तब उत्पन्न कर देता है 1 इस तरह सहकारिकारणोके रमसे, नित्य पदाथं भी क्रमसे अथंक्रिया करता है । सहकारी कारण तो अनित्य है । अतः उनका सन्निधान क्रमसे ही हआ करता है ।
१. “यथा यत् सत् तत् क्षणिकमेव, अक्षणिकत्वेऽथंक्रियाविरोधात् तत्लक्षणवस्तुत्वं हीयते ।** हेतबि० पू० ५९ । ““यदि न सवं सत् कृतकं वा प्रतिक्षणविनाकशि--स्यादक्षणिकस्य क्रमयौगेपदयाभ्यामथंक्रियाऽ- योगादर्थक्रियासामथ्यलक्षणमतो निवृत्तमित्यसदेव स्यात् । सर्वसाम््योपाख्य विरहलक्षणं हि निरुपाख्य- भिति ॥ ° ° यत्र॒ क्रमयौगपद्यायोगो न तस्य क्वचित्सामर्थ्यम्, अस्ति चाक्षणिके स इति प्रवरत्तंमानमसाम- ्यमसल्लक्षणमाकर्षति । तेन य(त्स)त्कृतकं वा तदनित्यमेवेति सिध्यति । तावता साधनधर्ममात्रान्वयः साध्यधर्मस्य स्वभावहेतुलक्षण सिद्धं भवति । -वादन्यायः चू ० ६९ । “क्रमेण युगपच्चापि यस्मादर्थ- क्रिया कृतां । न भवन्ति स्थिरा भावा निःसत्त्वास्ते ततो मताः ॥ कार्याणि हि विम्बन्ते कारणासन्नि- धानतः । समर्थहेतुस द्भावे क्षेपस्तेषां हि किकृतः ॥ अथापि सन्ति नित्यस्य क्रमिणः सहकारिणः । यानपेक्ष्य करोत्येव कार्यग्रामं क्रमाश्रयम् ॥ सष्वेतत्कितु ते तस्य भवन्ति सहकारिणः । कि योग्यरूप-
हितुत्वादेकार्थंकरणेन वा ॥ योग्यरूपस्य हेतुत्वे स भावस्तैः कृतो भवेत् । स चाशक्यक्रियो यस्मात्तत्स्वरूपं तदा स्थितम् ॥ कतौ वा तत्स्वरूपस्य नित्यतास्यावहीयते । विभिन्नोऽतिदायस्तस्मायदयसौ कारकः कथम् ॥” --तस्वसं ० इरो० ३९४-९९। २. “अर्थक्रियासमथं यत् तदत्र परमार्थसत् । अन्यत् संवृतिसत् प्रोक्त; ते स्वसामान्यलक्षणे ॥'” --प्र ° वा० २।३ । “अथक्रियासामर्थ्यसंक्ष णत्वादस्तुनः 1
--ज्यायवि० सू० १।१५। ३. क्रमेण प्रव-आ० । ४. -कस्य अर्थ-क० । ^^. -याः काठ प० १, २, मण १, २। ६. अस्या-नम०।
५१५ |
- का० ७ § ५८ ] | बौद्धमतम् । +|
यदि क्रियते; तदा कि पूर्वस्वभावपरित्यागेन क्रियते, अपरित्यागेन वा ! यदि परित्यागेन; "ततोऽतादवस्थ्यापत्ते रनित्यत्वम् । अथ पु्वस्वभावापरित्यागेन; ततस्तस्य नित्यस्य तत्कृतोपकारा- भावात्कि सहकायपेश्षया कतन्यम् ! अर्थाकिचित्करोऽपि सहकारी तेन विशिष्टकार्याथंमपेक्ष्यते; तदयुक्तम्; यतः- “““अपेक्ष्येत परः करिचदयदि ° कूर्वीत किचन । यदकिचित्करं वस्तु कि कंनचिदपेक्ष्यते 11१॥ [प्र वा० ३।२७९] | अथ तस्य प्रथमार्थंक्रियाकरणकालेऽपराथक्रियाकरणस्वभावो न विदयते; तथा च सति स्पष्टेव नित्यताहानिः । “अथासौ नित्योऽर्यो यौगपद्येनाथंक्रियां कुर्यात्; तथा सति प्रथमक्षण एवारेषार्थ- । क्षणिकवावी--अच्छा › यह् बताओ कि-जब सहकारिकारण नित्यकी सहायता करतेर्है, तब वे नित्यपदा्थमे कुर सामथ्यं या अतिराय भी उत्पन्न करते हैँ या नहीं ? यदि वे नित्यमें कोई नया अतिशय उत्वन्न करते है; तब उस समय नित्यके सदा-स्थायी पूवंस्वभावमे कूर परिवतंन भी होता है किं नहीं ? तात्पयं यहु कि जिस समय सहकारिकारण किसी नये अतिशय या सामथ्यंको लेकर नित्यके सामने उपस्थित होते हँ उस समय नित्य पदाथं उस ॒सामर्यंको ग्रहण करते सम ह जो कि उनमें पहर नहीं थी, अपने पूवं-स्वभाव अर्थात् असमर्थं स्वभावको छोडते हँ या नहीं यदि नित्यने सहकारियो-द्वारया काये गये नये अतिशयको ग्रहण करते समय अपना पूवं असमथं : स्वभाव छोड़ दिया, जिसे छोडे बिना नये स्वभावका ग्रहण . करना सम्भव ही नहीं है; तब पुवं. स्वभावका परित्याग तथा नूतन स्वभावको ग्रहण करनेके कारण नित्यमें काफी परिवत्तंन हो जायगा ओर यह् परिवत्तंन नित्यको सदा स्थायो नित्यरूपमें नहीं रहने देगा, अर्थात् उसे अनित्य बना देगा । यदि नित्य अपने पूर्वकालीन असमथं स्वभावको नहीं छोडता है, तो . इसका स्पष्ट अथं यह् हुआ सहकारिकारणोने नित्यका कुछ भी उपकार नहीं किया अर्थात् उसमें किसी भो नवीन अतिशयकी सृष्टि नहीं की 1 तब नित्यको एसे अकिचित्कर अर्थात् कू भी उपकार नहीं करनेवाले-सहकारियोको अपेक्षा ही क्यों होगी ? जो भोड़ा-बहुत उपकार करता है, या जिससे किसो प्रयोजनकी सिद्धि होती है संसार उसीकी अपेक्षा करता है । निव्यवादी--पद्यपि . सहकारी कारण नित्य पदाथ॑मे कोई नवीन अतिशय उत्पन्न नहीं करते ओर न उसके किसी पूवं स्वभावका विनाश ही करते हँ फिर भी नित्य पदाथं विरि कायंकी उत्पत्तिके निमित्त उन अकिचित्कर सहकारियोकी भी अपेक्षा करता है 1 उन सहकारियोकिे साथ मिलकर नित्य विरिष्ट कार्यको उत्पन्न करतादहै। क्षणिकवादी--आपका तर्कं असंगत है, क्योकि “पर पदार्थ यदि कृ कायं करे या किसी प्रयोजनको साधे तभी उसकी अपेक्षा की जा सकती है । जो अकिचित्कर है, किसी भी मतर्बका नहीं है उस भारभूत पदार्थकी, भला कोई क्यों अपेक्षा करेगा ? उलटे ठेसे निकम्मे पदाथंसे तो लोग बचना ही चाहेगे 1" | यदि नित्यपदा्थंमे प्रथम अथंक्रिया करते समय द्वितीयादि समयोमे होनेवारे कायोकि उत्पादनक्री सामथ्यं नहीं है, ओर द्वितीयादि समयोमे जब उन कार्योको उत्पन्न होना है तब वह् सामथ्यं आ जाती है; तो बताइए उसमें नित्यता कहाँ रही ? क्योकि नित्यमें जो . सामथ्यं प्रथम
१. -भावस्य परि-आ० । .२. ततोऽन्यदवस्थापत्ते-म० २। ३. “अपेक्षेत परः कार्यं यदि विद्यत किचन । प्र° वा० ३।२७९ । ४. करिचत्कुर्वीति यदि कि-म० २। ५. “यौगपचं च नैवेष्टं तत्कार्याणां ्षयेक्षणात् । निःरोषाणि च कार्याणि सकृत्कृत्वा निवत्तते । सामर्थ्यात्मा स ॒चेदाथंः सिद्धाऽस्य क्षणभङ्किता ॥"“-तस्वसं० ४१३-१४। ` न
४६ षड्दशंनसमुच्चये [ का० ७ § ५९ -
क्रियाणां करणाद् द्वितीयक्षणे तस्थाकतु त्वं स्यात् । तथा च सैवानित्यतापत्तिः ।! अथ तस्य तत्स्व- भावत्वात् ता एवाथेक्रिया भूयो भूयो द्वितीयादिक्षणेष्वपि कूर्यात्; तवसाप्रतम्; कृतस्य करणा- भावादिति ।
कि च, दहितीयादिक्षणसाध्या अप्यथंसार्थाः प्रथमक्षण एव प्राप्नुवन्ति तस्य तत्स्वभावत्वात्, अतत्स्वभावत्वे च तस्यानित्यत्वप्रापिरिति । तदेवं नित्यस्य क्रमयौगपद्याभ्यामथंक्रियाविरहान्न स्वकारणे्थो नित्यस्योत्पाद इति ।
५९. अथ विनश्वरस्वभावः समृत्यद्यते; तथा च सति विघ्नाभावावायातमस्मदुक्तम- ेषपदाथजातस्य क्षणिकत्वम् 1 तथा चोक्तम्-
समयमे नहीं थी वही द्वितीय समयमे उत्पन्न हो गयी है । किसी भी अविद्यमान स्वभावका उत्पन्न होना ही अनित्यता है । यदि नित्यपदाथं समस्त अथक्रियाओको युगपत्-एक ही साथ एक ही क्षणमें उत्पन्न करता है. तो प्रथम क्षमे ही द्वितीयादि ` अनन्त क्षणोमिं होनेवाके कायंसमूह् उत्पन्न हो जायेगे । एसो दश्ामें फिर वह् नित्य पदाथं द्वितीय समयमे क्या कायं करेगा ? क्योंकि उसके दारा उत्पाद्य जितने कायंथे वे तो पहले ही क्षणमें उत्पन्न हो चुके हैँ । इस तरह जो नित्य प्रथम समयमे कर्ता था वही द्वितीयादि समयमे कतुंत्वको छोडकर अकर्ता बन जानेके कारण, अथवा जो प्रथम समयमे कर्ता होनेसे सत् था वही द्वितीयादि सम्योमें अथंक्रिया न करनेके कारण असत् हो जानेसे नित्य नहीं रह सकता है । उसमे कतृंत्व तथा अकतुंत्व रूपे परिवर्तन होनेके कारण
अनित्यता ही प्राप्त होतीदहै।
नित्यवादी-नित्यका अनेक कार्योकि उत्पन्न करनेका समथंस्वभाव प्रतिक्षण जाग्रत रहता है 1 अतः द्वितीयादि समयोमे भी उसी स्वभावकी मौजूदगी होनेसे वह उन्ही-उन्हीं कार्योको करता रहता है, खालो नहीं बेठता।
क्षणिकवादी-भआपका उक्त कथनं तो बिलकृक अग्राह्य है, क्योकि-जो कार्यं प्रथम समयसे उत्पन्न हो ही चुके है, नित्य उनको द्वितीयादि समयोमें दुबारा केसे उत्पन्न करेगा? एक बार जो वस्तु उत्पन्न हो चुकौ है, उसकी दुबारा उत्पत्ति केसी ? नित्य पदाथंमें जव समस्त कार्यकर उत्पन्न करनेमें कारणभूत समस्त स्वभाव एक ही साथ रहते है; तो द्वितोयादि क्षणोमें होनेवाले सभी कायं प्रथम ही क्षणमें उत्पन्न हो जाने चाहिए 1 यदि द्वितीयादि क्षणोमें होनेवारे कार्योको उत्पन्न करनेवाले स्वभाव प्रथमक्षणमें नहीं हँ ओर वे द्वितीयादि क्षणोमें उत्पन्नदहोतेहै, तो अनित्यत्वका प्रसंग स्पष्ट हीः है । इस प्रकार नित्य पदाथं नतो क्रमसे ही अथेक्रिया कर सकताहै ओर न युगपत् ही । अतः 'स्वकारणोसि पदाथं अविनदइवर अर्थात् नित्य स्व भाववारा उत्पन्न होता है" यह् पक्ष प्रमाणबाधित हं ।
§ ५९. यदि स्वकारंगोखे पदां क्षणिक स्वभाववाका अर्थात् विनाशी ही उत्पन्न होता है, इस पक्षमें हमारे द्वारा माने गये क्षणिक सिद्धान्तका ही समथ॑न होता है । पदार्थं जब स्वभावसे ही विनारारील है तब उसके क्षणिक होनेमें बाधा ही क्याहो सकती है । इस तरह हमारा क्षणिक
सिद्धान्त निर्बाधरूपसे सिद्ध.हो जाता है । कहा भी है--
१. अथ तत्स्व-म० - २। २. “क्रमाक्रमाभावस्याथंक्रिभासाम्याभिवेन व्यासत्वात् । तथा हि न तावत् क्रमाक्रमाम्यामन्यः प्रकारोऽस्ति, येनाथंक्रियासंभावनायां क्रमाक्रमाम्यामर्थक्रियान्यासिर्नं स्यात् । तस्मादथंक्रियामात्रानुबद्धतया वयोरन्यतरप्रकारस्य । उभयोरभावे चाभावादर्थक्रियामात्रस्येति ताभ्यां
तस्य न्या्िसिदधिः 1 --क्चषणम० सि° प° ५५।
1
- का०७§ ६० ] बौद्धमतम् 1 ४७
"जातिरेव हि भावानां विनाहे हेतुरिष्यते । यो जातस्च न च ध्वस्तो नदयेत्पर्चात्स केन चं ।1१॥'
§ ६०. नन्वनित्यत्वे सत्यपि यस्य घटादिकस्य यदेव मुद्गरादिसामग्रीसाकल्यं `तदेव तद्धिनश्च रमाकल्पते न पुनः प्रतिक्षणम् । ततो ` विनाह्यकारणपेक्नाणामनित्यानामपि पदार्थानां न क्षणिकत्वमिति; तदेतदनुपासितगुरोव॑चः; यतो मुद्गरादिसंनिधाने सति योऽस्य घटादिकस्यान्त्या- वस्थायां विनाज्ञस्वभावः, स ॒स्वभावस्तस्येवोत्पत्तिसमये विद्यते, न वा ! विद्ते चेत्; आपतितं तहि तदत्पत्तिसमनन्तरमेव विनश्वरत्वम् । अथ न विद्यते स स्वभाव. उत्पत्तिसमये; ताहि कथं पश्चात्स भवेत् ! अथेदृद्ा एव तस्य स्वभावो यदुत कियन्तमपि कालं स्थित्वा तेन विनष्टव्यमिति चेत्; तहि मुद्गरादिसंनिधानेऽप्येष एव तस्य स्वभावः स्यात्, ततो भूयोऽपि तेन तावत्कालं स्थेयम्,
[1 त ` 1 ए
"'पदाथकि विनादाका कारण उनकी जाति अर्थात् उत्पत्ति या स्वभाव ही है । अर्थात् पदाथ स्वभावसे एेसे ही उत्पन्न होते हैँ जिन्हें दूसरे क्षणमें नष्ट हो ही . जाना चाहिए । जो पदाथ उत्पन्न होकर भी अनन्तर ही नष्ट नहीं ह उसे पीछे कौन नष्ट कर सकेगा ? अर्थात् वह् नित्य हो जायगा, उसका कभी भी नाश नहीं हो सकेगा 1”
§ ६०. शंका-पदाथं अनित्य हैँ यह तो समन्चमे आ जाता है, किन्तु घट आदि पदा्थोकि नाशक हेतु मुद्गर आदि जब मिक जाय तभी उनका विनाश ` होता है, उन्हें ` प्रतिक्षण विनाशो मानना किसो भी तरह उचित नहीं मालूम होता । इसकिए विनाशक सामग्रीके मिलनेपर ही विनाशवारे अनित्य परार्थोकी तब तक तो स्थिति माननी ही चाहिए जब तक कि उनके विनाशकं कारण नहीं जुट जाते 1 अतः पदाथं कारान्तरस्थायी-अनित्य-अर्थात् कुछ काल तक टहुरकर नष्ट होनेाले है, न किं प्रतिक्षण विनाशी ।
समाधान--यह शंका तो उस व्यक्तिकी मालूम होती है जिसने गुरुके पाससे ज्ञान प्राप्त नहीं किया । आप यह् बताइए कि मुद्गर आदि विनाशक कारणोके मिरनेपर घट आदिकी अन्तिम अवस्थामें जो विनदवर स्वभाव प्रकट होता है वह॒ स्वभाव उन घटादिकी उत्पत्तिके समय भी विद्यमान था या नहीं ? यदि था, तो उन घटादि पदार्थोकी अपने उस विनङ्वर स्वभावकै कारण-- उत्पत्तिके बाद ही नष्ट हो जना चाहिए । एसी अक्स्थामें वे पदाथं कालान्तरस्थायी न होकर क्षणिक ही सिद्ध होते है । यदि वह स्वभाव उत्पत्तिके समय नहीं था; तो पीछे वह कसि आयगा ? क्योकि स्वभाव तो वस्तुकरी उत्पत्तिके समयसे ही होता है 1 यदि आप कहे कि “उसका एसा ही एकं विचित्र स्वभाव है जो उसे कुछ काल तक ठहूर कर ही नष्ट होना चाहिए, उत्पत्तिके अनन्तर क्षणमें ही नही" सो भी ठीक नहीं है; क्योकि यदि उसका कू काल तक ठहरकर नष्ट होनेका स्वभाव है ओर स्वभावका सदा बने रहनेका नियम है तो मुद्गर आदि विनाशक कारणोके मिलनेपर भी उसका वह् "कुछ कार तक ठहरकर नष्ट होनेका स्वभावः घटादिको ओर भी कू काल तक ठहरा देगा, तुरन्त नष्ट नहीं होने देगा । इस तरह जब भी मुद्गर आदि विनाराक कारण मिकेगे तभी वह कु कार तक ठहर कर नष्ट होनेका स्वभाव बोचमें आकर पदाथंको ओर कुछ काल तक ठहरा देगा ओर इस तरह विनाशक हितुओंका प्रहार बराबर निष्फल होता जायगा । तब आप घड़ेपर एक बार तो क्यासौ बार भी मुद्गरसे प्रहार किये जाइए पर घडा हर बार अपने कुछ काठ तक ठहरकर नष्ट ` होनेवले स्वभावसे अपनी आत्मरक्षा करता जायगा ओर इस तरह घडा १. वा-क०, वः-प० १, २, म० १, २१ उदधृतोऽयम्--सिद्धिकि० टी०.पू० २९० । २. तदैव विन-म० २। ३. विनाशकारणेऽपेक्षा-म० २। ४, चेत्तहि तदुत्पत्तिसमयात्न्तरमेव विन-भ० २।
४८ | . षड्ददांनसमुख्चये [ का० ७ § ६१ -
एवं च मुद्गरादिघातश्तपातेऽपि न विनाशो भवेत्, जातं कल्पान्तस्थायित्वं घटादेः, तथा च '“जगद्रयवहारब्यवस्थाविलोचपातकपद्धलता, इत्यभ्युपेयमनिच्छनापि शक्षणस्तयित्वं पदार्थानाम् । ्रथोगस्त्वेवम्--घद्विनश्वरस्वभावं तदुत्पत्तिसमयेऽपि तत्स्वरूपं यथा अन्त्यक्षणवतिघटस्य स्वरूपम्, विनश्वरस्वभावं च रूपरसादिकमुदथत आरम्येति स्वभावहेतुः । तदेवं विनाह्ाहैतोररकिचित्करत्वात् स्वहेतुत एवं पदार्थानामनित्धानामेवोत्यत्तेः क्षणिकत्वमवस्थितमितिः } § ६१. ननुः यदि क्षणक्षयिणो भावाः, कथं तहु स एवायम्" इति ज्ञानम् । उच्यते-निरन्तर- सदृल्लापरापरक्षणनिरीक्षणचेतन्यो दयादविद्यानुबन्धाच्च पु्व॑क्षणप्रर्यकाल एव दोपकलिकायां दीपक- लिकान्तरमिव तत्सदुक्लमपरं क्षणान्तरमुदयते, तेन समानाकारज्ञानपरंपरपरिचयचिरतरपरि-
कल्पान्तकारु तक स्थिर हो जायगा । इस प्रकार जब संसारका कोई भो पदार्थं नष्ट नहीं हो सकेगा तब संसारके समस्त हिरस्याहिसक मृत्यु आदि व्यवहारोकी व्यवस्थाका खोपदहो जायगा} ओर एेसो कल्पना करनेवाकेके मायेपर व्यवहारको ग्य्रवस्थाके विलोपको गहरी पाप कालिमा रुगेगी 1 अतः जगत्के व्यवहारके अनुसार पदाथकि क्षणिक मानना ही पडेगा आपका चित्त अपने पूर्व॑ग्रहुके कारण भले ही उसे न मानना चाहता हो पर पदार्थंको व्यवस्था तो लोक प्रतीतिसे होती है किसी- को इच्छा या अनिच्छासे नहीं । अतः जो अन्तमं विनश्वर स्वभाववाले है वे उत्पत्तिके समय भी विनरवर स्वभाववाले ही रहते हैँ जैसे कि अन्तमं नष्ट होनेवाले घडेका विनरवर स्वरूप यदि अन्तमें रहता है तो उसे उत्पत्तिकालमे भी रहना चाहिए अन्यथा अन्तमं भी वह स्वभाव काँसे आयगा ? उसो तरह चंकिं जगत्के समस्त रूप रस आदि भी अन्तमें विनदवर है ओर इसीलिए वे उत्पत्तिके समयसे ही ` विनश्वर स्वभाववाले हैँ । यह क्नषणिकलत्वको सिद्ध करनेवाले स्वभाव हेतुका प्रयोग है । इस तरं जब विनाशक कारण विनाशके प्रति अकिचित्कर अर्थात् निकम्मे साबित हो जति ह तो यू निविवाद सिद्ध दहो जाता है कि पदाथं अपने कारणोसे विनाशस्वभाव-
वाले ही उत्यन्न होते ह । [ इस तरह पदाथं जब अपने कारणोसे ही विनदवर स्वभावको लेकर
उत्पन्न हए ह -तब उन्हें कौन स्थिर रख सक्तादहै, वे तो अपने उस स्वभावके कारण दूसरे ही क्षणमें नियमसे नष्ट “ही हीः जायंगे । यही पदार्थोकि क्षणिकताका स्वभावमृकक विवेचन है । § ६१. शंका--यदि पदाथं क्षणिकं हँ अर्थात् प्रति समय नष्ट होकर नये-नये उत्पन्न होते हैँ तो यह वही है" यह स्थिरतामलक प्रत्यभिज्ञान केसे होगा ? समाधान--- प्रत्यभिज्ञान होता है' यह तो ठीक, पर जिस तरह सीपमे चांँदीका जान मिथ्या है, उसी तरह “यह् वही है" यह् प्रत्यभिज्ञान भी सदृश क्षणोमे एकत्वका मिथ्या, भान करने- के कारण सत्य नहीं है । असल बात तो यह् है कि-पदाथं प्रतिक्षणमें विनष्ट हो रहै हैँ ओर उनकी जगह नये-नये सदृ पदाथं तुरन्त ही उत्पन्न हो रहे हँ । देखो दीपककी लौ प्रतिक्षण नष्ट होती है ओर दहितीय क्षणमें उसकी जगह उस पूवं दीपकलिकाके सदुश ही नृतन दीपककिका , जगद्न्यवस्थाोपपातक~-म० २। २. -ति यदि म० २। ३. ^सदुशापरोत्पत्तिविप्रलन्धो वा, सदृरो - हि तदेवेदमिति बुद्धिर्यमजे ।* ˆ "अत्रापि सदृशापरोत्पत्तिविप्रलन्धो लूनपुनर्जातकेदानखा- दिवत् ` *"*--प्र° वार्तिकारु० २।२०९। "तस्मात् सदुरापरभावनिबन्धन एवायं केशकदली- स्तम्बादिष्विव आकारसाम्यतामात्रापहूतहूदयानां श्रान्त एव तत्त्वाध्यवसायो मन्तव्यः“ ( प° ८६ ) सदुश्ञापरभावग्रहकृतड्व अर्वाग्दश्नानामेकत्वविश्नमो लूनपुनजतिष्विव नखकेरादिष्विति किन्नेष्यते ( पुण १२० )। सदृक्ापरभावनिबन्धनं चैकतया प्रत्यभिज्ञानं टूनपुनजतिष्विव केरान- खादिषु इत्यत्र विरोधाभावादिति ।' (षर° १३.६)--हेतुबि०, टी ° । “"तुत्येत्यादिना भदन्तशुभगुसस्य परिहारमाशङ्खते--तुल्यापरक्षणोत्पादाद्यथा नित्यत्वविभ्रमः । अविच्छित्नसजातीयश्रह चेत्स्थ् विश्रमः ।' --तस्वसं ° का० १९७२ ।
~ कोा० ७९ ६२1 बौद्धमतंम् । ` ` ४९
णामान्निरन्तरोदयाच्च पुव॑क्षणानामत्यन्तोच्छेदेऽपि स एवायमित्यध्यवसायः प्रसभं प्रादुभवति । द्यते च यथा रूनपुनरुत्यन्ेषु नखकेशकलापादिषु स॒ एवायम् 'इति प्रतीतिः तथेहापि कि न संभाव्यते सुजनेन । तस्मात्सिद्धमिदं यत्सत्तत्क्षणिकमिति । अत एव युक्तियुक्तमुक्तमेतत् क्षणिकाः सवंसंस्काराः' इति ।
§ ६२. अथ प्रस्तुतं प्रस्तूयते-- क्षणिकाः सवंसंस्काराः' इत्यत्र इतिश्चान्दात्प्रकारार्थात् नास्त्यात्मा कश्चन, कितु ज्ञानक्षणसंताना एव सन्तीत्यादिकमप्यत्र गृह्यते । ततोऽयमथेः--श्षणिका सवं पदार्थाः, मास्त्यात्मेत्याद्याकारा, एवमीदश्ली यका “स्वार्थे कप्रत्यये, या वासना पूव॑ज्ञानजनिता तदुत्तरज्ञाने शक्तिः क्षणपरम्पराप्राप्ता भानसी प्रतीतिरित्यथंः, स मार्गो नामार्यसत्यम्, इह बौद्धमते विज्ञेयोऽवगन्तन्यः । सवंपदार्थक्षणिकत्वनैरातम्याद्याकारशित्तविशेषो मागं इत्यथः! स च निरोधस्य कारणं द्रष्टव्यः|
निरन्तर उत्पन्न होतो है यह् बात बारीकीसे दैखनेपर सहज ही अद्रुभवमे आ जाती ह । पर साधारणतया लोग तो यही समञ्जते हैँ कि--'यह् वही दीपक है" । ठीक इसी तरह पदाथकरा अत्यन्त विनाश होनेपर भी उनकी जगह दूसरे नये सदृश पदाथं निरन्तर उत्पन्न .होनेके कारण
तथा अनादि काटीन "यहु वही है' एेसी अविद्या वासनाके कारण हमें सदृश क्षणोमें भी यहं व्ही
दै" एसा एकत्व भान बलात् होता है। इसका कारण है हमारी स्थूल दुष्टि। हम समान आकारवाले पदाथमिं निरन्तर चिरकाटीन परिचयके कारण तथा उनके प्रतिक्षण होनेवारे निरन्तर सद्र परिणमनसे भ्रममे पड जाते है ओर मान बैठते ह कि यह वही पदाथं है", जबकि वह् पूरवक्षणवर्ती पदाथं समल नर हो चुका है ओर उसकी जगह ठीक वेस ही शक्छवाला दूसरा नया ही प्रतिनिधि मोज्द है । दीपकक्री बात जाने दौजिए-बाल बनवाते समय हम बालोको तथा नखोको कटवाकर फक देते है, पर जब दसरे वैसे ही बाट तथा नख उग अते हं तब भी हमारी स्थूलबुद्धि धे वही बालहै, ये वही नख है" इस तरह पूवं सदश बालों ओर नखोमें एकत्वका मिथ्या भान करने लगती है । इसलिए यह तो अनादिकालीन अविद्या तथा हमारी स्थूकू दृष्टिका ही चमत्कार जो हम सद्र पदार्थोमिं भी एकत्वका भान कर बेरते है